आदिवासियों की बेदखली पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगायी रोक

मुद्दा , सोनभद्र, रविवार , 26-11-2017


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जनचौक ब्यूरो

सोनभद्र। इलाहाबाद हाईकोर्ट से आदिवासियों को बड़ी जीत मिली है। कोर्ट ने यूपी के विभिन्न इलाके में रहने वाले आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों की बेदखली पर रोक लगा दी है। याचिका इंडियन पीपुल्स फ्रंट से जुड़े आदिवासी वनवासी महासभा की ओर से दायर की गयी थी। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलीप बी भोसले के नेतृत्व वाली जो जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया। खंडपीठ के दूसरे जज मनोज कुमार गुप्ता थे। 

इसके साथ ही खंडपीठ ने केन्द्र व राज्य सरकार को अगली सुनवाई तक वन अधिकारों की मान्यता के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताने का निर्देश दिया है। आदिवासी वनवासी महासभा ने इस याचिका को 5 अगस्त 2013 को दायर किया था। कोर्ट ने तब तक के लिए वनाधिकार कानून के तहत दावा करने वाले दावेदारों की बेदखली और उनके उत्पीड़न पर रोक लगा दी है। उच्च न्यायालय में आदिवासी वनवासी महासभा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश अग्रवाल ने बहस की। ये जानकारी स्वराज अभियान की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य और याचिकाकर्ता दिनकर कपूर ने दी है। 

उन्होंने बताया कि विगत दिनों स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में आदिवासी वनवासी महासभा और मजदूर किसान मंच की टीम ने नौगढ़, सोनभद्र और मिर्जापुर के कई गांवों में दौरा कर वनाधिकार कानून के अनुपालन की स्थिति की जांच पड़ताल की थी। जिसमें यह तथ्य सामने आया था कि आदिवासी वनवासी महासभा की जनहित याचिका पर नये संशोधनों के बाद आदिवासियों के दावों पर कोई विचार नहीं हो सका है। वनाधिकार कानून के तहत जमा किए गए दावे ग्रामस्तर और उपखंड स्तर पर पड़े हुए हैं और किसी भी दावेदार को न तो सुनवाई का उचित अवसर दिया गया और न ही उसे उसके दावों के संबंध में सूचित किया गया। न्यायालय के निर्णय के अनुरूप पुश्तैनी जमीन पर आबाद आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों को कहीं भी वन भूमि पर टाइटिल नहीं दिया गया। उलटे योगी सरकार बनने के बाद सोनभद्र, मिर्जापुर व चंदौली जनपदों में पुश्तैनी वन भूमि पर बसे आदिवासियों की बड़े पैमाने बेदखली का अभियान वन विभाग और प्रशासन ने छेड़ दिया। 

चंदौली की नौगढ़ तहसील में बोदलपुर, गोलाबाद, मझंगाई, जयमोहनी, मझगांवा, सुखदेवपुर, परसिया, भैसोड़ा आदि गांवों में बेदखली की कार्वाई की गयी। सोनभद्र के घोरावल के भैसवार, जुगैल, पेढ़ और मिर्जापुर के धुरकर आदि तमाम गांवों में बेदखली की कार्रवाइयां हुई। ग्रामीणों के घरों को गिरा दिया गया, उनके ओसारे तोड़ दिए गए, कुएं पाट दिए गए और अनाज तहस-नहस कर दिए गए। बहुतेरे आदिवासियों और परम्परागत वन निवासियों के ऊपर वन विभाग ने मुकदमे कायम कर दिए गए और उन्हें बेदखली की नोटिस दी गयी। इसके विरुद्ध आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट से जुड़ी आदिवासी वनवासी महासभा ने गांवों में आए तथ्यों के आधार पर माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में पुनः जनहित याचिका दाखिल कर यह अपील की। जिसमें वनाधिकार कानून के तहत आए दावों की जांच कराने के लिए उच्चस्तरीय जांच समिति नियुक्ति की मांग की गयी। जिसकी निगरानी में वनाधिकार कानून और नियमों के प्रावधानों के तहत त्रिस्तरीय समिति वन भूमि पर लोगों के दावों का निस्तारण करे। इसके साथ ही दावेदारों को टाइटिल प्रदान करे। और जब तक यह न हो तब तक सरकार को दावागत जमीन से बेदखल करने की कार्रवाई पर रोक लगाने का आदेश दिया जाए। 

आदिवासी वनवासी महासभा की अपील को स्वीकार कर माननीय मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ ने बेदखली पर रोक लगाई है और सरकार से जबाब तलब किया है। गौरतलब है कि संसद द्वारा अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (2007) 31 दिसम्बर 2007 से पूरे देश में लागू हुआ था। उत्तर प्रदेश के 13 जिले इसके दायरे में आए थे। इस कानून के तहत 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व वन भूमि पर अपने पुश्तैनी कब्जों पर वन अधिकार की मान्यता के लिए आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों ने अपना दावा पेश किया लेकिन शुरू से ही उप्र की नौकरशाही ऊपर से लेकर नीचे तक इस कानून को लागू करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में प्रदेश में वनाधिकार कानून के तहत प्राप्त 92433 दावों में से 73416 दावे जिसमें चंदौली जनपद में जमा 14088 दावों में से 13998 दावे, सोनभद्र में जमा 65526 दावों में से 53506 और मिर्जापुर में जमा 3413 दावों में से 3128 दावे बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए हुए मनमाने तरीके से खारिज कर दिए गए। तत्कालीन सरकार ने घोषणा कर दी कि दावों के आधार पर लोगों को टाइटिल दे दी गयी है और सभी दावों का निस्तारण कर दिया गया है।

जबकि जमीनी सच्चाई यह थी कि वनाधिकार कानून के तहत गठित त्रिस्तरीय समितियों ने अधिनियम और नियमावली में दिए प्रावधानों के विपरीत एकतरफा कार्रवाई की और दावेदारों को बिना सूचित किए और उन्हें उचित अवसर दिए हुए उनके दावे खारिज कर दिए गए। सरकार की इस अवैधानिक कार्रवाई के विरुद्ध आदिवासी वनवासी महासभा द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में जनहित याचिका 27063/2013 दाखिल की गयी जिसमें माननीय उच्च न्यायालय ने अगस्त 2013 में संशोधित नियम 2012 के प्रावधानों के अनुसार दावों के निस्तारण का निर्णय दिया। इस निर्णय को लागू करने के लिए बार-बार शासन और प्रशासन को पत्रक दिए गए लेकिन वस्तुस्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। योगी सरकार बनने के बाद तो बेदखली और उत्पीड़न बढ़ गया। न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि इस फैसले के बाद योगी सरकार की दमन और बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगेगी। उन्होंने कहा कि सरकार को वनाधिकार कानून व नियमों के प्रावधानों के अनुरूप कार्रवाई करते हुए आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों को पुश्तैनी जमीनों पर टाइटिल प्रदान करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शीघ्र ही राबर्ट्सगंज में वन भूमि अधिकार सम्मेलन किया जायेगा और वन भूमि अधिकार आंदोलन को तेज किया जायेगा।










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