झारखंड में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के सदस्य के तौर पर काम करते हुए सामने आई ईनामी नक्सलियों की तस्वीर

ज़रा सोचिए... , , सोमवार , 17-12-2018


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रुपेश कुमार सिंह

हिंदुस्तान अखबार में छपी इस तस्वीर में सीआरपीएफ कोबरा की वर्दी व अत्याधुनिक हथियार के साथ जो दो जवान दिख रहे हैं। इनके बारे में जानकर किसी को भी हैरानी होगी।

दरअसल ये दोनों झारखंड सरकार द्वारा प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) के ईनामी नेता हैं और यह तस्वीर किसी फोटो सेशन की नहीं बल्कि सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन द्वारा भाकपा (माओवादी) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की है। (तस्वीर लातेहार, पलामू या गुमला जिले की हो सकती है)

आपको जानकर हैरानी होगी कि हाथ में AK-56 लिए हुए शख्स का नाम पप्पू लोहार है, जिस पर झारखंड सरकार ने 10 लाख का ईनाम घोषित कर रखा है और हाथ में मोर्टार या ग्रेनेड लांचर लिये दूसरे शख्स का नाम सुशील उरांव है, जिस पर झारखंड सरकार ने 5 लाख का ईनाम रखा हुआ है।

अब शायद तस्वीर पूरी साफ होने लगी हो। आखिर झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में माओवादियों को खत्म करने के लिए सरकार किस नीति पर चल रही है। सभी जगह विभिन्न समय-काल में कई छद्म 'नक्सली' संगठन (सशस्त्र अपराधियों का संगठित गिरोह) सरकार या पुलिस के द्वारा बनाये गये हैं और माओवादियों के खात्मे के नाम पर बड़ी बेरहमी से इन संगठनों द्वारा आदिवासियों-मूलवासियों का कत्लेआम किया गया है,

उनके घरों को जलाया गया है, उनकी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तक किये गये हैं। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम, माकपा के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में हर्मद वाहिनी व अभी भैरव वाहिनी इसी तरह के सरकार पोषित संगठनों के कुख्यात नाम हैं।

इसी तरह एमसीसीआई व भाकपा (माले) पीपुल्स वार के विलय यानी 21 सितम्बर 2004 के बाद खासकर झारखंड में कई छद्म 'नक्सली' संगठन सरकार व पुलिस के द्वारा बनाये गये, जिसमें तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी), झारखंड प्रस्तुति कमेटी (जेपीसी), नागरिक सुरक्षा समिति (नासुस), झारखंड लिबरेशन टाइगर (जेएलटी) या पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट आफ इंडिया (पीएलएफआई), झारखंड जन मुक्ति परिषद (जेजेएमपी) आदि प्रमुख नाम हैं।

इन तमाम संगठनों पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कई विपक्षी नेताओं आदि ने पहले भी आरोप लगाए हैं कि इनका संचालन पुलिस के बड़े अधिकारियों द्वारा ही होता है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तो विधानसभा में भी कहा था कि टीपीसी का गठन तत्कालीन डीजीपी बीडी राम के आदेश पर हुआ है। (बीडी राम अभी चतरा से भाजपा के सांसद हैं।)

खैर, अभी बात हो रही है जेजेएमपी की, इस संगठन पर चर्चित बकोरिया मुठभेड़ के समय भी आरोप लगा था (जिसकी जांच अभी उच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई कर रही है, वैसे सीबीआई जांच रोकने के लिए झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रही है)।

बकोरिया मुठभेड़ में आरोप लगा था कि जेजेएमपी व पुलिस ने मिलकर माओवादी नेता अनुराग व 11 आम लोगों की हत्या कर दी थी (वैसे माओवादियों ने उस समय प्रेस बयान जारी कर कहा था कि अनुराग पार्टी से गद्दारी करके जेजेएमपी में शामिल होने जा रहा था लेकिन जेजेएमपी को अनुराग पर विश्वास नहीं हुआ और उसके साथ गये 11 आम ग्रामीणों को भी पकड़कर जेजेएमपी व पुलिस ने गोली मार दी थी। साथ ही माओवादियों ने आरोप लगाया था कि अनुराग के पास कई अत्याधुनिक हथियार थे, जो कि पुलिस ने जेजेएमपी को दे दिया और जेजेएमपी के खराब व पुराने हथियारों को मुठभेड़ से रिकवरी के रूप में दिखाया गया)।

अब सवाल उठता है कि अब जब सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के साथ इन दोनों ईनामी नक्सलियों की तस्वीर सामने आयी है, तो क्या सरकार इसकी किसी विश्वसनीय संस्था से जांच कराकर जेजेएमपी के साथ सांठ-गांठ रखने वाले पुलिस अफसरों पर कार्रवाई करेगी या फिर कोई बहाना बना लिया जाएगा ?

(रुपेश कुमार सिंह की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।) 








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