क्यों जिन्दा है बुरहान वानी?

ज़रा सोचिए... , , शनिवार , 08-07-2017


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प्रेम कुमार

बुरहान वानी के मरे हुए पूरे साल हो गये। जितना जिन्दा रहते उसका खौफ नहीं था, उससे ज्यादा मरने के बाद वह खौफ़नाक हो गया। बुरहान की बरसी पर कश्मीर में हड़ताल, अलगाववादी नेताओं की नजरबंदी, ठप इंटरनेट सेवा, जगह-जगह कर्फ्यू और जबरदस्त तरीके से सुरक्षा बलों की तैनाती। ऐसी स्थिति बुरहान के जिन्दा रहते हुए भी नहीं बनी थी। सच तो यह है कि सिर्फ बुरहान नहीं, उसके उत्तराधिकारी समेत 80 से ज्यादा उसकी टोली के लोग इस एक साल में मारे गये हैं। बुरहानों की मौत का न तो सिलसिला थमा है और न उन्हें मारने के लिए गोलियां कम पड़ी हैं। देश के लिए सोचने का ये समय है कि क्यों जिन्दा है बुरहान वानी, कब तक जिन्दा रहेगा बुरहान वानी?

कश्मीर में तैनात सुरक्षा बल के जवान।

वर्दी बुलावा देती है मौत को 

मरने वाले केवल कश्मीरी नहीं हैं, सुरक्षा बलों के जवान भी हैं जिनका दुर्भाग्य ये है कि उनकी वर्दी हमलों को आमंत्रित करती है, वे घायल होते हैं, मारे जाते हैं और उनकी मौत महज थोड़े समय की प्रतिक्रिया बनकर भुला दी जाती है। बुरहान वानी पोस्टर ब्वॉय बन जाता है, उसके नाम पर पत्थरबाज पैदा हो जाते हैं, उसके नाम पर पाकिस्तान तक से संगठन सक्रिय हो जाता है, मगर सुरक्षा बलों के जवान तो ड्यूटी पर कुर्बान होने से ज्यादा न कुछ दे पाते हैं, न कुछ हासिल कर पाते हैं। शहादत का सरकारी तमगा भी अब उन्हें बेमानी लगने लगा है। ऐसा क्यों?

एक युद्ध होता है, तो सामने दुश्मन होता है। दुश्मन को जीतने का लक्ष्य होता है। उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए योद्धा अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। इस शहादत को पूरा समाज, पूरा देश नमन भाव से नतमस्तक होते हुए कबूल करता है, उनसे प्रेरणा लेता है और इसी तरह जान देने वालों की कतार लग जाती है। लेकिन कश्मीर में सुरक्षाबलों के लिए स्थिति अलग है। गोलियां चलाने से पहले सोचते हैं, पत्थरबाजों के पत्थर खाते हैं, जान लेने के बजाए पहले पैलेट गन छोड़ते हैं और इस दौरान कब उनके पास मौत आ जाती है, उन्हें पता ही नहीं चलता। कई जवान तो योद्धा की तरह जान देने का सपना संजोये ही दुनिया छोड़ देते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब मौत आ गयी। वहीं ये सैनिक या अर्धसैनिक बलों के जवान खुद दुश्मन बनकर वर्दी में आसानी से लक्ष्य बने होते हैं जिन्हें आतंकवादी साध लेते हैं और अपनी ‘सफलता’ पर गर्व करते हैं।

बुरहान के जिंदा रहने तक खून बहेगा

जब तक बुरहान वानी जिन्दा रहेगा, तब तक सुरक्षा बलों का खून भी बहता रहेगा। इस खून की फिक्र करने का सबक भी हम बुरहान वानियों की मौत से ले सकते हैं लेकिन इसके लिए जिगर बड़ा होना चाहिए। ऐसा हम तभी कर सकते हैं जब ख़ून-ख़ून में फ़र्क करना छोड़ेंगे। निस्संदेह बुरहान वानी की मौत सुरक्षा बलों के लिए बड़ी सफलता थी। हिज्बुल मुजाहिदीन के लिए बड़ा धक्का था और पाकिस्तान स्थित उनके आकाओं के लिए बड़ा सदमा था। मगर, गलती ये होती है कि इस सफलता को देश के लिए गर्व करने की स्थिति बतायी जाती है। बुरहान वानी का मारा जाना कतई गर्व करने की बात किसी के लिए भी नहीं हो सकती थी। 

बुरहान की मौत पर हमारी भावना ये होनी चाहिए थी- “बुरहान वानी गुमराह युवक था, जो समाज और देश के लिए खतरा बन चुका था और इसलिए उसका मारा जाना जरूरी था। मगर, अपनी ही धरती के एक युवक की मौत का हमें अफसोस है।“ यह भावना कश्मीर में गुमराह युवकों को सही रास्ते पर लौटने को प्रेरित करती, उन्हें हथियार छोड़ने का मौका देती, गलतियां मानने को विवश करती और समाज को भी उन पर दबाव बनाने का मौका मिलता।

बुरहान को आदर्श के तौर पर पेश करने की कोशिश।

युवाओं को कभी प्यार और हमदर्दी नहीं दी

लेकिन, हमने कश्मीर में मारे जा रहे युवकों की मौत पर कभी सहृदयता से बात नहीं की। जिस किसी ने भी सहानुभूति दिखलायी, उन्हें आतंकवाद का समर्थक करार देते हुए देश का दुश्मन समझ लिया गया। यही वजह है कि कश्मीर में ‘देश के दुश्मनों’ की तादाद बढ़ती चली गयी है।  वहीं, वैसे लोग देशभक्ति के पवित्र और उच्च आदर्शों को ओढ़ते नज़र आए, जो दैनिक जीवन में सही पड़ोसी का भी फर्ज अदा नहीं कर पाते। 

कश्मीर के लोगों में भी ये भावना कमजोर पड़ती गयी है कि सरकार उनकी है, उनके लिए है और पुलिस उनकी सुरक्षा के लिए है, उन्हें परेशान करने के लिए नहीं। मस्जिद के सामने भीड़ डीएसपी अयूब पंडित को निर्वस्त्र कर उनकी हत्या कर देती है तो यह  घटना देश के लिए कमजोर पड़ती भावना की चरम स्थिति को बयां कर रही है। इस घटना में तो मजहबी दीवार तोड़ते हुए नफरत की भावना का प्रदर्शन दिखता है। बुरहान वानी की मौत के बाद की प्रतिक्रियाओं में सबसे चिंताजनक उदाहरण है यह घटना।

अपने नागरिकों जैसे व्यवहार की जरूरत

ऐसा नहीं है कि बुरहान वानी सिर्फ कश्मीर में ही मारे जाते हैं। देश के बाकी हिस्सों में भी एनकाउन्टर होते हैं, उसमें स्थानीय युवक की मौत होती है। भीड़ पर गोली चलाने की घटना सिर्फ कश्मीर में नहीं होती, देश के बाकी हिस्सों में भी होती है। पुलिस का क्रूर चेहरा सिर्फ कश्मीर नहीं है, देश के बाकी हिस्सों में भी है। फर्क ये है कि मंदसौर में पुलिस की गोली से किसानों की मौत पर सरकार को भी आंसू बहाना होता है, मुआवजा देने की घोषणा करनी पड़ती है, मुख्यमंत्री को मृत किसानों के परिवारों के घर जाना पड़ता है। विरोधी दलों को भी देश के किसानों की आवाज़ उठाते हुए सामने आना पड़ता है, राजनीति करनी पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से ही उनका वजूद रह सकता है। यहां पुलिस की कार्रवाई का विरोध करने पर आतंकवाद का हमदर्द घोषित किए जाने का खतरा नहीं है। कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों में जन प्रदर्शन के प्रति सोच में, उसके प्रति व्यवहार में ये बड़ा फर्क है।

जब तक देश अपने सूबे के लिए, नागरिकों के लिए अपने व्यवहार में फर्क करना बंद नहीं करता है, तब तक अलगाववादी भावनाएं पैदा होती रहेंगी। हिंसा और आतंकवादी हिंसा का फर्क दिखता रहेगा, अपने ही लोग देश विरोधी कहलाते रहेंगे। बुरहान वानी जैसे गुमराह नौजवान अपनी मौत के बाद भी जिन्दा रहेंगे और अपने जैसे गुमराह नौजवानों को भी पैदा करते रहेंगे।

(लेखक पत्रकार हैं और सहारा समय समेत कई इलेक्ट्रानिक चैनलों में काम कर चुके हैं। ढेर सारे अखबारों और पत्रिकाओं में इनके नियमित लेख छपते रहते हैं। और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 

(लेख में दिए गए विचार लेखक के निजी हैं। जनचौक का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है।)










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