ज़िंदा संस्थाओं को दफ़न करने की तैयारी!

ज़रूरी बात , , बुधवार , 14-06-2017


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प्रदीप सिंह

विपक्ष में रहते हुए भाजपा शिक्षा को भारतीय परिवेश के अनुसार बनाने की बात करती रही है। चुनावी घोषणा पत्र में भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना दिखाती रही है। लेकिन अब केंद्र सरकार देश की जानी-मानी और अकादमिक क्षेत्र में उपलब्धियों से भरपूर संस्थाओं को पूंजीपति घरानों को सौंपने की तैयारी कर रही है। कलासाहित्यइतिहास और समाज विज्ञान के कई स्वायत्त संस्थानों को निजी हाथों में देकर शिक्षा और शोध को अभिजात्य वर्ग तक सीमित करने जा रही है। इसके साथ ही कई शोध और शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता को दरकिनार करते हुए उन्हें कुछ विश्वविद्यालयों से संबद्ध करने की नीति बना रही है। जिससे सरकार का दखल उन संस्थाओं में चलता रहे। 

एफटीआईआई, पुणे को लेकर 2015 में हुए आंदोलन की तस्वीर। साभार : गूगल

संस्थाओं को कॉरपोरेट को देने की तैयारी

शिक्षा और समाज के प्रति भाजपा और वर्तमान सरकार की क्या नीति है यह इस बात से उजागर होती है। लंबे समय से विश्वविद्यालयों और कला संस्थाओं को वामपंथियों का अड्डा बताने वाली भाजपा ने पहले तो संघी कॉडरों को ऐसे संस्थानों में खपाने की कोशिश की। इस कोशिश का भारी विरोध होने पर अब संस्थाओं को निजी हाथों में देने की तैयारी बड़ी तेजी से चल रही है।

नीति आयोग को ज़िम्मेदारी

इसके क्रियान्वयन में मरी हुई संस्था नीति आयोग को लगाया गया है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक केंद्र सरकार तीन महत्वपूर्ण संस्थाओं को कॉरपोरेट के हवाले करने जा रही है। जिसमें फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणेसत्यजीत रॉय फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट और दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी शामिल है। भारतीय जनसंचार संस्थान यानी आईआईएमसी को जेएनयू या जामिया में शामिल करने का षड़यंत्र चल रहा है।

सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, कोलकाता। फोटो साभार: गूगल

दरअसल सरकार बनने के तुरंत बाद से ही केंद्र सरकार उक्त संस्थाओं में अपने सांप्रदायिक एजेंडे को लागू करना चाहती थी। लेकिन छात्रोंप्राध्यापकों और संस्थान से निकले पूर्व छात्रों ने सरकारी साजिश का भारी विरोध किया। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट इसका उदाहरण है। जहां एक तीसरे दर्जे के अभिनेता गजेंद्र चैहान को बैठा दिया गया था।

679 स्वायत्त संस्थाओं की समीक्षा

सूचना के मुताबिक पहले चरण में ऐसी 679 स्वायत्त संस्थाओं की समीक्षा की जा रही है जिन्हें निजी हाथों या फिर उनकी स्वायत्ता को समाप्त करते हुए किसी संस्थान से संबद्ध करने की योजना है।

देश भर के स्वायत्त संस्थाओं की समीक्षा जनवरी माह से ही शुरू हो गई थी। सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड 114 संस्थाएं जो सात मंत्रालयों या विभागों के अन्तर्गत हैंइसमें से 42 संस्थाओं के अस्तित्व को समाप्त करने की तैयारी हो चुकी है। शेष संस्थाओं को या तो पुनर्गठित किया जाएगा या एक कॉमन अंब्रेला संस्थान बनाकर निजी हाथों को सौंपा जायेगा।

नीति आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय ऐसे संस्थाओं की समीक्षा करने में लगा है। पहले चरण में जिन संस्थाओं के अस्तित्व को मिटाना है उन मंत्रालयों और विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक करके कागजी खानापूर्ति हो रही है।

पीएमओ के एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि तीन संस्थाओं को जल्द ही निजी कंपनियों को दिया जाएगा। सरकार इस कवायद के पीछे जो तर्क दे रही है वह बहुत छिछला है। सरकार का मानना है कि उक्त 679 संस्थाएं जो 68 मंत्रालयों और विभागों के अधीन है उनके कामकाज में व्यवहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 

दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी।

2017-18 में उक्त संस्थाओं को कुल 72,206 करोड़ रुपये का बजट दिया गया। विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से संबद्ध होने के कारण ढेर सारा पैसा ओवरलैप्स हो गया। इससे बचने के लिए कोई पारदर्शी नीति बनाने के जगह सरकार या तो इन संस्थाओं को बंद करने या उनको निजी हाथों में सौंपना ही निदान समझ रही है।

इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्चइंडियन काउंसिल ऑफ फिलासिफिकल रिसर्च और इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल रिसर्च जैसी संस्थाएं जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत हैं को आईसीएसएसआर अंब्रेला के तहत या फिर जेएनयू में मिलाने की योजना है।

द नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ सिंधी लैंग्वेज नई दिल्ली को सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेज में शामिल करने की योजना है।

द नेशनल काउंसिल ऑफ प्रमोशन ऑफ उर्दू को जामिया या फिर मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी में शामिल करने की तैयारी चल रही है।

द मौलाना अबुल कलाम आजाद इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज को एशियाटिक सोसायटी या फिर किसी विश्वविद्यालय से संबद्ध करने की योजना है।

चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म डिवीजन से संबद्ध करने की तैयारी है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह विभाग पहले से ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत ही है।  










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