एलफिंस्टन हादसाः अपने ही पैरों से कुचला गया आम आदमी

पड़ताल , , सोमवार , 02-10-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

 

रायगढ़। मुम्बई के एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे में 23 लोगों की मृत्यु के बाद यात्री सुविधाओं के अभाव और यात्री सुरक्षा के क्षेत्र में गंभीर चूकों और लापरवाहियों की चर्चा प्रारंभ हो गई है। वर्ष 2017 में अनेक रेल दुर्घटनाएं हुईं। 21 जनवरी को हीराखंड एक्सप्रेस कुनेरू के निकट पटरी से उतरी। 7 मार्च को भोपाल उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में बम विस्फोट हुआ। 15 अप्रैल को मेरठ लखनऊ एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। पुनः 19 अगस्त को पुरी हरिद्वार कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के साथ भी यही हुआ। ट्रेनों के पटरी से उतरने का सिलसिला जारी रहा और 23 अगस्त को कैफियत एक्सप्रेस पटरी से उतर गई। इन सब दुर्घटनाओं में जन धन की व्यापक क्षति हुई। इसी बीच सरकार ने स्वीकार किया कि अधिकांश रेल दुर्घटनाओं का कारण रेल कर्मचारियों की लापरवाही है। यह तथ्य भी सामने आया कि लगभग 65 प्रतिशत दुर्घटनाएं ट्रेन के पटरी से उतरने के कारण हुईं। अनेक दुर्घटनाएं सड़क पर चल रही सवारी गाड़ियों के ट्रेन से टकरा जाने के कारण हुईं।

समीर झवेरी को आरटीआई के जवाब में दी गई जानकारी के मुताबिक सेंट्रल वेस्टर्न हार्बर और ट्रांस हार्बर के 140 रेलवे स्टेशनों पर साल 2016 में लोकल गाड़ियों की चपेट में आने से 3202 यात्रियों की मौत हुई है और 3363 यात्री घायल भी हुए। यह भी पता चला कि 3202 में से 1798 लोग ट्रैक पार करते हुए और 657 लोग ट्रेन से गिरने के कारण मृत्य को प्राप्त हुए। एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन के फुट ओवर ब्रिज जैसे एफओबी और मानव रहित क्रासिंग दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं और 2018 तक इन्हें खत्म करने का सरकार का वादा अन्य सरकारी वादों की तरह अधूरा रह जायेगा इसकी पूरी आशंका है। यही स्थिति सिग्नल प्रणाली के संबंध में भी है।

रेल दुर्घटनाएं और बुलेट ट्रेन का सच

इन दुर्घटनाओं से अप्रभावित सरकार ने जापान के साथ मिलकर बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास किया जिसका बजट 1 लाख करोड़ रुपए है। सरकार का तर्क है कि तकनीकी क्रांति के लाभों की सहायता से ही विकास और समृद्धि का मार्ग तय किया जा सकता है। बुलेट ट्रेन के समर्थन में यह तर्क भी दिया जाता है कि दूरसंचार क्रांति और कंप्यूटर क्रांति को गरीब विरोधी बताकर इसकी आलोचना की गई थी किन्तु इनके परिणाम सकारात्मक और देश की दशा और दिशा को बदलने में सहायक रहे। ऐसा ही बुलेट ट्रेन के साथ होगा। किंतु यह भी देखा गया है कि इस प्रकार का विकास विषमताओं को मिटाने के बजाए और बढ़ा देता है। खैर सरकार जिस न्यू इंडिया का सपना देख रही है उस तक पहुंचने का जरिया यदि बुलेट ट्रेन होगी तो गरीब लोग तो न्यू इंडिया कभी पहुंच ही नहीं पाएंगे।

बिबेक देवराॅय समिति की रिपोर्ट में निजीकरण का सुझाव

भारत सरकार ने अपने द्वारा 2014 में गठित बिबेक देबरॉय समिति की 319 पृष्ठ की विस्तृत रिपोर्ट की सिफारिशों (नवंबर 2015) को अमलीजामा पहनाना प्रारंभ कर दिया है। इस समिति की सिफारिशों का सार तत्व यह है कि रेलवे को अपने मूल उद्देश्य ट्रांसपोर्टेशन पर ध्यान देना चाहिए। यह उचित नहीं है कि रेलवे अन्य कार्यों यथा स्कूल, अस्पताल, पुलिस सेवा, उत्पादन और निर्माण ईकाइयों का संचालन करे। यात्री तथा माल गाड़ियों के संचालन, अधोसंरचना के विकास तथा अन्य दूसरी सेवाओं में निजीकरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। रेल ट्रैक पर रेलवे के नियंत्रण के कारण प्राइवेट कंपनियों को परेशानी हो सकती है। इसलिए एक पृथक ट्रैक होल्डिंग कंपनी का निर्माण किया जाए जो रेल विभाग और निजी कंपनियों को निष्पक्ष रूप से रेल ट्रैक का आबंटन करे। निजी कंपनियां तभी रेलवे में रुचि दिखाएंगी जब अधोसंरचना उन्हें उपलब्ध कराई जाए और किराए के निर्धारण में उनके हितों का ध्यान रखा जाए। इसलिए एक स्वतंत्र रेलवे रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया का गठन किया जाए जो रेल मंत्रालय से स्वतंत्र हो। इस प्रकार सरकार के नियंत्रण को समाप्त किया जा सकेगा। रेल मंत्रालय का कार्य केवल नीति निर्धारण होना चाहिए। उपनगरीय रेल सेवाओं मेट्रो आदि को राज्य सरकार को सौंपा जा सकता है। रेल विभाग द्वारा सरकार को लाभ कमा कर देने और सरकार द्वारा रेल विभाग को वित्तीय सहायता देने की परिपाटी को बन्द करने हेतु रेल बजट को समाप्त करना उचित कदम है। अंततः रेल मंत्रालय को समाप्त कर उसका विलय ट्रांसपोटेशन मिनिस्ट्री के साथ कर दिया जाए।

भारत सरकार रेल विभाग पर नहीं दे रही है ध्यान

इन सिफारिशों में नया कुछ नहीं है। निजीकरण और उदारीकरण के समर्थक अर्थशास्त्रियों द्वारा रेल विभाग का आकलन नफा नुकसान की भाषा में किया जाता रहा है। निजीकरण के समर्थकों के अनुसार सन 2016 में रेल यात्रियों की संख्या के लिए निर्धारित लक्ष्य से रेल विभाग 9.1 प्रतिशत पीछे रह गया। जब देश के अधिकांश उद्योग विमुद्रीकरण की मार झेल रहे थे एयरलाइन उद्योग में दिसंबर 2015 की तुलना में दिसम्बर 2016 में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2016 में यात्री ट्रैफिक 25 प्रतिशत बढ़ गया। रेल विभाग द्वारा 2015 में जारी श्वेत पत्र के अनुसार जीडीपी में रेल विभाग की हिस्सेदारी निरंतर कम होती जा रही है। सरकारी आंकड़े यह भी बताते हैं कि एयरलाइन और रोड ट्रांसपोर्ट सेक्टर तेजी से वृद्धि कर रहे हैं। मॉर्गन स्टैनले के अनुसार पिछले 15 वर्षों में रोड ट्रांसपोर्ट पर जितना निवेश हुआ है उसका 20 प्रतिशत ही रेलवे पर हुआ है। इसका परिणाम यह है कि रेल नेटवर्क इतना व्यस्त हो गया है कि नई ट्रेनों को समायोजित करना या मौजूदा ट्रेनों की गति बढ़ाना असम्भव हो गया है। निजीकरण के समर्थक यह भी कहते हैं कि चूंकि रेलवे की उच्च श्रेणियों के किराये की तुलना में हवाई यात्रा के किराये कम या बराबर हैं और रेलवे की निम्न श्रेणियों के किरायों की तुलना में बसों के किराये कम हैं इसलिए यात्री रेलवे को त्याग रहे हैं। यात्री सुविधाओं में भी रेलवे पिछड़ता जा रहा है। माल ढुलाई में  कोयला, स्टील और खाद जैसे बल्क गुड्स  ट्रांसपोर्टेशन के अन्य विकल्प लोकप्रिय हुए हैं। निजीकरण के समर्थकों के अनुसार रेलवे के 14 लाख कर्मचारी- जो अनावश्यक रूप से अधिक हैं- भी घाटे का कारण हैं। भारतीय रेलवे .44 मिलियन नेट टन किलोमीटर प्रति कर्मचारी प्रति वर्ष परिवहन करता है जबकि चीन 1.23 और रूस 1.81 नेट टन का परिवहन करता है।

रेलवे के निजीकरण करने की तरफ बढ़ रही सरकार

भारत सरकार तेजी से रेलवे के निजीकरण की ओर बढ़ रही है। रेल बजट समाप्त कर दिया गया है।23 रेलवे स्टेशनों को पुनर्विकसित करने हेतु पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत निजी क्षेत्रों को सौंपा जा रहा है। इस पुनर्विकास में अधोसंरचना और सेवाएं दोनों सम्मिलित हैं। रेलवे की अधोसंरचना में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश को पहले ही स्वीकृति (सन 2014) दी जा चुकी है। बिहार में 3500 करोड़ रुपए के विदेशी निवेश के साथ दो लोकोमोटिव फैक्टरियां खुल चुकी है। स्टेशनों के पुनर्विकास के कार्य में जापान और दक्षिण कोरिया रुचि दिखा रहे हैं और 400 स्टेशनों की सूची तैयार है।

निजीकरण के विरोधियों के अपने तर्क हैं। निजीकरण का अर्थ होगा रेलवे के सोशल सर्विस ओबलिगेशन्स की समाप्ति। 2.3 करोड़ लोगों और 30 लाख टन सामान को प्रतिदिन अपने गंतव्य तक पहुंचाने वाला रेलवे अभी कई सुदूरवर्ती इलाकों को जोड़ने के लिए घाटा सह कर भी ट्रेनों का परिचालन करता है क्योंकि यह उसका सामाजिक उत्तरदायित्व है। किंतु निजीकरण के बाद लाभ प्रदान करने वाले मार्ग तो विकसित होंगे किन्तु घाटा पहुंचाने वाले मार्ग उपेक्षित हो जाएंगे। यात्री भाड़े के निर्धारण में भी जनता के हित के बजाए मुनाफे को प्राथमिकता मिलेगी। निजीकरण से रेलवे के 14 लाख कर्मचारियों और लगभग इतने ही पेंशनरों के हित प्रभावित होंगे। रेलवे, मजदूरों, उद्योगों के कच्चे माल और खाने पीने की वस्तुओं के सस्ते सुरक्षित परिवहन का माध्यम है। इसके स्वरूप में परिवर्तन से देश का आर्थिक विकास और कीमतें प्रभावित होंगी। रेलवे से न केवल यात्रियों की सुरक्षा बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा जैसे गंभीर विषय जुड़े हुए हैं जिनसे छेड़छाड़ ठीक नहीं है।

नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की चेयरमैनशिप वाली हाई पावर समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले जापान, यूके,ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन,जर्मनी और यूएसए के मॉडल्स का अध्ययन किया। ये सभी विकसित देश हैं। इनमें जनसंख्या का दबाव बिल्कुल नहीं है। इनके पास विपुल संसाधन हैं अतः इनको मॉडल बनाकर जनसंख्या विस्फोट से आक्रांत हमारे विकासशील देश के लिए कितनी सफल योजना बनाई जा सकती है यह कहना कठिन है। निजीकरण से भ्रष्टाचार का अंत होगा यह धारणा भी मिथ्या है। टेलीकॉम घोटाला और कोल ब्लॉक आबंटन घोटाला निजीकरण और भ्रष्टाचार के समानुपाती संबंधों को उजागर करते हैं। एलफिंस्टन रेलवे स्टेशन पर हुई घटना यह दर्शाती है कि सरकारों की प्राथमिकता में आम आदमी पीछे छूटता जा रहा है।   










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