...और इस तरह से हुआ चंद्रशेखर का दाह-संस्कार

एक नज़र इधर भी , नई दिल्ली, रविवार , 09-07-2017


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की कल पुण्य तिथि थी। 8 जुलाई 2007 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में कैंसर ने उनकी इहलीला समाप्त कर दी। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से राजनीति की राह चंद्रशेखर जब निकले तो उनके साथ समाजवादी दर्शन और आत्मविश्वास के अलावा बहुत कुछ नहीं था। कई वर्षों तक वे राजनीति और सत्ता के केद्र बिंदु रहे लेकिन सत्ता से हमेशा उनका रिश्ता छत्तीस का बना रहा। 

चंद्रशेखर और इंदिरा गांधी साथ में राजेंद्री वाजपेयी।

चंद्रशेखर अपने बेधड़क मिजाज, बिंदास बोल और राजनीति में खरी-खरी कहने के लिए सदा याद किए जाएंगे। राजनीति में उनकी यही खरी-खरी कहने की अदा ने उनके दोस्त और दुश्मनों की संख्या बढ़ाते रहे। यही कारण है कि वे हमेशा सत्ता की आंख की किरकिरी और जनता की नजर में सितारे रहे। उनके राजनीतिक जीवन का अधिकांश समय विपक्ष और संघर्ष की राजनीति करने में बीता। इसके बावजूद देश की सत्ता उनसे घबराती रही। सोशलिस्ट पार्टी में रहने के दौरान विपक्षी नेता तो कांग्रेस में रहते हुए वे लोकतंत्र के लिए इंदिरा गांधी की आलोचना करते रहे। कांग्रेस में रहते हुए कांग्रेस और इंदिरा गांधी की नीतियों की आलोचना करने के कारण चंद्रशेखर, रामधन, मोहन धारिया और कृष्णकांत पार्टी के ‘युवा तुर्क’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। 

चंद्रशेखर ने आपातकाल और आपरेशन ब्लू स्टार के लिए भी इंदिरा गांधी की आलोचना की। उनके बोल इतने सीधे और तीखे होते थे कि इंदिरा गांधी के साथ ही पूरी पार्टी तिलमिला जाती थी। चंद्रशेखर हमेशा अपने तथ्यों ओर तर्कों से कांग्रेस को निरुत्तर करते रहे और एक हद तक अपने सामने सत्ता को झुकाने में सफल होते रहे। जिंदा चंद्रशेखर ने तो यह काम बखूबी किया ही मरने के बाद भी वो कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़े। 8 जुलाई 2007 को जब उनका निधन हुआ तो एक बार फिर कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार को उनकी मृत शरीर के आगे झुकना पड़ा। 

चंद्रशेखर, अटल और नरसिम्हा राव।

यमुना के किनारे कैसे हुआ चंद्रशेखर का दाह संस्कार

चंद्रशेखर के देहावसान के बाद देश भर से उनके समर्थक और राजनीतिक कार्यकर्ता दिल्ली आने लगे। चंद्रशेखर के परिवार और समर्थकों की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में यमुना के किनारे किया जाए। जहां पर देश के अन्य प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और वरिष्ठ राजनेताओं का दाह संस्कार हुआ है। चंद्रशेखर के लंबे समय तक सहयोगी रहे एचएन शर्मा कहते हैं कि, ‘‘ अध्यक्ष जी की भी इच्छा थी कि उनका अंति संस्कार यमुना के किनारे ही किया जाए। एक बार बात ही बात में उन्होंने मुझसे कहा था कि मेरा अंतिम संस्कार इंदिरा जी के बगल ही होना चाहिए।’’ 

राजघाट के आस-पास किसका दाह संस्कार किया जाएगा इसकी देख-रेख एक समिति करती है। इस समिति में केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री और दिल्ली के उप राज्यपाल सदस्य होते हैं। कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार दिल्ली की सत्ता पर तो अपना जन्मजात अधिकार मानती ही है। राजघाट के आस-पास के क्षेत्र को भी वह अपने परिजन और अपने चाटुकार राजनेताओं के लिए सुरक्षित रखना चाहती है। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। उन पर चंद्रशेखर जी का बहुत एहसान था। लेकिन सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर उन्हें इस लायक नहीं छोड़ा था कि वे अध्यक्षजी के अंतिम संस्कार में सहयोग कर उससे उबर सकें।

चंद्रशेखऱ और सोनिया गांधी।

शिवराज बने सोनिया गांधी के दूत

तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने चंद्रशेखर के अनन्य सहयोगी एचएन शर्मा और उनके परिजनों को संदेश दिया कि, ‘‘ आप लोगों को राजघाट के पास दाह संस्कार की जिद छोड़कर चंद्रशेखर जी का दाह संस्कार भोंड़सी में करना चाहिए। भोंड़सी उनकी कर्मभूमि रही है। बाद में वहीं उनका स्मारक बनाया जाएगा।’’ लेकिन तब तक भोंड़सी कानूनी लड़ाई का शिकार बन कर विवादों में घिर गया था। समर्थकों को यह सलाह रास नहीं आई। पूर्व मंत्री एवं उद्योगपति कमल मोरारका ने चंद्रशेखर के अनन्य सहयोगी एचएन शर्मा से बात की। मोरारका ने कहा कि, पीवी नरसिंह राव के मामले में भी कांग्रेस और सोनिया गांधी का यही रुख था। बाद में केंद्र सरकार ने नरसिंह राव के परिवार में फूट डालकर उनके शव को हैदराबाद ले जाने के लिए सहमत कर लिया था। ऐसे में आप अध्यक्ष जी के दोनों पुत्रों पंकज और नीरज को हर जगह अपने साथ रखिए। एचएन शर्मा पंकज और नीरज को लेकर गृहमंत्री शिवराज पाटिल से मिले। पाटिल ने शर्मा से कहा कि यदि राजघाट के पास दाह संस्कार की अनुमति नहीं मिली तो आप क्या करेंगे? आपके पास क्या विकल्प है? 

एचएन शर्मा इस सवाल के लिए पहले से तैयार थे और इसका जवाब भी उनके पास था। उन्होंने कहा कि, ‘‘राजघाट क्षेत्र में दाह संस्कार की अनुमति न मिलने पर हम लोग अध्यक्षजी का दाह संस्कार निलंबित कर देंगे और अनुमति मिलने का इंतजार करेंगे। 3 साउथ एवेन्यू में शव को सौ साल तक सुरक्षित रखने के लिए लंदन के एक विशेषज्ञ से बात हो गई है। वह शाम तक दिल्ली आ जाएगा। शव को सुरक्षित रखने के लिए जो खर्च आएगा उसका एक हिस्सा अग्रिम दिया जा चुका है। ’’यह सुनते ही शिवराज पाटिल के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। पाटिल ने कहा कि “आप ऐसा मत करिए। आप लोग दो मिनट रुकिए मैं आकर बताता हूं”। इसके बाद वे बैठक से उठे और अंदर जाकर टेलीफोन पर किसी से उन्होंने बात की। चंद मिनटों में ही वे आए और कहा कि जाइए दाह संस्कार की तैयारी करिए। मैडम यानी सोनिया गांधी सहमत हो गई हैं।

एचएन शर्मा कहते हैं कि,‘‘ हम लोग पाटिल की कोठी से निकलने ही वाले थे कि एक फोन आया। पाटिल साहब अंदर चले गए। हम लोग बाहर निकल आए। इतने में पाटिल फिर लगभग दौड़ते हुए आए और कहा कि आप लोग दस जनपथ जाकर मैडम से मिलिए वे इंतजार कर रही हैं। शर्मा दस जनपथ आए। सोनिया गांधी से मुलाकात हुई। सोनिया ने शर्मा से मुखातिब होते हुए कहा कि, ‘‘चंद्रशेखर जी आप लोगों के ही नहीं हम सब के भी नेता रहे हैं। आपकी जहां इच्छा हो वहां उनका अंतिम संस्कार करिए।’’

वे लोग दस जनपथ से निकले ही थे कि दिल्ली के तत्कालीन उप राज्यपाल तेजिंदर खन्ना का फोन आया कि आप लोग आकर जगह देख लीजिए। शर्मा कहते हैं कि,‘‘ जब हम लोग राजघाट क्षेत्र में पहुंचे तो दिल्ली प्रशासन दाह संस्कार के लिए साफ-सफाई में लगा था। यह स्थान इंदिरा गांधी के स्मारक शक्ति स्थल के पास ही है। इस तरह से वहां पर अध्यक्षजी का दाह संस्कार किया गया और उस स्थान का नाम जननायक स्थल रखा गया।’’ 

चंद्रशेखर बाकी पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ।

चंद्रशेखर की बेबाकी से हलकान रही कांग्रेस

चंद्रशेखर कितने बेधड़क, बेबाक और बेखौफ थे उसकी एक मिसाल देखिए। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से राजनीति शुरू करने वाले चंद्रशेखर पहले बलिया के जिला सचिव फिर उत्तर प्रदेश के संयुक्त सचिव और प्रदेश महासचिव बनाए गए। 1962 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए। लेकिन तीन साल बाद ही चंद्रशेखर कांग्रेस में जाने का मन बना लिए। भारतीय राजनीति में उस समय इंदिरा गांधी सर्वशक्तिमान मानी जाने लगी थीं।  

जब जनवरी, 1965 में वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस में शामिल हुए तो उनसे इंदिरा गांधी ने पूछा था, “आप कांग्रेस में क्या करेंगे”? युवा चंद्रशेखर ने जवाब दिया कि “कांग्रेस को समाजवादी बनाऊंगा। तब इंदिरा ने कहाकि, अगर ऐसा नहीं हुआ तो? 

मैं कांग्रेस पार्टी को तोड़ने की कोशिश कंरूगा़ यदि इसमें भी नहीं सफल हुआ तो कांग्रेस छोड़ कर चला जाऊंगा”। चंद्रशेखर का यह बेधड़क जवाब था।

आपातकाल के कुछ पहले इंदिरा ने जब जयप्रकाश नारायण के खिलाफ अभियान चलाना शुरू किया तो चंद्रशेखर ने उन्हें आगाह करते हुए कहा था कि यह देश संतों के खिलाफ अभियान बर्दाश्त नहीं करता। जेपी संत हैं, लेकिन इंदिरा गांधी नहीं मानीं और देश ने उन्हें उखाड़ फेंका।   

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस में रहते हुए चंद्रशेखर कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बने तो यह क्रम आगे भी जारी रहा। जनता पार्टी के गठन में उनकी प्रमुख भूमिका रही। जिसने कांग्रेसी सत्ता को पहली बार दिल्ली से बेदखल किया। 1984 में बोफोर्स तोप घोटाले के बाद वीपी सिंह के साथ जनता दल के गठन में भी चंद्रशेखर का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उनका राजनीतिक जीवन विपक्ष का ज्यादा था। लेकिन अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया वो बहुतों को नसीब नहीं हुआ।










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