चीन के मामले में भी जुमला साबित हुआ मेक इन इंडिया का नारा, व्यापार घाटे में 51 गुना की बढ़ोतरी

मुद्दा , , रविवार , 25-03-2018


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गिरीश मालवीय

अमेरिका अपने हितों के प्रति चिंतित है इसलिए वह चीन से आने वाले सामानों पर आयात शुल्क बढ़ा रहा है, ट्रम्प का कहना है कि चीन के साथ अमेरिका का कारोबारी घाटा नियंत्रण के बाहर पहुंच गया है और आयात शुल्क लगाने का यह कदम कई अन्य कदमों का एक हिस्सा भर है।

इस ट्रेंड वार के आईने में आप जरा भारत और चीन के व्यापारिक सम्बंधों पर गौर फरमाएं। हाल के वर्षों में चीन से आयात असाधारण रफ्तार से बढ़ा है, लेकिन उसे किया जाने वाला भारतीय निर्यात सुस्त रहा है। 2017 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 18.6 प्रतिशत बढ़कर 5 लाख 48 हजार करोड़ रुपये की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया है लेकिन सच तो यह है कि चीन के साथ व्यापार भारत के लिए सदैव ही घाटे का सौदा रहा है।

साल 2003-04 में जो व्यापार घाटा मात्र 1.1 अरब डॉलर था वह बीते वित्त वर्ष में 51.1 अरब डॉलर दर्ज किया गया। यानी 14 सालों में व्यापार घाटा सीधा 51 गुना बढ़ गया।

आप सिर्फ 2016-17 के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि चीन ने भारत में 61.3 अरब डॉलर का माल निर्यात किया, जबकि भारत उसे महज 10.2 अरब डॉलर का ही निर्यात कर सका।

इसका प्रमुख कारण चीन की वह दोगली नीति है जिसमें चीन में निर्यात के क्षेत्र में भारतीय व्यापारियों को सीमित सुविधाओं के साथ प्रतिबंध का सामना करना पड़ता है। चीन ने कुछ ऐसे मानक तय कर रखे हैं, जिनकी वजह से भारतीय सामान चीनी बाजारों तक पहुंच ही नहीं पाते।

लेकिन हम क्या करते हैं इसका एक छोटा सा उदाहरण देता हूं सस्ते खिलौने, फोन्स और इलेक्ट्रिक उत्पादों के क्षेत्र में भारत की फैक्ट्रियों को तबाह कर देने के बाद चाइनीज कंपनियों की नजर अब यहां के ऑटोमोबाइल सेक्टर पर गड़ी हुई है।

भारतीय यात्री वाहन बाजार सबसे तेजी से बढ़ रहा है। माना जा रहा है कि भारत 2020 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार होगा। यही कारण है कि चाइनीज ऑटो निर्माता कम्पनियों की लार इस क्षेत्र में टपक रही है।

2016-17 में चीन से 27.8 करोड़ डॉलर का एफडीआई भारत में आया और इसका 60 फीसदी हिस्सा ऑटोमोबाइल सेक्टर में था।

चीन की दिग्गज ई-व्हीकल कंपनी बीवाईडी को इलेक्ट्रिक बसों की सप्लाई का एक बड़ा ठेका मोदी सरकार ने दे दिया है।

प्रतिस्पर्धी भारतीय कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि यह सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के मुताबिक नहीं है। उनका कहना है कि बीवाईडी को टेंडर मिलने से भारत के बजाय चीन में नौकरियां पैदा होंगी। उनका कहना है कि बीवाईडी को चीन में रियायती कर्ज और सब्सिडी मिलती है। इसलिए उसका मुकाबला करना हमारे लिए आसान नहीं होगा।

साफ फर्क दिखता है कि अमेरिका अपने देशवासियों के हितों में चीनी इम्पोर्ट पर ड्यूटी बढ़ाता है और मेक इन इंडिया और भारत के उत्पाद निर्माताओं को धता बताते हुए मोदी सरकार चीन से आयात को प्रोत्साहित करती है।

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)










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