डोकलाम में कूटनीति के नाम पर संघी किस्म की चालाकियों से भारत को होगा नुकसान

माहेश्वरी का मत , , मंगलवार , 25-07-2017


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अरुण माहेश्वरी

जून महीने से डोकलाम के सवाल पर भारत चीन के बीच विवाद अपने चरम पर है। उस विवादित क्षेत्र पर अपने अधिकार के बारे में तमाम दस्तावेज़ों के उल्लेख के साथ ही चीन साफ शब्दों में भारत को धमकी दे रहा है कि वह इस क्षेत्र में अपने अनुप्रवेश को फ़ौरन ख़त्म करें। इस बारे में किसी भी प्रकार के तीर-तुक्के की चालें न खेले वर्ना उसे वही सबक़ सीखने के लिये तैयार रहना होगा, जो 1962 में सिखाया गया था। चीन ने यह बात कल फिर दोहराई है और भारत को ग़ैर-यथार्थवादी भ्रम में न रहने तक के लिये कह दिया है। 

चीन ने शुरू की चौतरफा घेरेबंदी

चीन के प्रतिरक्षा मंत्रालय ने यहां तक कहा है कि पहाड़ को हिलाना आसान है, लेकिन चीन की जन सेना को डिगाना नहीं। उसने इसी संकट के नाम पर दोनों पक्षों के बीच हर द्विपक्षीय वार्ता की संभावना से इंकार कर दिया है। चीन के अखबार 'ग्लोबल टाइम्स' ने लिखा है कि "भारत की तरह का एक अराजक पड़ोसी जिस भाषा को समझ सकता है, उसे उसी भाषा में जवाब दिया जाना चाहिए।"

भारत-चीन का झंडा।

सबक़ सिखाने की धमकी, युद्ध की हुंकारों और ऐसी तमाम बातों के परे, इस पूरे प्रसंग में अब तक की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारत सरकार ने इस विषय में अब तक भी दुनिया के सामने अपने पक्ष की कोई सफाई पेश नहीं की है। संघ परिवारियों के कुछ फेक ख़बरें गढ़ने के लिये बदनाम वेब साइट्स पर इस विषय में रोज़ाना लंबे-चौड़े दस्तावेज़ जरूर अपलोड किये जाते हैं, लेकिन उनका दो कौड़ी का भी दस्तावेज़ी मूल्य नहीं दिखाई देता है। वे आरएसएस की रोज़ाना झूठ गढ़ने वाली फ़ैक्टरियां दिखाई देती हैं। 

मौसमी रक्षा विशेषज्ञों के हवाले कूटनीति

उनके अलावा, मौके-बेमौके कुकरमुत्तों की तरह उग आने वाले कुछ मौसमी रक्षा विशेषज्ञों की भी एक फ़ौज उतरी हुई है। उसे भी चैनलों के मूर्ख ऐंकरों की तरह उटपटांग ढंग से चीख़ते-चिल्लाते देखा जा सकता है। ये तथ्यों के बल पर ढंग की एक बात नहीं कहते, कोरी दांव-पेंच की अप्रमाणिक बातों को रणनीतिक चिंतन बना कर हांकते रहते हैं। ऊपर से, आरएसएस ने दिन-रात मूंछों पर ताव देने वाले कदम-ताल करते पूर्व-सैनिक नामधारी फ़ौजी बूटों को चैनलों को रौंदने के लिये पहले से ही लगा रखा है। 

भारतीय मीडिया पर चल रही इन थोथी और निरर्थक क़वायदों के अतिरिक्त, वास्तव में अब तक जो ठोस रहा है, वह हम्बर्ग में मोदी जी की शी पिंग से सीधे बातचीत की पेशकश थी। लेकिन उसमें डोकलाम का सवाल भी उठा, इसे कोई नहीं कह रहा है। चीन तो दोनों के बीच आपसी, द्विपक्षीय बातचीत से ही मुकर रहा है। भारत की ओर से इशारों-इशारों में जरूर कहा जा रहा है कि बात हुई है। 

इसके अलावा, इस विषय में राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज ने एक सर्वदलीय बैठक की है। उसमें भी सरकार ने अपने पक्ष को कितना रखा, कितना छिपाया, पता नहीं। अख़बारों की रिपोर्ट से सरकारी पक्ष के बारे में कोई समझ नहीं बनती है। इतना जरूर पता चलता है कि सभी दलों ने इस मामले को जल्द कूटनीतिक उपायों से ख़त्म करने का परामर्श दिया है। 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संसद में।

सुषमा ने भी की गोलमोल बातें

चार दिन पहले लोकसभा में सुषमा स्वराज गोल-मोल भाषा में अपनी कूटनीतिक पहलकदमी के बारे में जो कुछ बोल रही थीं, चीन ने उस पर दो टूक टिप्पणी करते हुए सुषमा स्वराज पर झूठ बोलने तक का आरोप लगा दिया। 

अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल बीजिंग पहुंचे हुए हैं। चीन बदस्तूर अपनी ज़िद को दोहरा रहा है कि डोभाल कोई बात करें, उसके पहले भारत को बिना शर्त अपने सैनिकों को हटा लेना होगा। अभी-अभी यह भी सुनने में आया है कि चीन ने डोभाल से कोई बात करने से इंकार करते हुए एक 'स्कीमबाज' कह कर उनका भी पानी उतार दिया है। 

जरूरत है कूटनीतिक परिपक्वता की

क्रमश: एक बात साफ होती जा रही है कि कूटनीति को संघी क़िस्म की ओछी चालाकियों से दूर न रखा गया तो उसकी सफलता की रत्ती भर भी कोई कल्पना नहीं कर सकता है। लेकिन मोदी और उनके सारे लोग अपनी इस एक प्रकार की आनुवंशिक बीमारी से मुक्त ही नहीं हो पा रहे हैं, और इसीलिये हर बीतते दिन के साथ परिस्थिति जटिल से जटिलतर होती जा रही है। विदेश सचिव जयशंकर अपनी कूटनीतिक परिपक्वता की जो शेखी बघार रहे थे, वह निहायत बचकानी प्रमाणित हो रही है। आज की स्थिति यह है कि चीन की ओर से कहा जा रहा है कि वह डोकलाम के विवादित क्षेत्र में मौजूद भारतीय सैनिकों को बंदी बना लेगा, लेकिन भारत सरकार के पास इस चेतावनी का भी कोई जवाब नहीं है। 

कुल मिला कर, डोकलाम के पूरे मसले से निपटने में मोदी सरकार ने अब तक जरा भी दूर-दृष्टि का परिचय नहीं दिया है। समय बिताने की चालाकियां कूटनीति में ख़ुद आपके खिलाफ काम करने लगती हैं। 

(अरुण माहेश्वरी साहित्यकार और स्तंभकार होने के साथ ढेर सारी किताबों के लेखक हैं। और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)










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Manvendra Singh :: - 07-26-2017
Ye mahasay saayad Congress wale Hai?