पत्थलगड़ी : आदिवासी समाज में एक नए विद्रोह का आगाज़!

विशेष , झारखंड, शुक्रवार , 16-03-2018


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विशद कुमार

वैसे तो जब से झारखंड अलग राज्य का गठन हुआ है, समाचारों की सुर्खियां इसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। इन्हीं सुर्खियों के बाजार में आजकल पत्थलगड़ी नामक भूत सरकार व प्रशासन की नींद हराम किए हुए है। पिछले एक साल से झारखंड के दक्षिणी छोटानापुर के खूंटी जिले के आदिवासी बहुल गांवों में पत्थलगड़ी की जा रही है। अब तक लगभग 50 गांवों मे पत्थलगड़ी हो चुकी है। 


पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की एक पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है, जिसके तहत वे अपने गांव का सीमांकन करके बाहरी व्यक्तियों का गांव में प्रवेश को तब तक प्रतिबंधित करते हैं, जब तक ग्रामसभा उनके प्रवेश की इजाजत नहीं देती। पत्थलगड़ी एक तरह से आदिवासी समाज की स्वायत शासन व्यवस्था है जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने संवैधानिक मान्यता दी थी।


इस बाबत सेवा निवृत (प्रशासनिक सेवा झारखंड सरकार) संग्राम बेसरा कहते हैं कि 'जब अंग्रेजी हुकूमत आदिवासी क्षेत्रों में अपना वर्चस्व कायम करने में असफल रही तो उसने 1872 में संताल परगना टेन्डेंसी एक्ट (एसपीटी) कानून बनाकर मांझी परगना प्रथा को मान्यता दे दी और इसी समुदाय के कुछ लोगों को जमींदारी देकर लगान की वसूली की। वहीं छोटानागपुर क्षेत्र में 1908 में छोटानागपुर टेन्डेंसी एक्ट बनाकर मांझी परगना प्रथा एवं मानकी मुंडा प्रथा की मान्यता दी।' 

बेसरा आगे कहते हैं- 'आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा एसपीटी में सन् 1949 में संशोधन किया गया, बावजूद ग्रामसभा के तहत स्वशासन की परंपरा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई। वहीं मांझी परगना सिस्टम में कोई बदलाव नहीं किया गया। इस एक्ट के तहत इन क्षेत्रों में बाहर का कोई  भी व्यक्ति बिना ग्रामसभा की अनुमति के आकर बस नहीं सकता है, कारोबार नहीं कर सकता है।'

बताते चलें कि एक वर्ष पूर्व से इन क्षेत्रों में पत्थलगड़ी का काम चल रहा है लेकिन मामला सुर्खियों में तब आया जब पिछले 21 फरवरी 2018 को ग्रामीणों ने कुरूंगा गांव से कुछ दूर आगे 25 पुलिसकर्मियों की टीम को घेर लिया और 4 घंटे तक बंधक बनाए रखा, क्योंकि पत्थलगड़ी को लेकर कुरूंगा गांव के ग्राम प्रधान सागर मुंडा को पुलिस गिरफ्तार कर अड़की थाना ले जा रही थी। सागर मुंडा पर पिछले साल पुलिस को बंधक बनाने का आरोप है। इनके खिलाफ मामला भी दर्ज है। ग्राम प्रधान को हिरासत में लिये जाने की सूचना मिलने के बाद ग्रामीण गोलबंद हो गये और पुलिस कर्मियों को तब तक नहीं छोड़ा जब तक खूंटी जिले के मुख्यालय से एसपी व डीसी ने आकर ग्राम प्रधान सागर मुंडा को छोड़ने का आदेश नहीं दिया।

विदित हो डीसी सूरज कुमार, एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा, एसडीपीओ रणवीर सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर गये। अधिकारी ग्रामीणों से बातचीत के बाद ग्राम प्रधान को छोड़ने को तैयार हुए। ग्राम प्रधान को छोड़े जाने के बाद ग्रामीणों ने पुलिस टीम को मुक्त किया। उसके बाद देर शाम को डीसी-एसपी सहित अन्य पुलिसकर्मी वापस खूंटी लौट सके।

उल्लेखनीय है कि पिछले 25 अगस्त 2017 को खूंटी थाना क्षेत्र के कांकी सिलादोन गांव के लोगों ने खूंटी के डीएसपी रणवीर कुमार सहित पुलिस टीम को बंधक बना लिया था। ग्रामीणों और पुलिस के बीच हल्की झड़प भी हुई थी। पुलिस को फायरिंग भी करनी पड़ी थी। करीब 24 घंटे के बाद बंधक बने पुलिसकर्मियों को मुक्त कराया जा सका था।    

 

पिछले 9 मार्च 2018 को पत्थलगड़ी के एक वर्ष पूरे होने पर खूंटी के भंडरा के स्थानीय बाजारटांड़ में एक सभा का आयोजन किया गया था। सभा में आदिवासियों से एकजुट होने की अपील के साथ साथ पत्थलगड़ी के महत्व को समझाते हुए वक्ताओं में आदिवासी महासभा के यूसुफ पूर्ति ने कहा कि 'पारंपरिक पत्थलगड़ी हम आदिवासियों की परंपरा है। इसमें हम संवैधानिक अधिकारों को अंकित कर रहे हैं। इसे गलत बता कर हमें देश विरोधी बताया जा रहा है। जो हमारी पारंपरिक स्वशासन पर हमला है।'  

इस कार्यक्रम में लगभग 3000 से अधिक लोगों की मौजूदगी के चारों तरफ तीर-धनुष से लैस आदिवासी युवक तैनात थे। सभा के दौरान वीर बिरसा मुंडा के जयकारे लगाये जा रहे थे।

 

सभा समाप्ति के बाद पत्रकारों से बात करते हुए यूसुफ पूर्ति ने कहा कि 'किसी भी सरकार को सरकार कहलाने के लिए भू-भाग की आवश्यकता होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत में केंद्र सरकार और राज्य सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। बिना भू-भाग के ये सरकार कैसे बन गयी हैं? वर्जित क्षेत्र में घुस कर सीएम और जिला प्रशासन तानाशाही कर रहे हैं। वर्जित क्षेत्र में गैर आदिवासियों का मौलिक अधिकार लागू नहीं है। डीसी और एसपी कह रहे हैं कि संविधान की गलत व्याख्या की गयी है। ऐसा कहीं नहीं है, वे सामान्य कानून को हम पर थोपने का काम कर रहे हैं। जिला प्रशासन को भी वर्जित क्षेत्र में काम करने के लिए गवर्नर लोक अधिसूचना जारी करते हैं, जो आज तक जारी नहीं की गयी है। इसलिए जिला प्रशासन अवैध है। गवर्नर जिस दिन अधिसूचना जारी करेंगे, तब जिला प्रशासन वैध हो जायेगा। अवैध जिला प्रशासन की ओर से चुनाव होते हैं। विजेता को अवैध डीसी की ओर से सर्टिफिकेट दिया जाता है। इसलिए एमपी-एमएलए भी अवैध हैं। अवैध लोगों द्वारा बनाया गया कानून पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं होता है।' 

यूसुफ पूर्ति ने कहते हैं — 'भारत  देश आजाद नहीं हुआ है। 15 अगस्त 1947 को ट्रांसफर ऑफ पावर हुआ था। आजादी  का मतलब स्वशासन होता है, जो हम आदिवासियों को नहीं मिला है। यह वर्जित  क्षेत्र है। भारत के संविधान में इसे पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र के रूप में बताया गया है। इसी के तहत गांव में स्वशासन व्यवस्था चलायी जा रही है। ओआइजीएस ग्राम सभा को राष्ट्र विरोधी की संज्ञा दे रहे हैं। हम आदिवासी राष्ट्र विरोधी नहीं हैं, न ही संविधान की गलत व्याख्या कर रहे हैं। हम आदिम आदिवासी भारत सरकार हैं।'

वे आगे कहते हैं — 'सारे दस्तावेज आदिवासियों के पास हैं। आदिवासियों के पक्ष में हैं। आदिवासी जाग चुके हैं। ग्राम सभा सभी नियम कानून बना सकती है और अनुपालन नहीं करने पर सजा भी दे सकती है। आदिवासियों पर केस करने के लिए हिज मजिस्ट्रेट यानी ब्रिटेन प्रिवी काउंसिल मतलब ब्रिटेन के पार्लियामेंट से परमिशन लेना होता है। यह भारत सरकार की रूलिंग कहती है। 

वे सुप्रीम कोर्ट चले जायें, हम बहस करने को तैयार हैं। सीएनटी एक्ट, संविधान, विलकिंसन रूल या किसी भी कानून में संशोधन करने के लिए भारत सरकार के रूलिंग में ओआइजीएस को अधिकार नहीं है। किसी भी नियम कानून को संशोधन करने के लिए केंद्र सरकार, राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट को प्रिवी काउंसिल ब्रिटेन से अनुमति लेनी होती है।' 

चुनाव पर यूसुफ पूर्ति ने कहा — 'यह देश बड़े देश के अंदर उपनिवेशवाद के अधीन चल रहा है। वर्जित क्षेत्र में चुनाव को लेकर लोक अधिसूचना लागू नहीं है। लोक अधिसूचना जारी होती है, तो हम शामिल हो जायेंगे। जब तक अधिसूचना नहीं हुई है, तब तक हम चुनाव में क्यों शामिल हों।'

ग्राम सभा द्वारा शिक्षा व्यवस्था चलाने के सवाल पर उन्होंने कहा — 'जब तक नन ज्यूडिशनल आरक्षण गवर्नर द्वारा जारी नहीं किया जाता,  हम अपने बच्चों को ज्यूडिशनल स्कूल-कॉलेज में नहीं भेजेंगे।' 

पत्थलगड़ी की वर्षगांठ मनाने वालों के खिलाफ एफआईआर!

दूसरी तरफ इलाके में चल रहे पत्थलगड़ी पर झारखंड सरकार की बौखलाहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के निर्देश पर उच्चाधिकारियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की गई जिसमें खूंटी जिले के उपायुक्त, एसपी समेत प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ मुखिया और ग्रामसभा के अध्यक्षों को भी शामिल किया गया।

 

बैठक की जानकारी देते हुए गृह सचिव एसकेजी रहाटे ने बताया कि पत्थलगड़ी को गलत तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। पत्थलगड़ी के जरिये भारत के संविधान की गलत व्याख्या की जा रही है। सुदूरवर्ती गांवों में कुछ लोग स्थानीय ग्रामीणों को सरकार की विकास योजनाओं के खिलाफ भड़का रहे हैं। इस तरह के काम में संलिप्त कई लोगों को प्रशासन ने चिह्नित किया है। उनके खिलाफ प्रशासन के द्वारा कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई की जायेगी। उन्होंने बताया कि प्रभावित इलाकों में सरकार विशेष कार्यक्रम चलाकर लोगों को रोजगार मुहैया करायेगी। वहां के स्थानीय प्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच संवाद बढ़ाया जायेगा, ताकि सरकार के प्रति लोगों का विश्वास वापस स्थापित किया जा सके।

 

बैठक में मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और विशेष शाखा के अपर पुलिस महानिदेशक समेत कई अधिकारी शामिल हुए। बैठक के दौरान मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम जिले के पुलिस अधीक्षकों से भी बात की और उनके द्वारा उठाये गये कदम की जानकारी ली।

वहीं खूंटी के भंडरा गांव में नौ मार्च को पत्थलगड़ी की वर्षगांठ मनाने के बहाने सभा कर साजिश रचने के आरोप में खूंटी पुलिस ने मामला दर्ज कर 27 लोगों को नामजद एवं 1500 अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया है। नामजद अभियुक्तों में मुख्य रूप से बबीता कच्छप, डॉ. जोसेफ पूर्ति, विजय कुजूर, जॉन तिड़ू, बलराम समद आदि शामिल हैं।  

सरकार की बौखलाहट का असली कारण कुछ और है 

मुख्यमंत्री रघुवर दास कहते हैं कि 'पत्थलगड़ी के बहाने इलाके में अफीम की खेती की जा रही है, प्रशासन इस काले काम पर प्रतिबंध नहीं लगा सके इसलिये ग्रामीणों को सरकार व प्रशासन के खिलफ भड़काया जा रहा है, जो हम होने नहीं देंगे।'  रटे रटाए जुमलों में रघुवर दास कहते हैं कि 'पत्थलगड़ी के नाम पर राष्ट्रद्रोही ताकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।'

वहीं सरकार के पक्ष में आरएसएस भी आकर खड़ा हो चुका है और पत्थलगड़ी को ईसाइयों का खुराफात बता रहा है। 

जबकि पत्थलगड़ी के जानकार कहते हैं कि कोई गलत काम नहीं हो रहा है। उनका मानना है कि पत्थलगड़ी से सरकार की बौखलाहट का असली कारण कुछ और है। 

बताते चलें कि फरवरी 2017 को झारखंड में ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट मोमेंटम झारखंड का आयोजन किया गया था जिसमें 210 कंपनियों के साथ करीब तीन लाख करोड़ के एमओयू साइन हुए थे। उस अवसर पर सरकार की चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा ने अपने भाषण में झारखंड में उद्योग की संभावनाओं पर चर्चा की और कहा था कि 'इज ऑफ डूइंग बिजनेस में झारखंड टॉप पर है तो लेबर रिफॉर्म्स में भी झारखंड नंबर एक पर है।'

जाहिर है उनका इशारा सस्ती दरों पर उपलब्ध मजदूरों की ओर था। 

सीएस ने कहा था कि 'इंवेस्टमेंट के लिए जमीन सबसे अहम होती है और राज्य सरकार ने लैंड बैंक बनाया है, जहां आज निवेश के लिए 2.1 मिलियन एकड़ जमीन उपलब्ध है।

जाहिर है उनका इशारा उन जमीनों की ओर था जो आदिवासियों के जीवन—यापन से जुड़ी हुई हैं।

अब जब पत्थलगड़ी के बहाने संवैधानिक आधार के तहत आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल होने को तैयार नहीं दिख रहे हैं तो कारपोरेट परस्त भाजपा नीत रघुवर सरकार की बौखलाहट बढ़ गई है और इसी बौखलाहट का नतीजा है कि मुख्यमंत्री भारतीय संविधान पर ध्यान तक नहीं दे रहे हैं जिसमें पत्थलगड़ी समर्थकों द्वारा दी जा रहीं दलीलों में दम दिखता है।  

कोचांग के ग्राम प्रधान काली मुंडा कहते हैं, 'हम स्वशासन की मांग नहीं कर रहे हैं यह पत्थलगड़ी तो हमारा अधिकार है। हमलोग संविधान में उल्लिखित अधिकारों से समस्त आदिवासियों को वाकिफ़ कराना चाहते हैं। हमारी पत्थलगड़ी इसी कारण है। हमलोग अपने इलाके के तमाम गांवों में यह आयोजन करेंगे। अगर सरकार ने इसे रोकने की कोशिश की, तो इसका विरोध होगा।'

शंकर महली कहते हैं कि 'सरकार हमारे इलाके में शौचालय बना रही है। यह कैसा विकास है। आदिवासियों के खाने के लिए पेट में अन्न नहीं है, तो शौचालय बनाकर क्या कीजिएगा। हम विकास के इस सरकारी मॉडल में शामिल नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार हम आदिवासियों पर अपना कानून थोपना चाहती है। हम मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार के ख़िलाफ़ संवैधानिक लड़ाई लड़ेंगे।' 

वहीं मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि झारखंड के आदिवासी भोले-भाले हैं। उन्हें कुछ बाहरी लोग गुमराह कर रहे हैं।

हालांकि, नवनियुक्त मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी ने इस बाबत कहा है कि पत्थलगड़ी करने वाले लोग कुछ संदेश देना चाहते हैं। हमें इस संदेश को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

बेहाल गांवों की एक तस्वीर। फोटो साभार

विकास की राह तकते गांवों का दर्द

कुरूंगा गांव की मुखिया गीता समद कहती हैं कि 'गांव में किसी के आने-जाने पर रोक नहीं है। हां, अपरिचित या नये लोग दिखते हैं, तो गांव के लोग पूछताछ करते हैं।गांव में अभी भी विकास की किरण तक नहीं पहुंची है। लोग चाहते हैं कि गांव में भी विकास हो। अभी भी गांव के लोग पेयजल के लिए कुरूंगा नदी के पानी पर ही निर्भर हैं। गर्मी में  काफी दिक्कत होती है। स्कूल है, पर आठवीं तक की ही पढ़ाई होती है। आगे की  पढ़ाई के लिए  खूंटी जाना पड़ता है। ममता वाहन का लाभ नहीं मिल पा रहा है।'  

 

वे कहती हैं 'अगर कोई बीमार पड़ जाये, तो अड़की या खूंटी के स्वास्थ्य केंद्र में जाना पड़ता है। गांव तक पहुंचने का रास्ता जर्जर है। ज्यादा वाहन भी नहीं चलते। ऐसे में काफी परेशानी होती है।' 

गीता आगे बताती हैं 'ग्राम सभा की बैठक में लोगों की सहमति से ही किसी मामले में निर्णय किया जाता है। यहां पर मुखिया या किसी व्यक्ति विशेष का जोर नहीं चलता।'

 

अड़की के जंगल के बसे गांवों के दर्द का आलम यह है कि अड़की से बीरबांकी तक जर्जर सड़क है। इसके बाद कुरूंगा तक जाने के लिए मिट्टी की सड़क। इलाके के लगभग सभी गांवों की यही दुर्दशा है। बिजली, पानी, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं इन गांवों में नहीं है। चप्पे-चप्पे में गरीबी और दिन-दोपहर नशे में डूबे लोग। इन गांवों में स्वास्थ्य कर्मी हो या फिर सरकार की योजनाओं को लागू करनेवाली एजेंसियां, कोई नहीं पहुंचती। गांव के लोगों को मालूम ही नहीं है कि बाहर की दुनिया में क्या चल रहा है़।  

पांच अक्तूबर 2017 को ग्रामसभा उलीडीह के नाम से की गयी पत्थलगड़ी में कुछ ऐसा लिखा हुआ है

 1. भारत का संविधान अनुच्छेद 13(3)(क) के तहत रूढ़ी या प्रथा ही विधि का बल है, यानी संविधान की शक्ति है।

 2. अनुच्छेद 19(5) के तहत पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी गैर रूढ़ी प्रथा व्यक्तियों को स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना, निवास करना, बस जाना, घूमना-फिरना वर्जित करता है।

 3. भारत का संविधान के   अनुच्छेद 19(6)के तहत कोई भी बाहरी व्यक्तियों को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में व्यवसाय, कारोबार व रोजगार पर प्रतिबंध है।

 4. पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में भारत का संविधान अनुच्छेद 244(1) भाग(ख)   पारा(1) के तहत संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है।


जारी...

(‘जनचौक’ पर इसका अगला और अंतिम हिस्सा कल, 17 मार्च को पढ़िए)

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)










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Praveen pradhan :: - 03-20-2018
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

Balbir sawaiyan :: - 03-17-2018
Thank you jankari se ru ba ru karaya

Jeewanlal garwal :: - 03-17-2018
Smaj ke hit ka kam