दुष्यंत चौटाला ने अपने परदादा के नाम पर बनाई जननायक जनता पार्टी, 9 दिसंबर को होगी घोषणा

मुद्दा , नई दिल्ली, शुक्रवार , 07-12-2018


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चरण सिंह

नई दिल्ली। हरियाणा के हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला ने अपने चाचा अभय चौटाला की इनेलो के समानांतर अपने परदादा चौधरी देवीलाल के नाम पर जननायक जनता पार्टी बना ली है। अब दुष्यंत और उनके छोटे भाई दिग्विजय सिंह जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के बैनर तले सियासी संघर्ष करेंगे। इस नई पार्टी का ऐलान 9 दिसंबर को जींद के पांडु-पिंडारा गांव में होने वाले ‘समस्त हरियाणा’ सम्मेलन में होगा। इस रैली को सफल बनाने के लिए दुष्यंत अपने छोटे भाई दिग्विजय के साथ मिलकर ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

नई पार्टी के रजिस्ट्रेशन के लिए हरियाणा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास आवेदन जमा करवाया जा चुका है। पार्टी का रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन हुआ है। पार्टी सिंबल को लेकर भी दुष्यंत की टीम के बीच लगातार मंथन चल रहा है।

पार्टी रजिस्ट्रेशन के लिए कुल 25 फाउंडर मेंबरों के नाम है। इनमें दुष्यंत व दिग्विजय सिंह चौटाला के नाम भी शामिल हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के अलावा अन्य पदाधिकारियों और प्रदेशाध्यक्ष सहित उनकी पूरी यूनिट के गठन को लेकर कवायद जारी है।

ज्ञात हो कि चौधरी देवीलाल की राजनीतिक विरासत को लेकर चल रहे झगड़े के बाद उनके बड़े पोते अजय ने 17 नवंबर को जींद में हुई रैली में इनेलो से अलग होकर पार्टी बनाने की घोषणा कर दी थी। उन्होंने बड़ा दिल दिखाते हुए न केवल  लोगों की सहानुभूति बटोरी थी बल्कि अपने बड़े बेटे दुष्यन्त चौटाला के लिए अपने दादा की विरासत संभालने की रूपरेखा तैयार कर दी।

यह अजय चौटाला की राजनीतिक सोच ही थी कि जो छोटा भाई अभय चौटाला उन्हें नीचा दिखाने पर तुला था। उसे उन्होंने बड़े भाई का फर्ज बताते हुए तोहफे में इनेलो पार्टी व चुनाव चिन्ह दे दिया थ। जो उनके पिता ओमप्रकाश चौटाला पूरे परिवार को पार्टी से निकाल कर एकतरफा अभय चौटाला का साथ दे रहे थे, उन्हें भी जिम्मेदारी का एहसास करा दिया था।

कहते हैं समय कितना बलवान होता है। जिस चौटाला परिवार की कभी हरियाणा की राजनीति में तूती बोलती थी वो आज की तारीख में टूट गया है। लंबे समय तक एक साथ काम करने वाले ओम प्रकाश चौटाला के दोनों बेटों अजय सिंह चौटाला और अभय चौटाला की सियासी राहें जुदा हो गई हैं। ताऊ देवीलाल की राजनीतिक विरासत की लड़ाई अब सड़क पर है।

अजय सिंह चौटाला को इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के प्रधान महासचिव के पद से मुक्त करने के साथ ही पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी निष्कासित किया गया था। इससे पहले उनके बेटों, दुष्यंत और दिग्विजय को 2 नवंबर को ही पार्टी से निकाल दिया गया था।

जाहिर है कि पूर्व सीएम ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला टीचर भर्ती के एक मामले में धांधली को लेकर तिहाड़ में सजा भुगत रहे हैं। तो स्वभाविक है कि ओमप्रकाश चौटाला के साथ ही अजय चौटाला की राजनीति का दौर भी खत्म है। यानी कि विरासत की असली लड़ाई दुष्यन्त और अभय के बीच है।

इनेलो पर भले ही अभय का कब्जा हो गया हो पर लोकप्रियता में दुष्यन्त उनसे कहीं अधिक आगे हैं। अजय चौटाला के निष्कासन से पहले जब दुष्यन्त और दिग्विजय का निष्कासन हुआ था तभी से ही पार्टी में घमासान मच गया था। अजय और अभय चौटाला के समर्थक आमने-सामने थे। लगभग सभी जिलों में कुछ कार्यकर्ता पार्टी छोड़ गए थे और कुछ 'वेट एंड वॉच' की मुद्रा में थे। सबके सामने एक सवाल था कि इंडियन नेशनल लोकदल की कमान किसके हाथ जाएगी और कौन नई पार्टी बनाएगा?

हालांकि सुलह की भी कोशिशें चल रही थीं। इस पारिवारिक लड़ाई में सुलह कराने के लिए अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल प्रयास कर रहे थे। वो इस परिवार के पुराने साथी हैं।

सूत्रों का कहना है कि अजय चौटाला और उनके बेटों ने पहले ही नई पार्टी बनाने का निर्णय ले लिया था। ये लोग चाहते हैं कि नई पार्टी में कुछ बड़े नाम शामिल हों। इसके लिए वो दक्षिण हरियाणा के एक बड़े राजनीतिक घराने के संपर्क में हैं। साथ ही एक बड़े कांग्रेसी ब्राह्मण नेता से भी संपर्क किया गया है। इसी बीच बीजेपी किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष बलदेव अलावलपुर बीजेपी छोड़कर अपने समर्थकों समेत दुष्यंत के साथ आ गए थे।

ज्ञात हो कि इनेलो के पास इस समय 18 विधायक, दो सांसद हैं। इनेलो ने अगले चुनावों के लिए बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से समझौता किया था। अभय चौटाला ने एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया था कि 'राज्‍य की 90 में से 40 सीटों पर बसपा को 7-8 प्रतिशत वोट मिलते हैं। और 60 सीटें ऐसी हैं जहां इनेलो को 30 फीसदी वोट मिलते हैं। ऐसे में बसपा और इनेलो 39 से 40 प्रतिशत वोट हासिल कर सकते हैं और जिससे विधानसभा में आसानी से बहुमत मिल जाएगा।

90 सदस्यों वाली हरियाणा विधानसभा के चुनाव 2014 में हुए थे। इसमें आईएनएलडी ने 24.11% वोट लेकर 19 सीटें हासिल की थीं, जबकि बीएसपी को 4.37% वोट के साथ केवल 1 सीट मिली थी। अगस्‍त में जींद के विधायक हरिचंद के निधन के बाद यह आंकड़ा 18 रह गया। उनके बेटे कृष्‍णा मिढ़ा ने बीजेपी की सदस्‍यता ले ली है।

ऐसे में देखना यह होगा कि मायावती किस ओर जाएंगी। या फिर किसी से भी गठबंधन नहीं करेंगी। बसपा नेताओं का मानना था कि इनेलो के साथ गठबंधन से पार्टी को हरियाणा के साथ-साथ पश्चिमी यूपी में फायदा मिल सकता है। 

हालांकि अपने भतीजों को निष्कासित करने के बाद शुरू हुए विवाद के बीच अभय चौटाला ने दिल्ली में बसपा प्रमुख मायावती से मुलाकात कर कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की थी कि गठबंधन पर कोई आंच नहीं आने वाली है। उधर दुष्यन्त के भी मायावती के संपर्क में रहने की बातें सामने आई थीं।

इस परिवार के हुए दो फाड़ से बीजेपी को सीधे राजनीतिक फायदा हो सकता है। कुछ फायदा कांग्रेस को भी मिल सकता है। दरअसल हरियाणा के जाट वोट बैंक का अभी भी ज्यादा हिस्सा ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी को ही मिलता है। बचा हुआ वोट कांग्रेस और बीजेपी में बंट जाता है। इसलिए बीजेपी और कांग्रेस चौटाला के परिवार में झगड़े का राजनीतिक लाभ उठाने की फिराक में हैं।

इंडियन नेशनल लोकदल की स्थापना 1987 में ओमप्रकाश चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल ने की थी। इनेलो इस वक्त हरियाणा विधानसभा में मुख्य़ विपक्षी पार्टी है। देवीलाल 1971 तक कांग्रेस में रहे थे। दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे। 1977 में वे जनता पार्टी में आ गए। 1989 में देवीलाल देश के उप प्रधानमंत्री बने तो देवीलाल के बाद उनके बड़े बेटे ओम प्रकाश चौटाला भी चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इस विरासत को हथियाने की लड़ाई अब सड़क पर आ गई है।

दूसरी ओर जिस तरह से अखिलेश यादव यूपी में खुद को नई पीढ़ी के नेता के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहे हैं। उसी रास्ते पर हरियाणा में दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला भी हैं। जिस तरह से हरियाणा के लोग दुष्यंत को हाथों-हाथ ले रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि दुष्यन्त देवीलाल की राजनीतिक विरासत को संभालने की ओर बढ़ रहे हैं।

 








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