सीएमपी के कारसाज बन सकते हैं मोदी के कारकून !

मत-मतांतर , नई दिल्ली , शनिवार , 12-08-2017


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उपेंद्र चौधरी

नई दिल्ली। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश क्या कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम सकते हैं ? दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा चल रही है। यह कहा जा रहा है कि, जयराम रमेश भी चैधरी बीरेन्द्र सिंह और जगदंबिका पाल जैसे पूर्व कांग्रेसी नेताओं की राह के यात्री बन सकते हैं। आठ अगस्त को एक न्यूज एजेंसी को दिये गये अपने साक्षात्कार में जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस और उसके नेतृत्व पर सवाल उठाये हैं, उससे भी इस बात के संकेत मिलते हैं। हालांकि इससे पहले ही सियासी सूत्रों से इस बात के इशारे मिलने लगे थे कि जयराम रमेश की बात संघ और बीजेपी के नेताओं से चल रही है। न्यूज एजेंसी को दिये गये साक्षात्कार ने इस संभावना को और पुष्ट कर दिया है। नीचे दिये गये चित्र में जिस तरह की बॉडी लैंग्वेज के साथ जयराम रमेश, प्रधानमंत्री से मुखातिब हैं, उससे इस संभावना को और बल मिलता है। इस चित्र में जयराम रमेश मोदी की तरफ इस तरह देख रहे हैं,मानों वो मोदी की मौजूदगी और बातों से सम्मोहित और तर-ब-तर हों। अनौपचारिक सूत्र से लगभग सप्ताह भर पहले ही पता चला था कि जयराम रमेश बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इसके लिए निजी मुलाकातों का दौर जारी है। इसके ठीक बाद जयराम रमेश का ‘‘ कांग्रेस घोर संकट में हैं। ’’  ‘‘ राजाओं-महाराजाओं वाला दौर बीत चुका है, मगर कांग्रेस नहीं बदल पायी है’’ ‘‘कांग्रेस का मुकाबला ऐसे-वैसों से नहीं,मोदी और शाह जैसे रणनीतिक उस्तादों से है।जैसे ताबड़तोड़ बयान कांग्रेस पर प्रहार करते हुए आये। इन बयानों को सामान्य नहीं कहा जा सकता है,क्योंकि जिस कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व पर हमले का मतलब उस पार्टी से बगावत माना जाता रहा हो, वहां जयराम रमेश के इस तरह के बयानों को सामान्य सियासी रौशनी में नहीं देखा जा सकता है। इन बयानों को उस मनोवैज्ञानिक तैयारी के रूप में भी देखा जा सकता है,जिसकी रणनीतिक परिणाति बीजेपी में शामिल होने में हो सकती है।अगर ऐसा होता है,तो यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका होगा और बीजेपी के लिए कांग्रेसमुक्त भारत बनाने की तरफ एक सियासी उपलब्धि होगी,क्योंकि जयराम रमेश कांग्रेस के कोई मामूली नेता नहीं हैं,बल्कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय रिश्तों की उनकी एक बेहद समृद्ध पृष्ठभूमि है,उन्हें मनरेगा का शिल्पी माना जाता है,मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल का अहम मंत्री ही नहीं,बल्कि सोनिया गांधी तक के बेहद करीबी माना जाता है। 

मोदी के सामने नतमस्तक जयराम रमेश

महज चुनावी संकट नहीं, अस्तित्व का संकट

अपने साक्षात्कार में जयराम नरेश ने कहा है, ‘’कांग्रेस पार्टी 1996 से 2004 तक सत्ता से बाहर रही, और उस दौरान पार्टी ने चुनावी राजनीतिक संकट का सामना किया किया था। उन्होंने कहा कि 1977 में इमरजेंसी के बाद मिली हार के बाद भी कांग्रेस को चुनावी राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ा था, लेकिन इस समय कांग्रेस जिस तरह के संकट से जूझ रही है,वो चुनावी राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि कांग्रेस के सामने उसके अस्तित्व वाला संकट है। पार्टी वास्तव में एक गहरे संकट में है।’’

जयराम रमेश द्वारा दिये गये इस बयान को अगर ऊपर से सतही नजरिये से भी देखा जाय,तो साफ तौर पर जाहिर होता है कि जयराम रमेश अपनी पार्टी को लेकर किसी गहरे अवसाद जैसी मनोदशा में हैं।लेकिन उनके इस बयान को थोड़ी गहराई से कुरदने पर ऐसा लगता है कि वो पार्टी को लेकर स्वयं किसी अवसाद में हो या नहीं हों,अपनी पार्टी को अवसाद में ले जाने की एक अप्रत्यक्ष कोशिश जरूर है।

कांग्रेस का सामना नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसों से है

जयराम रमेश कहते हैं, ”कांग्रेस का ये सोचना गलत होगा कि राज्यों में बीजेपी की सरकारों को सिर्फ एंटी-इनकम्बेंसी की बदौलत हराया जा सकता है। हमें समझना होगा कि हमारा मुकाबला नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेतृत्व से है, जो बिलकुल अलग ढंग से सोचते और काम करते हैं। अगर हमने अपने रुख में लचीलापन नहीं रखा, तो सच ये है कि हम जल्द ही अप्रासंगिक हो जाएंगे। पुराने नारे, फॉर्मूले और मंत्र अब काम नहीं करेंगे। भारत बदल चुका है, कांग्रेस पार्टी को भी बदलना होगा। अगर 2019 में मोदी को कड़ी टक्कर देनी है, तो पार्टी के सभी लोगों को मिलकर ताकत लगानी होगी।’’

जयराम रमेश के साक्षात्कार का यह अंश यह जताने के लिए पर्याप्त है कि वो सीधे-सीधे नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं।एक तरह से या तो वो मोदी और अमित शाह के नेतृत्व को एक सम्मोहक मिसाल की तरह पेश कर रहे हैं या फिर अपने नेतृत्व को लेकर अपनी हताशा दिखा रहे हैं। उन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व सक्षम नहीं है,जबकि इस मामले में बीजेपी का नेतृत्व उन्हें अद्भुत दिखता है। जयराम रमेश अपनी पार्टी के नेतृत्व की राजनीतिक अड़ियलपन और सियासी रूढ़िवादिता पर भी प्रश्न खड़ा करते हैं। उन्हें लगता है कि बीजेपी,कांग्रेस के मुकाबले कहीं गतिशील है और कांग्रेस अपने नेतृत्व के कारण ठहराव का शिकार है।

पार्टी बैठक की अध्यक्षता करते सोनिया गांधी

सल्तनत चली गई, मगर सुल्तानियत नहीं गयी

जयराम रमेश अपने उस इंटरव्यू में आगे कहते हैं, ‘’सल्तनत चली गई, लेकिन हम अब भी सुल्तानों की तरह की बर्ताव करते हैं. हमें न सिर्फ अपने सोचने और काम करने के तरीके बदलने होंगे, बल्कि लोगों के साथ संवाद रखने और खुद को उनके सामने प्रोजेक्ट करने के तौर-तरीकों को भी पूरी तरह बदलना होगा।’’

यह सीधे-सीधे कांग्रेस के नेतृत्व के सामंतवादी प्रवृत्ति पर चोट करता है। रमेश बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस के एलीटनेस पर ऊंगली उठाते हैं। वो साफ तौर पर कहते हैं कि भारत की सियासी फिजा में आवाम के स्तर पर आकर बातें करनी होती है,लेकिन कांग्रेस अब भी जमीन से कटकर आभासी बातें कर रही है।उन्हें लगता है कि बीजेपी,कांग्रेस के मुकाबले कहीं ज्यादा जनतांत्रिक है।

इस साक्षात्कार में जयराम रमेश जितना अपनी पार्टी को पार्टी फोरम से बाहर आकर खुली नसीहतें देते दिखते हैं, उससे कहीं ज्यादा मोदी और शाह की तारीफ करते हुए नजर आते हैं। इस साक्षात्कार में कांग्रेस के खिलाफ उनकी बेचैनी खुलकर सामने आती है। अगर तर्कशास्त्र के नियमों के खांचे में इस बेचैनी को देखा-परखा जाय,तो स्प्षट हो जाता है कि जयराम रमेश की राजनीतिक गति कांग्रेस से बीजेपी की ओर ढुलती हुई नजर आती है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि  चंद दिनों या चंद महीनों बाद बीजेपी की सियासी रणनीति के तहत जयराम बीजेपी खेमें में नजर आयें। 

चुनावी अभियान में राहुल गांधी

नेहरू से प्रभावित रहे हैं जयराम

कर्नाटक के चिकमगलुर में 1954 में जन्में और बॉम्बे आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर रहे जयराम रमेश को हिन्दू और बौद्ध परंपरा के होने में गर्व महसूस होता है। वो जवानी के दिनों से ही जवाहरलाल नेहरू से इसलिए बेहद प्रभावित रहे हैं,क्योंकि जीवन को लेकर नेहरू के आधुनिक विचार,नेहरू की एक पारंपरिक समाज में बदलाव की चाहत और उनता उदारवाद,मानवतावाद तथा धर्म,नागरिक एवं जिंदगी को लेकर नेहरू के तार्किक तौर तरीके उन्हें आकर्षित करते हैं। महात्मा गांधी और टैगोर का भी जयराम रमेश के व्यक्तित्व पर असर रहा है।

जयराम नरेश पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के ओएसडी रहे। नरसिंहाराव सरकार में  तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के साथ भी वित्त मंत्रालय में कार्य किया। इस तरह जयराम रमेश ने 1991 से लेकर 1996 तक भारत के आर्थिक सुधार में भागीदार भी रहे। वो योजना आयोग के उपाध्यक्ष के सलाहकार रहे,तत्कालीन वित्तमंत्री पी.चिदंबरम के सलाहकार रहे। पार्टी की तरफ से वो विभिन्न राज्यों की अहम जिम्मेदारियां भी संभाली।

2004 में वो कांग्रेस के चुनाव रणनीति दल के सदस्य थे। वो आंध्रप्रदेश से राज्यसभा पहुंचे और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद मे रहते हुए यूपीए के कॉमन मिनिमम प्रौग्राम को लागू करवाने में अहम भूमिका निभायी। यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस को सत्ता में लगातार दूसरी बार ले आने वाली महात्मा गांधी नेशनल ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) का शिल्पी भी जयराम नरेश को ही माना जाता है।

स्वामी का कांग्रेस पर तीखा प्रहार

जयराम नरेश के साक्षात्कार, सुब्रमण्यम स्वामी के लिए कांग्रेस पर प्रहार का एक हथियार बन गया।उन्होंने कहा, ‘’कांग्रेस के पास कोई नीति नहीं है। वो एक विदेशी नेतृत्व की गिरफ्त में फंसी हुई है। जयराम रमेश को चाहिए कि वो कांग्रेस के भीतर मौजूद स्वदेशी नेताओं को एकजुट करके पार्टी को नया नेतृत्व देने की कोशिश करें।’’सुब्रमण्यम स्वामी का यह बयान एक तरह से इस बात की तरफ इशारा करता है कि जयराम रमेश शायद वही बात कर रहे हैं,जो बीजेपी कहना चाहती है। 

 

 










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