छत्तीसगढ़ में सत्ता तो बदली लेकिन नहीं बदला प्रशासन का रवैया

मुद्दा , , सोमवार , 13-05-2019


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। बस्तर में अक्सर एक नारा बुलंद होता रहा है "न लोकसभा, न विधानसभा सबसे ऊंची ग्राम सभा" ये अधिकार संवैधानिक तौर पर संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून में मिले हैं। पारम्परिक ग्राम सभा सर्वोच्च होती है। सरपंच व सचिव पंच एक सरकारी एजेंट होते हैं पूरा अधिकार पारम्परिक ग्रामसभा के पास होता है। ग्रामसभा के निर्णय सर्वमान्य व सर्वोच्च हैं।

बस्तर में पुलिस पर ग्रामीणों से मारपीट का आरोप कोई नई बात नहीं है। लेकिन बस्तर में पहली बार ऐसा होगा कि पुलिस मारपीट के खिलाफ ग्रामीण ग्राम सभा बुलाएंगे।

गौरतलब है कि बस्तर में लगातार हो रहे हिंसा, विकास और पुलिस अत्याचार और फर्जी मुठभेड़ को लेकर पहली बार दक्षिण बस्तर इलाके में ग्रामीण ग्राम सभा करेंगे। इस ग्राम सभा में लगभग दस गांव से अधिक महिला पुरूष भाग लेंगे, बैठक का मुख्य उदेश्य बस्तर विकास और शांति होगा।

बस्तर की समाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने बताया कि नक्सल प्रभावित इलाके में लगातार फर्जी मुठभेड़ और पुलिस मारपीट की शिकायतें आ रही हैं। अभी हाल ही में गोडेरास में ग्रामीणों ने फर्जी मुठभेड़ का आरोप लगाया और गांव के लोगों से मारपीट की बात सामने आई है। उन्होंने बताया कि पहली बैठक दंतेवाड़ा जिले के गोडेरास में शीघ्र होगी जहां पूरा गांव शामिल होगा और वे हाल ही में हुए फर्जी मुठभेड़ के बारे में अपनी व्यथा बतायेंगे, सोनी सोरी ने बताया कि गांव के लोगों का कहना है कि पुलिस और नक्सलियों के बीच चल रही लड़ाई से पूरा इलाका  और आस पास के गांव वाले भी परेशान हैं। इनका कहना है कि अब से हिंसा बर्दास्त नहीं की जाएगी, इनके लिए भी कोई ठोस कार्य योजना बनाने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही किसानों की कर्जा मांफी, जंगल वनाधिकार पट्टा , जमीन बेदखली के बारे मे भी  चर्चा की जायेगी। उन्होंने बताया कि ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर कलेक्टर, राज्य सरकार और मानव अधिकार संगठन को दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि बस्तर में पांचवीं अनुसूची लगी हुई है। इसलिए ग्राम सभा द्वारा निर्णय का महत्व काफी बढ़ जाता है। अब पीड़ित ग्रामीणों की आवाज ग्राम सभा के माध्यम से ही आगे बढ़ेगी। इसी तरह जिन-जिन इलाकों में आदिवासी पीड़ित हैं उन इलाकों में एक अभियान की तरह ग्राम सभा का आयोजन किया जायेगा।  ग्राम प्रमुखों ने घोषणा कर दी है कि  मंगलवार या बुधवार को विशेष ग्राम सभा का आयोजन होगा। इस ग्राम सभा में मुठभेड़ के  दिन क्या-क्या हुआ इसकी जानकारी ग्रामीणों से 

ली जायेगी। ग्राम सभा का मुख्य मुद्दा जल, जंगल, जमीन और जवानों के द्वारा की गई मारपीट का होगा। 

सभा के बाद ग्रामीणों का जो निर्णय होगा उसे देश के राष्ट्रपति, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थानों को भेजकर तत्काल कार्रवाई शुरू करने की मांग की जायेगी।

आपको बता दें कि 15 सालों से छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार रही थी उस दौरान बस्तर का वाकया किसी से छुपा नहीं है। एक उम्मीद के साथ छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई। लगा कि बस्तर में हिंसात्मक गतिविधियों पर लगाम को लेकर कोई कठोर कदम उठाया जाएगा लेकिन आज भी आदिवासियों के साथ नक्सली उन्मूलन के नाम पर मार-पीट और फर्जी गिरफ्तारियों और मुठभेड़ का दौर जारी है। 

जानिए क्या है पेसा अधिनियम-1996

पेसा कानून आदिवासी समुदाय की प्रथागत, धार्मिक एवं परंपरागत रीतियों के संरक्षण पर असाधारण जोर देता है। इसमें विवादों को प्रथागत ढंग से सुलझाना एवं सामुदायिक संसाधनों का प्रबंध करना भी सम्मिलित है। पेसा कानून एक सरल व व्यापक शक्तिशाली कानून है जो अनुसूचित क्षेत्रों की ग्रामसभाओं को क्षेत्र के संसाधनों और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण प्रदान करता है। यह अधिनियम संविधान के भाग 9 जो कि पंचायतों से सम्बंधित है का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार करता है। पेसा कानून के माध्यम से पंचायत प्रणाली को अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार किया गया है। विकेंद्रीकृत स्वशासन का मुख्य उद्देश्य गांव के लोगों को स्वयं अपने ऊपर शासन करने का अधिकार देना है।

‘‘पेसा कानून के अनुसार किसी भी ग्राम पंचायत में सरपंच, पंच व सचिव सर्वोच्च नहीं हैं ये सब पेसा ग्रामसभा के प्रति जवाबदेह व सभा की विश्वसनीयता तक ही कार्य कर सकते हैं, अनुसूचित क्षेत्र की संवैधानिक प्रावधान से निरक्षर जिला प्रशासन द्वारा सरपंच व पंच को सर्वोच्च दिखाकर ग्रामसभा के प्रस्ताव निर्णय को अमान्य किया जा रहा है जो कि संविधान की मूल व्यवस्था के विपरीत है।’’








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PRAVIN PATEL :: - 05-14-2019
Biggest problem not only in Bastar but in most of the fifth schedule areas where it is mandatory to consult villagers before any work is initiated in their village areas for which the competent authority is village council meeting which is popularly known as GRAM SABHA. There are procedures laid down in the Panchayat (Extension to Schedule areas) Act, 1996 popularly known as "PESA" . Lawful decisions taken by the Gram Sabha are supreme which can not be challenged in any court of law including Supreme Court of India. Now when we talk of Bastar, question of this government or that government can be raised but the fact remains that the police behaves in their own way to eliminate Naxals during which there are many examples of innocent having paid a heavy price including many killed, sent to jail on false charges and so on. Questions are raised, are those tribals not equal citizens of this country ? Are those tribals paying a heavy price for their only fault that they are habitats of those area where state administration has miserably failed to administer those areas but money from the state treasury regularly flowed in those areas in the name of development, yes, those areas where there is practically no presence of any government agency. Even civil society people who raised voice of protest and supported the genuine concerns of the tribals have also been targeted. Yes. All these has happened in Chhattisgarh before and even now tribals are paying a heavy price. It is time, with change in government, we hope better sense prevails in the minds of those who are in charge and try to find a way forward where every one can live with peace and walk on the path of prosperity.

Samnath Kashyap piplawand :: - 05-13-2019
"न लोकसभा, न विधानसभा सबसे ऊंची ग्राम सभा" जय भीम ,जय गुन्डादूर