सैनिकों की जिंदगियों से खेलने वाली ये कैसी देशभक्त सरकार?

विशेष रिपोर्ट , , शनिवार , 07-10-2017


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सैयद मोहम्मद मुर्तज़ा

8 अक्तूबर: एयरफोर्स डे के मौके पर विशेष

भारत में सेना की आलोचना को 'ईश निंदा' की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन फिर ख़्याल आता है उस पायलट का जो दोयम दर्जे के विमान के साथ दुश्मन से लड़ने के लिये तैयार किया जाएगा। वायु सेना के लिये अब एक इंजन वाला विमान ख़रीदने की तैयारी हो रही है। ये भारत की हवाई ताक़त के साथ लतीफ़े की तरह है। मध्य श्रेणी के बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान यानी एमएमआरसीए सौदे को रद्द करने के बाद सरकार अब एक इंजन वाला विमान ख़रीदेगी। 10 साल के कड़े मूल्यांकन और मेहनत के बाद भारतीय वायु सेना ने फ्रांस का दो इंजन वाला रफाल विमान चुना था लेकिन मौजूदा सरकार ने उस ठेके को ही ख़ारिज कर दिया। 

अब उस विमान को ख़रीदने की तैयारी चल रही है जो एमएमआरसीए की लंबी टेस्टिंग के दौरान पहले चरण में ही बाहर कर दिया गया था। आख़िर चंद सालों में वायु सेना की ज़रूरत कैसे बदल सकती है जबकि देश के दुश्मन नहीं बदले हैं, उनकी ताक़त में इज़ाफ़ा हुआ है और अब हम ऐसे कमज़ोर विमान ख़रीदने की तैयारी कर रहे हैं जिन्हें हमारे विशेषज्ञों ने खुद ख़ारिज कर दिया था। दरअसल जब बड़े पदों पर बैठे लोग फूहड़ फ़ैसले लेने लगें तो सवाल उठाना ज़रूरी हो जाता है।

एक इंजन वाले विमान के सौदे के लिये अब अडानी ग्रुप और टाटा ग्रुप बाज़ी लगा रहे हैं। अडानी ग्रुप ने स्वीडन के साब ग्रुप के साथ ग्रीपेन विमान के लिये क़रार किया है और टाटा ने अमेरिका की लॉकहिड मार्टिन के साथ एफ-16 विमान के लिये समझौता किया है। अपनी श्रेणी में ये विमान कमज़ोर नहीं, लेकिन भारतीय वायु सेना की चेकलिस्ट में ये फेल साबित हो चुके हैं। तकनीक सौंपने के नाम पर अमेरिका भारत को अपना बूढ़ा हो चुका एफ-16 बेचना चाहता है, तो स्वीडन उस विमान को भारतीय वायु सेना का भविष्य बता रहा है जिसकी टक्कर का विमान तेजस हम खुद तैयार कर चुके हैं। 

देश में शीर्ष स्तर पर बैठे नेता, अफ़सर आख़िर किन पैमानों पर राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरत तय करते हैं, फिर उसे ही ख़ारिज कर देते हैं ? क्या इनमें व्यक्तिगत हित शामिल हैं ? हम सचमुच अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। एफ -16 और ग्रीपेन को छोड़कर तीसरा कोई गंभीर भी इस सौदे में नहीं होगा। यानी ये डील या तो अडानी को मिलेगी या फिर टाटा को। वायु सेना की रणनीति और उसकी ज़रूरत को लेकर हम खुद इतने भ्रम में हैं कि दुश्मन भी हैरान होगा।

एमएमआरसीए लड़ाकू विमान।

एमएमआरसीए डील के मुताबिक़ भारत को फ्रांस से 126 रफ़ाल ख़रीदने थे जिनमें 108 विमान भारत में बनाए जाते। अब हम सिर्फ़ 36 रफ़ाल ख़रीद रहे हैं जिसमें ना सिर्फ़ तकनीक हस्तांतरण का मुद्दा ग़ायब है बल्कि 36 विमानों की क़ीमत भी इतनी चुकाई जा रही है जिसमें दोगुनी तादाद में रूस से और सुखोई-30 एमकेआई ख़रीदे जा सकते थे। अगर हमने 2014 में फ्रांस के साथ एमएमआरसीए अनुबंध को अंतिम रूप दिया था, तो हम अब तक रफाल विमान के पहले बैच को शामिल कर चुके होते। अब देर से लिये गये ग़लत फ़ैसले का असर वायु सेना की तैयारी पर पड़ रहा है। अब 2019 में पहला रफ़ाल आएगा और फिर 36 विमानों के साथ भारतीय वायु सेना के पास इसकी सिर्फ़ 2 स्क्वाड्रन होंगी। वायु सेनाध्यक्ष जब फ्रांस के दौरे पर गये थे तब ख़बरें आ रही थीं कि भारत 36 और रफाल ख़रीदने के लिये फ्रांस से बात कर सकता है। अगर 36 और रफाल विमान भी ख़रीदे गये तो वो भी मेड इन फ्रांस ही होंगे, यानी तकनीक के नाम पर भारत के हाथ फिर बाबा जी का ठुल्लू ही लगेगा। संक्षेप में, एफ-16 और ग्रीपेन दोनों ही भारतीय वायु सेना की दीर्घकालिक योजना और स्वदेशीकरण प्रक्रिया के लिए आपदा साबित होंगे। तेजस प्रोजेक्ट पहले ही दफ़्न किया जा चुका है। अब हम देश की सुरक्षा के नाम पर सिर्फ़ कॉर्पोरेट ग्रुप के हाथों में खेल रहे हैं।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल स्टडीज़ में रिसर्च स्कॉलर हैं।)

 










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