रेशनलिस्ट नरेंद्र नायक ने कहा-हिंदुत्व समूहों की प्रयोगशाला है कर्नाटक

इंटरव्यू , , मंगलवार , 12-09-2017


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केदार नागराजन

5 सितंबर की शाम को बेंगलुरु में एक वरिष्ठ पत्रकार और गौरी लंकेश पत्रिके की संपादक गौरी लंकेश की उनके ही घर के बाहर हत्या कर दी गई। लंकेश को उनके बेबाकपन के लिए जाना जाता है। कर्नाटक की हिन्दुत्व राजनीति हमेशा उनकी कलम के निशाने पर रही। उन्होंने राज्य के ताकतवर व्यापारियों और संस्थाओं के काले कारनामों के बारे में भी खुलकर लिखा। जैसे ही लंकेश की हत्या की खबर सामने आई, कई मीडिया संस्थान उनकी और उन तीन नामी बुद्धिवादियों की हत्याओं में समानताएं ढूंढने लगे जिन्हें इसी तरह मौत के घाट उतारा गया था। 2013 में, नरेंद्र दाभोलकर को पुणे में तब गोली मार दी गई थी जब वह सुबह सैर पर निकले थे, 2015 में सीपीआई के सदस्य गोविंद पंसारे की कोल्हापुर में उनके घर के पास गोली मार कर हत्या कर दी गई थी और 2015 में ही एमएम कलबुर्गी को धारवाड़ में उनके घर के अंदर घुसकर गोली मार दी गई थी।

7 सितंबर को द कारवां के वेब रिपोर्टर केदार नागराजन ने फेडरेशन ऑफ इंडियन रेशनलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र नायक से मुलाकात की। नायक ने कलबुर्गी, दाभोलकर और लंकेश के साथ मिलकर काम किया है। इस बातचीत के दौरान नायक ने लंकेश के साथ किए काम के बारे में बात की, जिसमें आरटीआई कार्यकर्ता विनायक बालिगा की हत्या के मामले में खोजबीन करना भी शामिल है, जिसकी मार्च 2016 में कोडियाबेल में उनके घर के पास हत्या कर दी गई थी। उन्होंने कर्नाटक और पूरे देश में हो रही इन हत्याओं के पीछे के कारणों पर भी अपने विचार रखे।

 पंसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी और लंकेश।

केदार नागराजन: आप पहली बार गौरी लंकेश से कब मिले? क्या आप उनके साथ किए काम के बारे में विस्तार से बता सकते हैं?

नरेंद्र नायक: हम पहली बार 1992 में मिले थे। मेरी उनके पिता (कवि और पत्रकार पी. लंकेश, जो लंकेश पत्रिके नाम का अखबार चलाते थे) के साथ बहुत अच्छी जान पहचान थी। उन्होंने ही मुझे एक एक्टिविस्ट बनने के लिए प्रोत्साहित किया। मुझे कॉलेज से बाहर निकाले जाने की कोशिश हो रही थी, उन्होंने मुझसे पूछा तुम्हें कितना वेतन मिलता है और उस वक्त कुछ हजार ही मिलते थे। उन्होंने मुझसे पूछा, " तुम्हे नहीं लगता कि इतने पैसे तुम बिना कॉलेज के भी कमा सकते हो?" इसी बात ने मुझे प्रोत्साहित किया। दोनों पिता और बेटी उस आंदोलन का समर्थन करते जिसे उनके सहारे की जरूरत होती और वो लगातार ऐसा करते। वह एक निडर मीडिया एक्सटिविस्ट थीं, और जब भी हमारे बीच मतभेद हुआ, मैं कहना चाहूंगा कि उन्होंने जो किया पूरे विश्वास के साथ किया। वह एक ईमानदार एक्टिविस्ट थीं, उनमें बहुत हिम्मत और दृढ़ विश्वास था। 

हम दोनों ने मिलकर हनुमंत राय अप्पा नाम के आदमी का पर्दाफाश किया, जो अपने पास अलौकिक शक्तियां होने का दावा करता था। इसका खुलासा नेशनल कॉलेज में हुआ। गौरी ने हमारे (FIRA) ज्यादातर आंदोलनों का समर्थन किया, और पिछले दो सालों में हम बतौर सहयोगी बेहद करीब आए। आखिरी दो मामले जो मुझे याद आते हैं, जिनमें हमने लगभग साथ ही काम किया, वो यह विनायक बालिगा की हत्या का मामला था। मार्च 2016 के बाद से ही हम मामले के हर पहलू पर काम कर रहे थे। वरना मैं ही उन्हे कॉल किया करता था जब भी मुझे लगता कि किसी मामले को किसी तरह के प्रचार की जरूरत है। वह तुरंत एक रिपोर्टर भेज देतीं जब भी मुझे मदद चाहिए होती। दूसरा मामला जिसपर हमने साथ काम किया वो यह धर्मस्थला ( दक्षिण कर्नाटक का 800 साल पुराना बहुप्रसिद्ध मंदिर) के धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े का है। वो कई अपराधों में शामिल रहा है लेकिन किसी ने उसके खिलाफ लिखने की हिम्मत नहीं की। भूमि अधिग्रहण से लेकर बलात्कार और हत्या जैसे अपराध और यह लंकेश ही थीं जिन्होंने ये देखा कि सारी जरूरी जानकारियां प्रकाशित होनी चाहिए। इस मामले में मुझे उनका पूरा समर्थन मिला।

एक और चीज जो मुझे याद है- दाभोलकर की हत्या के अगले दिन, गौरी और मैंने ही प्रदर्शन किए और कर्नाटक में अंधविश्वास के खिलाफ कानून लागू करने की मांग की। हमने कई मौकों पर एक दूसरे के साथ काम किया और एक दूसरे का समर्थन किया। मैं बस ये बातें बयां नहीं कर सकता। कर्नाटक में सभी प्रगतिशील ताकतें एक साथ हैं।

केदार नागराजन: आप दाभोलकर के भी करीबी सहयोगी रहे हैं। क्या आपको भी इनकी हत्याओं में समानताएं दिखती हैं?

नरेंद्र नायक: उनकी और दाभोलकर, कलबुर्गी और पनसारे की हत्याओं में एक समानता है। मुझे लगता है कि जो हथियार इस्तेमाल किए गए वो एक जैसे थे। यह लोगों की एक साजिश है- एक तरह का गैंग है जो प्रगतिशील आवाजों को दबाने का काम कर रहा है। मैं भी कई लोगों की लिस्ट में शामिल हूं। ये सारे निहित स्वार्थ, वो लोग जो अंधविश्वासी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं, एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। 

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया श्रद्धांजलि देते।

केदार नागराजन:  आपको क्यों लगता है कि इन हत्याओं में समानताएं हैं? ये बुद्धिवादी लोग ऐसा क्या पता लगा रहे थे?

नरेंद्र नायक: ये कोई एक खोज नहीं है; ये कई परिस्थितियों का मेल है जो इन स्वार्थ भरी ताकतों को हमे मिटाने के लिए एक कर रही है। अगर मैं कलबुर्गी की बात करूं, उन्हें उनकी लिंगायत और वीराशैवस पर की गई गंभीर रिसर्च के लिए मारा गया। अपनी रिसर्च के जरिए वो इस नतीजे पर पहुंचे कि ये दो समुदाय एक दूसरे से भिन्न हैं। उनका मानना था कि वीराशैवस हिन्दू हैं और जातिवाद में विश्वास रखते हैं, जबकि लिंगायत ऐसा नहीं मानते। इस वक्त शैक्षिक जगत में यह एक बड़ा विवाद है। इन समुदायों में कई गुट थे जो उन्हें खत्म करना चाहते थे। आप इन सब की जननी को भी अच्छी तरह से जानते हैं, सनातन संस्था, जो, मुझे लगता है, हर उस शख्स की मदद करता है जो इस तरह का अपराध करना चाहते हैं। [उनकी वेबसाइट के मुताबिक, संस्था का निर्माण इसलिए हुआ था ताकि उन लोगों के लिए आध्यात्मिकता को विज्ञान की भाषा में पेश किया जाए जो आध्यमिकता के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं। जिस दिन दाभोलकर की हत्या हुई, उस दिन इसके संस्थापक जयंत अठाले का बयान छापा गया, जिसमें लिखा था, दाभोलकर की हत्या भगवान का आशीर्वाद है।]

अगर आप गौरी लंकेश की हत्या की बात करें, तो ये सीधे तौर पर देखा जा सकता है कि उन्होंने कई निहित स्वार्थ वाले लोगों पर हमला बोला। जैसे कि, धर्मस्थल एक ऐसी जगह है जहां करोड़ों का विशाल हिंदू मंदिर है। उन्होंने हमेशा मंदिर को चलाने वाले ट्रस्ट द्वारा की जा रही गड़बड़ियों का खुलासा किया। दूसरा, विनायक बालिगा मामले में भी उन्होंने हमारी पूरी तरह से मदद की, केस के मुख्य अभियुक्त नरेश शिनॉय के आरएसएस के साथ गहरे संबंध बताए जाते हैं। बालिगा की हत्या के बाद उन्होंने काशी मठ के खिलाफ और बेबाकी से लिखा [काशी मठ एक आध्यात्मिक संस्था है, जिसके गौड़ सारसवत ब्राहमण समुदाय अनुयायी हैं, जिनके खिलाफ बालिगा ने अवैध तरीके से भूमि हस्तांतरण का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया था]। यानि, इन सभी चीजों की वजह से ही उनकी हत्या की गई। विनायक बालिगा मामले में, कांग्रेस भी मौन रूप से अपराधियों का साथ दे रही थी, जो संयोग से नमो ब्रिगेड का संस्थापक रहे [एक युवा संस्था जिसका गठन कर्नाटक में 2014 के आम चुनावों से पहले किया गया ताकि नरेंद्र मोदी के लिए समर्थन जुटाया जा सके।]

शोक संतप्त परिजन।

केदार नागराजन:  इन सभी हत्याओं में एक और समानता है कि ये सभी क्षेत्रीय भाषाओं में लिखते थे। क्या इसके पीछे भी कोई कारण है?

नरेंद्र नायक: बेशक, क्योंकि सीमित क्षेत्र में उनकी पहुंच ज्यादा है। धर्मस्थल के बाहर शायद ही किसी ने वीरेंद्र हेगड़े का नाम सुना हो। लेकिन धर्मस्थल में उनका एक बड़ा माफिया है। वो लोगों के खिलाफ मानहानि का केस करेंगे, वो न्यायपालिका को डराएंगे और बहुत कुछ करेंगे। ये सब चीजे बमुश्किल ही अंग्रेजी में लिखने वाले लोगों की नजर में आती हैं। 

केदार नागराजन: इन सभी मामलों में चाहे दाभोलकर हों, पनसारे हों, कलबुर्गी हों या बालिगा हों अभी तक किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया। क्या आपको लगता है कि लंकेश की हत्या के मामले में कुछ अलग होगा?

नरेंद्र नायक: मुझे उम्मीद है कि हालात एक जैसे नहीं हैं। जैसा मैंने कहा शीर्ष पर बैठे लोगों का मौन समर्थन ही ग्राउंड लेवल पर काम करने वालों को समर्थन देता है। यह हम लोगों ने देखा है। हर मामले में आप देखोगे कि सबूतों को मिटाने की कोशिश हुई है, अभियोजन पक्ष से धीरे काम करने को कहा गया है, गवाहों को धमकाया गया है और सबूतों को नष्ट किया गया है। विनायक बालिगा के मामले में, सभी आरोपी जेल से बाहर हैं। लंकेश के भाई, जो कि भाजपा से हैं, अब कह रहे हैं कि यह वामपंथियों ने किया है केवल मामले को एक अलग मोड़ देने के लिए।

केदार नागराजन:  आपकी नजर में उनकी हत्या की टाइमिंग का क्या कारण है?

नरेंद्र नायक: शायद इसलिए क्योंकि इस तरह का हंगामा आने वाले चुनावों से लोगों का ध्यान भटकाता है ताकि चुनावी मुद्दों पर ज्यादा न दिया जाए। इस तरह की हत्याओं से ये भी साबित किया जा सकता है कि मौजूदा सरकार राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम है। पुलिस ने भी मुझे बताया कि चूंकि चुनाव आने वाले हैं तो उन्हे ज्यादा ध्यान रखना होगा और सुरक्षा भी बढ़ानी होगी।

विरोध में प्रदर्शन।

केदार नागराजन:  इनमें से किसी भी मामले में, क्या किसी भी कारण से आपको ये लगा कि इसमें पुलिस भी मिली हुई है?

नरेंद्र नायक: अभी तक, मुझे ऐसा कुछ नहीं नजर आया। मुझे नहीं लगता कि स्थानीय पुलिस इतनी बुरी है। वो शिक्षा के लिए और समाज में बदलाव लाने वालों के प्रति सहानुभूति रखते हैं।

केदार नागराजन:  क्या आपको लगता है शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिवादियों को सुरक्षा दी जानी चाहिए जो मौजूदा व्यवस्था से असहमति रखते हैं।

नरेंद्र नायक: मैं जब भी मैंगलोर में होता हूं तो 24 घंटे पुलिस की सुरक्षा में होता हूं। मुझमें मेरी यात्राओं के बारे में पहले से जानकारी देने के लिए मना किया गया है, तो मैं ये भी नहीं करता। जब में मैंगलोर में उतरता हूं मेरे बॉडीगार्ड मेरे साथ होते हैं। जब मैंने गौरी से इन सुरक्षा चिंताओं के बारे में बात कर रहा था, तो वो हंसी और बोलीं कि ये सब उनके लिए काम नहीं करेगा। शायद उन्हें लगा होगा कि ये उनके और लोगों की बातचीत में बाधा बनेंगे। मैंने उन्हें चेतावनी भी दी थी क्योंकि 2015 में कुछ कन्नड़ अखबारों ने - नाम मुझे याद नहीं आ रहा- एक टार्गेट लिस्ट छापी थी जिसमें वो तीसरे नंबर पर थीं और मैं सातवें नंबर पर। उनको यकीन था कि उन्हें सुरक्षा की जरूरत नहीं पड़ेगी और उन्हें कोई नहीं मारेगा। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी गलती थी। कलबुर्गी को भी सुरक्षा दी गई थी, बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें अब इसकी जरूरत नहीं है- जिसके कुछ महीने बाद ही, उनकी हत्या कर दी गई। विनायक बालिगा कोई बुद्धिवादी नहीं थे, वो भाजपा के आदमी थे, लेकिन भाजपा असहमति जताने वाले अपने लोगों को भी मारने से नहीं कतराती।

केदार नागराजन:  क्या आपको लगता है केंद्र सरकार ने इन सभी मामलों में उदासीन रवैये का प्रदर्शन किया है?

नरेंद्र नायक: हां, इस सरकार के अंतर्गत उदासीनता बढ़ी है और इस तरह के अपराध करने वालों का संरक्षण भी बढ़ा है। उनके भाई कह रहे हैं सीबीआई जांच का आदेश दिया जाए, लेकिन हम सब जानते हैं कि सीबीआई मौजूदा सरकार का तोता है। मौजूदा सरकार ने भी सीबीआई पर इस तरह के आरोप लगाए हैं जब वो विपक्ष में थे। एक बार ये अपराधी राज्य से बाहर गए, उन्हें वहां से सुरक्षा मिलेगी और उस वक्त कुछ भी नहीं किया जा सकेगा। यहां तक कि एसआईटी भी कुछ नहीं कर पाएगी। यह हत्या पेशेवर तरीके से प्लान कर की गई है।

हत्या के विरोध में प्रदर्शन।

केदार नागराजन:  क्या उदासीनता का ये अर्थ सिविल सोसाईटी की प्रतिक्रिया में भी परिलक्षित होता है?

नरेंद्र नायक: सिविल सोसाइटी बहुत परेशान है। पिछले साल अगस्त में, हमने 10,000 से 15,000 लोगों के साथ मिलकर धारवाड़ में मार्च किया था, कलबुर्गी मामले में सबूतों के अभाव और कोई गिरफ्तारी नहीं किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया था। गौरी लंकेश की हत्या मामले में कट्टर राइट के अलावा सभी हमारे साथ हैं। सभी कह रहे हैं ऐसा नहीं करना चाहिए था।

केदार नागराजन: तीन हत्याएं- कलबुर्गी, बालिगा और अब लंकेश- कर्नाटक में हुई हैं।

नरेंद्र नायक: अगर सभी निहित स्वार्थ एक साथ मिल जाएं और लोगों के खिलाफ साजिश करें और ऊपर से उन्हे समर्थन हासिल है, तो वो बच जाएंगे। करावली कर्नाटक [दक्षिण कन्नड, उदुपी औप उत्तर कन्नड के जिले] इन दिनों इस तरह की हरकतों और हिंदुत्व गुटों के लिए प्रयोगशाला की तरह है। कल नलिन कुमार कटील [कर्नाटक के भाजपा सदस्य]- एक बड़ा गुंडा- एक पुलिस अधिकारी पर चिल्ला रहा था और कह रहा था कि वो अधिकारी के नाम पर बंद का ऐलान करेगा। अगर सारी ताकत इस तरह के इंसान के हाथ हो, और उनके जो काशी मठ चला रहे हैं। धर्मस्थल में करीब 400 संदिग्ध मौतें हुई हैं। मरने वालों में ज्यादार महिलाएं हैं। 

केदार नागराजन:  मौतों से क्या आपका मतलब हत्याओं से हैं?

नरेंद्र नायक: मुझे पूरी तरह से कुछ नहीं पता लेकिन पुलिस ने इन मौतों को अप्राकृतिक बताया है। वो कहेंगे कि वो सभी नेत्रावति नदी में डूब गए, जो कि पास में है।

केदार नागराजन:  कई लोग, लंकेश को मिलाकर, कर्नाटक सरकार के राज्य की लेफ्ट संस्थाओं के प्रति रैवेये की आलोचना कर रहे थे। उन्होंने अवलोकन किया कि प्रेस के खिलाफ काम करना राज्य का इतिहास रहा है।

नरेंद्र नायक: सभी सरकारें प्रेस के खिलाफ हैं। वो सभी वोट बैंक को देखती हैं- शायद उनके स्तरों में फर्क हो, बस। सभी सरकारें ऐसा मीडिया चाहती हैं जो उनके हक में हो, जो बस उनकी उपलब्धियां और विपक्ष की आलोचना छापे। मनमोहन सिंह की सरकार थोड़ी उदार थी, बस मैं इतना ही कह सकता हूं।

गौरी लंकेश की हत्या का विरोध।

केदार नागराजन:  द कारवां को इससे पहले दिए गए इंटरव्यू में आपने कहा था कि " ऊपर से मिल रहा समर्थन ही ऐसे लोगों को बुद्धिवादियों को मारने के लिए उत्साहित कर रहा है ।" क्या आप अभी भी इसी बात पर कायम हैं।

नरेंद्र नायक: ऊपर बैठे लोग बयान देते हैं कि- "क्या किया जा सकता है, वो ऐसी ही थीं" या "क्या किया जा सकता है, उसके फ्रिज में बीफ था," या "क्या किया जा  सकता है, जो तलवार से खेलते हैं मरते भी तलवार से ही हैं"- जैसे कि वो लोगों की हत्या कर रही थीं। बिल्कुल बकवास। ये बयान ही ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करते हैं और इस तरह के कामों को मौन समर्थन भी प्राप्त है।

                                                  साभारः द कारवां

                             अनुवादः प्रीति चौहानप्रीति चौहान।










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