उपचुनावों ने खिड़की खोली है, दरवाजा विपक्ष को खुद बनाना है

ज़रूरी बात , , शनिवार , 17-03-2018


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अनिल सिन्हा

गोरखपुर, फूलपुर और अररिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उलटी गिनती तो शुरू कर दी है, लेकिन विपक्षी पार्टियों को अभी मीलों जाना है और संघर्ष की व्यापक रणनीति बनानी होगी। उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी कि आने वाले एक साल में वे आरएसएस-भाजपा की ओर से होने वाले वैचारिक हमलों का सामना किस तरह करते हैं। विपक्ष को इन हमलों को नाकाम करने के लिए संगठन और विचारधारा दोनों स्तरों पर तैयार होना होगा। लेकिन वह ऐसा तभी कर पाएगा जब वह अपनी राजनीति बदले।

भाजपा के सत्ता में आने में उनकी  विचारधारा से ज्यादा विपक्ष की विचारहीनता और अवसरवाद का योगदान है। पैसे और प्रचार की ताकत से सांप्रदायिक संकीर्णता और कारपोरेट वर्चस्व की जो इमारत खड़ी हुई है उसे ढहाने का काम जनता की सच्ची राजनीति से ही हो सकती है। यह राजनीति गरीब लोगों के आर्थिक मुद्दों को हाथ में लेने और सामाजिक न्याय को सही मायने में लागू करने से ही होगा। 

आरएसएस और भाजपा वाले देश के लोकतांत्रिक ढांचे और सेकुलर चरित्र को खत्म करने की कोशिश में लगातार लगे हुए हैं। उन्होंने उन संस्थानों और विचारों पर हमला कर रखा है जो भारतीय लोकतंत्र का आधार बनाते हैं। बहुत कम लोगों ने इस ओर ध्यान दिया कि मोदी सरकार में फैसले करने के तरीके का किस तरह केंद्रीकरण हुआ है। मीडिया की अनदेखी के कारण यह बात लोगों तक नहीं पहुंच पाई है कि केंद्र सरकार के हर मंत्रालय को सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय चला रहा है और छोटे से छोटे फैसले भी वही करता है।

बुलेट ट्रेन के लिए जापान से समझौता हो या राफेल की फ्रांस से खरीद हो,संबंधित विभागों की इसमें सिर्फ इतनी भागीदारी थी कि उन्होंने इसके विवरण आदि तैयार किए थे। फैसला लेने का काम सीधे प्रधानमंत्री ने किया। नोटबंदी के दौरान लोगों ने देख ही लिया कि इस फैसले में न तो वित्त मंत्रालय की कोई भूमिका थी और न रिर्जव बैंक आफ इंडिया की। पार्टी और सरकार दोनों जगह केंद्रीकरण के जरिए मोदी-शाह की जोड़ी ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया है। सब कुछ अपनी मुट्ठी में कर लिया है। इस काम में उन्हें अगर किसी की सहमति की जरूरत होती है तो वह है नागपुर के आरएसएस मुख्यालय की। केंद्रीकरण के साथ-साथ सरकार और कारपोरेट के बीच का रिश्ता ज्यादा गहरा हो गया है।

इस रिश्ते के वजह से ही श्रम कानून आज पूरी तरह विकलांग हो चुके हैं और सभी विभागों को खामोशी से निजी हाथों में सौंपने का काम तेजी से जारी है। रेलवे से लेकर सरकारी बैंकों के काम चालाकी से आउटसोर्स हो चुके हैं। बैंकों का काम आनलाइन पेमेंट की खिड़कियों के जरिए निजी हाथों में जा चुका है। दिलचस्प तो यह है कि एमटीएनएल से लेकर बिजली विभाग के बिलों का पेमेंट आज आनलाइन पेमेंट के कंपनियों के जरिए हो रहा है और सरकारी कंपनियों के पेमेंट गेटवे को पूरी तरह कमजोर किया जा चुका है। विकास के नाम पर देशी-विदेशी कंपनियों को श्रमिकों के शोषण की खुली छूट और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के नाम पर कंपनियों को संसाधनों के खुली लूट की छूट दे दी गई है। यह रोजगार भी खा रहा है और लोगों को संसाधन से वंचित भी कर रहा है। 

लोकतंत्र को बाजारी शक्तियों के हवाले करने के भाजपा के अभियान को लोगों के सामने लाना होगा। उन्हें बताना होगा कि रोजगार के गायब होने से लेकर किसानों की बदहाली के पीछे यही अभियान जिम्मेदार है।

इन सबके साथ है सांप्रदायिकता की चुनौती। इस जहर को फैलाने में भाजपा किस तरह कामयाब हुई है यह हम असम से लेकर केरल में देख सकते हैं। इस जहर को निकालने के लिए एक व्यापक संघर्ष की जरूरत है। इसलिए विपक्ष को अपनी रणनीति देश के जरूरी मुद्दों को ध्यान में रख कर बनानी होगी।

इस संदर्भ में यह भी साफ होना जरूरी है कि इन तीन उपचुनावों में हुई विपक्ष की जीत सिर्फ बिखरी पार्टियों के इकट्ठा होने से नहीं हुई है। चुनाव में दो और दो मिलाकर चार बनाने का आंकड़ा काम नहीं आता है। इस विश्लेषण का एक ही मतलब होता है कि राजनीतिक पार्टियों को बेवजह ज्यादा महत्व दिया जाए और लोगों की समझ को खारिज किया जाए। 

राजनीतिक पार्टियों के मिलने वाले महत्व से ही जुड़ा है जातियों के समीकरण को   महत्व देने का मामला। साल 2014 के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालने से यह साफ हो जाता है कि जातियों के इस समीकरण को  बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा है। सच्चाई यही है कि केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों से त्रस्त हुई जनता ने जाति-धर्म से हटकर वोट दिया है। गोरखपुर के पिछले चुनावों पर नजर डालने से भी यह पता चलता है कि इस इलाके में भाजपा की बढ़ती ताकत के हिसाब से ही योगी आदित्यनाथ का वोट प्रतिशत बढ़ता गया और वह बसपा और समाजवादी पार्टी के इकट्ठे जनाधार से ज्यादा वोट पाने में सफल होने लगे। 2004 के बाद से ही वह बसपा और सपा की समिल्लित ताकत से ज्यादा वोट पाने लगे। वह 2004, 2009 तथा 2014 के चुनावों में 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाकर चुने गए थे।

नब्बे के दशक में उन्हें और उनके पूर्ववर्ती और गोरखनाथ मठ के महंथ अवैद्यनाथ राम मंदिर आंदोलन की लहर में भी 50 प्रतिशत वोट नहीं पा सके थे। इससे यही जाहिर होता है कि पिछड़ों तथा दलितों की संगठित शक्ति पर धार्मिक शक्ति भारी थी, लेकिन उसकी एक सीमा थी। बाद में चलकर यह सीमा टूट गई और महंथ ने अपनी ताकत बढ़ा ली। इसे लेकर कोई शक नहीं होना चाहिए कि 2018 में सामाजिक शक्ति ने धार्मिक ध्रुवीकरण को अगर परास्त किया है तो इस जीत के पीछे लोगों की बढ़ती बदहाली की बड़ी भूमिका है। यह सच है कि पिछड़े दलित, तथा मुसलमानों ने संगठित ताकत दिखाई। लेकिन इसे महज जातियों के समीकरण के रूप में देखना गलत ही नहीं, भरमाने वाला भी है। 

फूलपुर के नतीजों पर गौर करें तो यह ज्यादा साफ हो जाता है। यहां 2009 में भाजपा पांचवें नंबर पर थी और बसपा जीत कर आई थी। बसपा और सपा के उम्मीदवारों में सिर्फ 3 प्रतिशत वोटों का अंतर था। लेकिन 2014 में भाजपा ने 52 प्रतिशत वोट पाकर यह सीट जीत ली। सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों मिलाकर भी उसे परास्त नहीं कर सकते थे। 2009 में और 2014 दोनों में भाजपा ने पिछड़ों को ही मैदान में उतारा था। इस बार भाजपा का उम्मीदवार आठ प्रतिशत के अंतर से पराजित हो गया। इसका उम्मीदवार भी पिछड़े वर्ग से ही था। 

 चुनाव विश्लेषण में सरलीकरण का नतीजा है कि जाति समीकरणों को इतना महत्व मिल जाता है कि बाकी मुद्दे गौण हो जाते हैं। सामाजिक समीकरण भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आर्थिक मुद्दे भी भूमिका निभाते हैं। 

सामाजिक समीकरणों को जरूरत से ज्यादा महत्व देने के कारण ही कुछ लोग कह रहे हैं कि भाजपा को पिछड़े-दलितों ने इस उम्मीद से वोट दिया था कि वे उसे प्रशासन और राजनीति में उचित नेतृत्व देंगे। इससे आधारहीन विश्लेषण हो नहीं सकता। यह विश्लेषण भाजपा को समाजिक बदलाव की पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश है। भाजपा कभी भी सामाजिक न्याय की पार्टी नहीं बन सकती है। वह जाति के समीकरणों का सिर्फ इस्तेमाल कर सकती है। यह हर वोटर जानता है। 

पार्टी को विकासवादी पार्टी के रूप दिखाने और इसे जनता की स्वीकृति मिलने के दावे भी उतने ही गलत हैं। 

सच्चाई यह है कि भाजपा विकास नहीं कारपोरेट हितों की पार्टी है। साथ में है उसका मध्ययुगीन हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत। वह कभी विकास तो कभी हिंदुत्व को आगे लाती है। दोनों के इस्तेमाल के बावजूद 2004 तथा 2009 में भाजपा को सफलता नहीं मिली और 2012 में उसे उत्तर प्रदेश के चुनावों में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था। उसने सिर्फ 15 प्रतिशत वोट पाए थे। कांग्रेस उससे सिर्फ साढ़े तीन प्रतिशत पीछे थी यानि उसे 11.5 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था। 

इसका अर्थ यही है कि गैर-भाजपा पार्टियों के चुनाव में उखड़ जाने के पीछे उनकी अपनी नाकामियां रही हैं। बसपा और सपा दोनों ने अपने शासन को गरीबों के लिए आदर्श राज बनाने में विफलता हासिल की और सामाजिक न्याय को ईमानदारी से लागू नहीं किया। दोनों ही पार्टियां कुछ खास जातियों को जरूरत से ज्यादा तरजीह देने लगीं जिससे सामाजिक न्याय की शक्तियों का बिखराव हो गया। उन्हें अब अपनी इन नीतियों से अलग होना पड़ेगा। इसकी झलक  इस बार मिली भी है।

सपा नेता अखिलेश और राजद नेता तेजस्वी ने परिपक्वता दिखाई है और बसपा नेता मायावती ने बदलती परिस्थितियों के हिसाब से अपनी नीति बदली है। एक बात तो तय है कि सपा और राजद को अगली पीढ़ी का नेतृत्व मिल गया है और वे आगे सामाजिक न्याय की ताकतों का प्रतिनिधित्व करेंगे। उन पर देश की राजनीति और अर्थनीति को बदलने का दायित्व है। उपचुनावों ने उनके लिए नई राजनीति की खिड़की खोली है। देखना है कि वे इसका कितना लाभ उठा पाते हैं और विरासत में मिली अराजक राजनीति से अपना पीछा किस तरह छुड़ाते हैं। 

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 


 










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