सावधान! कहीं हम खतरनाक रास्ते पर तो नहीं बढ़ रहे?

विशेष , , मंगलवार , 28-11-2017


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जलेश्वर उपाध्याय

हाल फिलहाल जिस तरह संसद की अनदेखी की जा रही है, वह बेहद खतरनाक है। नोटबंदी के फैसले से संसद को बाहर रखना और एक राज्य में चुनाव के लिए संसद सत्र को टालना अनायास नहीं है। यह सब एक सुनियोजित अभियान का हिस्सा लगता है। अभी उत्तर प्रदेश के निकाय चुनावों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटना भी सत्ता के निरंकुश होते जाने का ही सुबूत है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि फासिस्टों के लिए संसद का क्या महत्व है?

 

मुसोलिनी से लेकर हिटलर तक सभी फासिस्ट लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए सत्ता में आए और तानाशाह बन बैठे। दरअसल फासिस्टों के लिए संसद और लोकतंत्र हमेशा दिखावे की चीज ही रहे हैं। सिर्फ नाजी जर्मनी को ही लें तो 1933 से 1945 तक राइखस्टैग (संसद) की केवल 20 बैठकें हुईं। आखिरी बैठक 26 अप्रैल 1942 को हुई थी। इस अवधि में हमने गोएरिंग अध्यक्ष बना रहा। 27 फरवरी 1933 को नाजियों ने संसद फूंककर पूरी सत्ता हिटलर के हाथों में सौंप दी। उसके बाद संसद का उपयोग कठपुतली की तरह किया जाता रहा, सिर्फ हिटलर के सनक भरे फैसले पर मुहर लगाने के लिए। विपक्षी पार्टियों और नेताओं के सफाए के बाद कोई रोकने वाला बचा भी नहीं था।

यही हाल चुनावों का भी था। इस दौरान चुनाव भी होते थे लेकिन उसमें भी हिटलर के आदेश को ही सही ठहराया जा सकता था। 5 मार्च 1933, 12 नवंबर 1933 को भी जनमत संग्रह हुए जिसमें नाजी पार्टी को 90% से भी ज्यादा मत मिले। 19 अगस्त 1934 को विशेष चुनाव में हिटलर 88.1% वोट पाकर राष्ट्रपति बना। बहरहाल संसद की अंतिम बैठक 26 अप्रैल 1942 को क्रोध ओपेरा हाउस में हुई थी जिसमें हिटलर को जर्मन नागरिकों का सुप्रीम जज घोषित किया गया। यह भी गौरतलब है कि जर्मनी में यहूदी समेत अल्पसंख्यक समुदाय को वोट देने का ही अधिकार नहीं था। यह भी कहा जाता है कि शुरुआती दौर में नाजियों ने अपने विरोधियों को वोट देने की मंजूरी दी ताकि जनता के सामने यह पेश किया जाए कि विपक्ष जर्मनी का विकास नहीं चाहता। इतिहास की इन बातों को दुहराना इसलिए भी जरूरी है कि हम इसके त्रासदी को याद रखें। फिलवक्त तो इसकी बहुत जरूरत है।

(जलेश्वर उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल वाराणसी में रहते हैं।)










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