पत्थलगड़ी बनाम राष्ट्रद्रोह और अफीम की खेती का सच

विशेष , , शनिवार , 17-03-2018


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विशद कुमार

(“पत्थलगड़ी : आदिवासी समाज में एक नए विद्रोह का आगाज़!”  शीर्षक से शुक्रवार को प्रकाशित ख़बर में आपने जाना कि झारखंड में आजकल पत्थलगड़ी नाम का ‘भूत’ सरकार व प्रशासन की नींद हराम किए हुए है। पिछले एक साल से झारखंड के दक्षिणी छोटानापुर के खूंटी जिले के आदिवासी बहुल गांवों में पत्थलगड़ी की जा रही है। पत्थलगड़ी एक तरह से आदिवासी समाज की स्वायत शासन व्यवस्था है जिसे संविधान भी मान्यता देता है। उधर मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते हैं कि 'पत्थलगड़ी के बहाने इलाके में अफीम की खेती की जा रही है, प्रशासन इस काले काम पर प्रतिबंध नहीं लगा सके इसलिये ग्रामीणों को सरकार व प्रशासन के खिलाफ भड़काया जा रहा है, जो हम होने नहीं देंगे।' आइए जानते हैं इस सबका सच इस दूसरे और अंतिम भाग में।- संपादक)

1997 से पत्थलगड़ी

झारखंड के गांवों में पत्थलगड़ी 1997 से ही शुरू हो गयी थी। भारत जन आंदोलन के तत्वावधान में डॉ बीडी शर्मा, बंदी उरांव सहित अन्य लोगों के नेतृत्व में खूंटी, कर्रा सहित कई जिलों के  दर्जनों गांवों में पत्थलगड़ी की गयी थी। इसके बाद झारखंड (एकीकृत बिहार) के गांवों में एक अभियान की तरह शिलालेख (पत्थलगड़ी) रामे की स्थापना की जाने लगी। 

 

डॉ. बीडी शर्मा, बंदी उरांव, पीएनएस सुरीन सहित अन्य लोग इस काम में जुटे। गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया। पत्थलगड़ी पूरे विधि विधान के साथ की जाने लगी। पत्थलगड़ी समारोह चोरी छिपे नहीं, बल्कि समारोह आयोजित करके किया जाता था। इसकी सूचना प्रशासन को दी जाती थी। खूंटी सहित अन्य जिलों में आज भी उस समय की पत्थलगड़ी को देखा जा सकता है। 

 

डॉ बीडी शर्मा ने अपनी पुस्तिका ‘गांव गणराज्य का स्थापना महापर्व’में लिखा है कि ''26 जनवरी से दो अक्तूबर 1997 तक गांव गणराज्य स्थापना महापर्व के दौर में हर गांव में शिलालेख की  स्थापना और गांव गणराज्य का संकल्प लिया जायेगा। उन्होंने लिखा है कि हमारे गांव को 50 साल के बाद असली आजादी मिली है। यह साफ है कि आजादी का अर्थ मनमाना व्यवहार नहीं हो सकता है। उन्होंने लिखा है कि जब हमारा समाज हमारे गांव में हमारे राज की घोषणा करते हुए व्यवस्था की बागडोर अपने हाथ में ले लेता है, तो उसके बाद हर भली-बुरी बात के लिए वह स्वयं जिम्मेदार होगा और उसी की जवाबदेही होगी।''

पंचायती राज मंत्रालय का अधिदेश 

पंचायती राज मंत्रालय (एमओपीआर) का अधिदेश संविधान, के नौवें भाग, भाग IX क, के अनुच्छेद 243 यघ, के अनुसार जिला योजना समिति के संबंध में प्रावधान और पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम,1996 (पेसा) के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए है।

 

देश में पंचायती राज व्यवस्था के संबंध में संवैधानिक प्रावधान 

24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992,जो भारत के संविधान के नौंवे भाग में सन्निविष्ट किया गया है, पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा देता है।

संविधान का अनुच्छेद 243ड (1), अनुच्छेद 244 के खंड (1) और (2) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को लागू करने से छूट देता है। हालांकि, अनुच्छेद 243 ड (4) (ख) संसद को कानून बनाने और नौवें भाग के प्रावधानों को अनुच्छेद (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि ऐसे अपवादों और संशोधनों को ऐसे कानूनों में निर्दिष्ट किया गया हो और इस तरह का कोई भी कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा।  

 

पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र

संविधान की पांचवीं अनुसूची किसी भी राज्य- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्य में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के रूप में भी प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण के साथ संबंधित है। संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों तथा असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य किसी भी राज्य में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है। "पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996" (पेसा), कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भाग को, संविधान के अनुच्छेद 244(1)  के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10 राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं।

गांव और ग्राम सभा की परिभाषा

पेसा अधिनियम के अंतर्गत, {अनुच्छेद 4 (ख)},आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह या एक पुरवा या पुरवों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों के प्रबंधन करते हैं।

पेसा अधिनियम, {अनुच्छेद 4 (ग)} के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं।

पेसा ग्राम सभा को निम्न के लिए विशेष रूप से शक्ति प्रदान करती है

(क) लोगों की परंपराओं और रिवाजों, और उनकी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना, (ख) समुदाय के संसाधन, और (ग) विवाद समाधान के परंपरागत तरीके की रक्षा और संरक्षा, (ii) निम्न कार्यकारी कार्यों को पूरा करना, सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देना, गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान करना, (ग) पंचायत द्वारा योजनाओं; कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए धन के उपयोग का एक प्रमाण पत्र जारी करना ।           

पेसा उपयुक्त स्तर पर ग्राम सभा / पंचायतों को निम्न लिखित की शक्ति प्रदान करता है-

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार, एक उचित स्तर पर पंचायत को लघु जल निकायों की योजना और प्रबंधन का कार्य सौंपा गया है, एक उचित स्तर की ग्राम सभा या पंचायत द्वारा खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस पट्टा, रियायतें देने के लिए अनिवार्य सिफारिशें करने का अधिकार,मादक द्रव्यों की बिक्री / खपत को विनियमित करना, लघु वनोपजों का स्वामित्व, भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि की बहाली, गांव बाजारों का प्रबंधन, अनुसूचित जनजाति को दिए जाने वाले ऋण पर नियंत्रण सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ताओ और संस्थानों, जनजातीय उप योजना और संसाधनों सहित स्थानीय योजनाओं पर नियंत्रण।  

अफीम की खेती का सच

जबसे पत्थलगड़ी चर्चा में आया है तबसे इलाके में अफीम की खेती की खबरें भी सुर्खियों में रही हैं। खासकर राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास इसपर काफी कुछ बोल चुके हैं। उन्होंने अफीम की खेती में राष्ट्रविरोधी ताकतों और नक्सलियों का हाथ बताया है। मुख्यमंत्री और उनके प्रायोजित संस्करणों में संघ सहित कुछ मीडिया ने भी इस हंगामे में बराबर की भागीदारी निभाई है। 

 

जब इन पंक्तियों के लेखक ने इसकी सच्चाई जानने की कोशिश की तो बड़ा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया। इस बाबत ग्रामीण बताते हैं कि यह सच है कि यहां अफीम की खेती भी होती है और इसका दुष्परिणाम भी गर्भवती महिलाओं में देखने को मिल रहा है। लेकिन यह काम भी सरकारी तबके के लोगों की ही देन है। ग्रामीण बताते हैं कि 2014 में सीआरपीएफ के लोगों ने अफीम का बीज दिया था और खेती के तरीके भी बताए थे। उन्हीं के लोग औने पौने दाम देकर तैयार अफीम ले जाते हैं, प्रशासन के लोग भी इसमें शामिल हैं। 

सच तो यह है कि सरकार किसी भी बहाने इन क्षेत्र के आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर कारपोरेट को सौंपना चाहती है, जिसका आभास क्षेत्र के आदिवासियों को हो चुका है, ऐसे में आदिवासी समाज और रघुवर सरकार आमने सामने हैं, बहाना जो भी हो।

 

बताते चलें कि पिछले दिसंबर माह में रघुवर सरकार द्वारा मजदूर संगठन 'मजदूर संगठन समिति' को माओवादियों का अग्र संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया गया। दरअसल 'मजदूर संगठन समिति' मजदूरों, दलित—पीड़ित गरीब तबकों और आदिवासियों के शोषण—दमन के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहा था, उनके हक—अधिकार को लेकर आंदोलन करता रहा था। पिछले 9 जून 2017 को गिरिडीह के मधुबन स्थित पारसनाथ पर्वत पर सीआरपीएफ के कोबरा बटालियन द्वारा जब एक डोली मजदूर आदिवासी मोतीलाल बास्के की हत्या कर दी गई तो इस मामले पर 'मजदूर संगठन समिति' ने प्रतिरोधात्मक रूख अख्तियार करते हुए तमाम जनवादी ताकतों को एकजुट किया और मोतीलाल बास्के की हत्या की न्यायिक जांच की मांग के साथ साथ उसके परिवार वालों को मुआवजा दिलाने की आवाज बुलंद की। मोतीलाल की हत्या के विरोध में हो रहे जनआंदोलनों से घबराकर रघुवर की सरकार 'मजदूर संगठन समिति' को ही अलोकतांत्रिक तरीके से प्रतिबंधित कर दिया कि 'न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी'। अब स्थिति यह है कि पारसनाथ पर्वत पर सीआरपीएफ अपना तांडव कर रहा है जो आए दिन खबरों से साफ हो गया है, वहीं वहां के डोली मजदूरों की स्थिति काफी दयनीय होती जा रही है। 

कहना न होगा कि रघुवर सरकार अपने तमाम अलोकतांत्रिक तरीके का इस्तेमाल करके इन आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करना चाहती है। देखना यह है कि सरकार अपने इस मिशन में कामयाब होती है या झारखंड में एक नए उलगुलान की शुरुआत होगी। 

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)

इस ख़बर का पहला भाग आप यहां क्लिक कर पढ़ सकते हैं-









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