बौद्धिक संपदा कानून: मोदी सरकार का समर्पण

काम की बात , , बुधवार , 12-07-2017


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गिरीश मालवीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार 2014 में जब से सत्ता में आयी है। बौध्दिक अधिकार सम्बन्धी विषयों में उसका रुख अमेरिका परस्त का ही रहा है। वास्तव में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां पेटेंट कानूनों को अपनी मोनोपोली बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करती आयी हैं। मोदी सरकार के सत्तासीन होने से पहले भारत तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाओं को नकारते हुए अपने बनाये हुए पेटेंट कानूनों को स्वीकार करता आया था। 

दरअसल भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनरिक दवा निर्यातक देश है। भारत सहित तीसरी दुनिया की बड़ी गरीब आबादी अपनी जान बचाने के लिए इन्हीं जेनरिक दवाओं पर निर्भर है।

प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ठ्रपति ट्रंप। 

ओबामा के दौर में शुरू हो गया था सिलसिला

मोदी सरकार बनने के बाद सितंबर 2014 में ही केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमन ने बयान दिया कि सरकार 6 महीने के भीतर आईपीआर के मामले में नई नीति लायेगी। उसके तुरन्त बाद अमेरिकी यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से हुई मुलाकात के बाद एक संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ था।  जिसमें उच्च स्तरीय आईपी वर्किंग ग्रुप बनाने की बात कही गई थी। यह भारत के बौध्दिक अधिकार नीति के संदर्भ में बहुत बड़ा परिवर्तन था।

उस समय भी कुछ पेटेंट एक्सपर्ट्स का मानना था कि आईपीआर वर्किंग ग्रुप एक दोधारी तलवार है और उन्होंने इस फोरम पर अमेरिका का दबदबा होने की आशंका भी जाहिर की थी। वास्तव में नरेंद्र मोदी अपने ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम को सफल बनाने की तलब में देश की संप्रभुता को अंकल सैम के सामने गिरवी रख आए थे, इसका अंदाजा तभी लग गया जब इस यात्रा के ठीक पहले अमेरिकी दवा कंपनियों के दबाव में 108 जीवन रक्षक दवाओं की कीमत में भारी वृध्दि की गयी।

आईपीआर कानून पर भारत झुका

मोदी जी के कार्यकाल की शुरुआत से ही अमेरिका लगातार कड़े आईपीआर कानूनों को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है। जिसके फलस्वरूप भारत अपनी आईपीआर नीति से समझौता कर रहा है। इसका एक बार फिर प्रत्यक्ष उदाहरण हमें 2016 में देखने को मिला जब मोदी सरकार ने अपनी आईपीआर पॉलिसी घोषित की। इसे पढ़ने से पता चलता है कि सरकार देश में और कड़े आईपीआर कानून बनाना चाहती है जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हित में भारतीय दवा कंपनियों को कमजोर करेंगा। क्योकि सरकार की ये नीति इंटलेक्चुल प्रॉपर्टी को बाज़ार में बिकने लायक पूंजी और आर्थिक हथियार बनाने की बात करती है। साथ ही ये नीति तमाम भारतीय और विदेशी कॉर्पोरेट कंपनियों को आईपीआर कानून का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने और पेटेंट राज को बढ़ाने के लिये उत्साहित करती है।

इस नीति को मंजूर करने के पूर्व सरकार को यह सोचना चाहिए था कि जब हमारे देश में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, टेक्नोलॉज़ी और मनोरंजन के अलावा तमाम क्षेत्रों के लिये आईपीआर से जुड़े कानून पहले से हैं जो डब्लूटीओ जैसी अंतरराष्ट्रीडय संधियों के मुताबिक हैं। ऐसे में इस नीति की ज़रूरत ही क्या थी लेकिन अपने अमेरिकी आकाओं को खुश करने के लिए यह नीति अपनायी गयी।

ट्रंप पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने डाला दबाव

जब ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति बने तो उन्होंने भारतीय मूल के एक अमेरिकी विशाल अमीन को नया बौद्धिक संपदा प्रवर्तन समन्वयक नियुक्त किया। इससे यह भी समझा जा सकता है कि इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लॉबिंग कितनी तगड़ी है। अपने हाल के अमेरिका दौरे में मोदी और ट्रम्प ने फिर से एक बार इस विषय में चर्चा की और इसकी झलक हमें अमरीका-भारत के संयुक्त बयान में दिखाई देती है। जिसमें कहा गया कि “आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए एक नई पद्धति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर सहमति बन गयी है और नेता भी उसके लिए प्रतिबद्ध हैं। इस दिशा में एक उच्च स्तरीय बौद्धिक संपदा (आईपी) का गठन किया जा सकता है जिसमें उपयुक्त निर्णय लेने की क्षमता हो साथ ही वो व्यापार नीति फोरम के हिस्से के रूप में तकनीकी स्तर की बैठकों का आयोजन कर सके।”

प्रतीकात्मक फोटो।

निर्णय लेने कि प्रक्रिया में अमेरिका शामिल

अमेरिका के चेंबर ऑफ कॉमर्स ने इस बदलाव का स्वागत किया है उसे तो ऐसा करना ही था क्योंकि यही अमेरिकी उद्योगपति चाहते थे,  लेकिन वास्तव में यह एक बेहद खतरनाक बयान है हमने न केवल बौद्धिक सम्पदा पर चर्चा स्वीकार कर ली है बल्कि अमेरिका को उस विषय मे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भूमिका भी दे दी है,

जबकि, मोदी सरकार से पूर्व की सरकारों ने अमेरिका के अतर्राष्ट्रीय व्यापार आयोग के साथ बौद्धिक सम्पदा के मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि यह मुद्दा देश की गृह नीति का मुद्दा था। 

इस नवीन व्यवस्था में बौद्धिक सम्पदा की जरूरत को अब नई पद्धति के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा है न की जनता की जरूरत के हिसाब से। यह वास्तव में खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि भारत के पेटेंट कानूनों में बदलाव को लेकर अमेरिका की मांगें मानने से भारत और भारत जैसे अन्य विकासशील देशों को कम दाम में दवाएं उपलब्ध कराने की भारतीय जेनेरिक फार्मा इंडस्ट्री की ताकत कम हो सकती है।

यह मुद्दा सही ढंग से और जोरदार तरीक़े से जनता के सामने लाया जाए इसकी बड़ी आवश्यकता है। 

(लेखक इंदौर से हैं और समसामयिक विषयों पर इनके लेख अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।)










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