जेटली को आईना दिखाने के लिए काफी है समझौता ब्लास्ट फैसले में आयी जज की टिप्पणी

त्रासदी , , शनिवार , 30-03-2019


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धीरेश सैनी

समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट को लेकर `समयांतर` के लिए एक छोटी सी टिप्पणी लिखने के लिए पिछले एक हफ्ते में इस केस से जुड़ी कई चीजें पढ़ीं। जाहिर है कि ये चीजें मक़्का मस्जिद बलास्ट केस, मालेगांव ब्लास्ट केस आदि से भी जुड़ी हुई थीं। स्वास्थ्य कारणों से मुश्किल के बावजूद इसी सिलसिले में एक छोटी सी यात्रा भी की। समझौता एक्सप्रेस केस की जांच की शुरुआत करने वाली हरियाणा पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) के प्रमुख रहे Vikash Narain Rai से बातचीत के लिए।

पत्रिका जिस वक़्त प्रेस में जाने वाली थी, तभी स्पेशल एनआईए कोर्ट के फैसले की कॉपी सार्वजनिक हुई और उसका सार कल इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ। अंग्रेजीदां मित्र रमणीक मोहन की मदद से उसकी कुछ पंक्तियां हिंदी में पढ़वाकर जोड़ के तौर पर समयांतर को भेजी और किसी भी तरह उन्हें जोड़ लेने का अनुरोध किया। क्योंकि जज की एक अकेली टिप्पणी `the “best evidence” was “withheld” by the prosecution and was not brought on record.` (‘अभियोजन ने कारगर साक्ष्यों को रोक दिया था`) भी सब कुछ बयान कर देने के लिए पर्याप्त थी।

फैसले में जज की तीखी टिप्पणियां ही वजह थीं कि 21 मार्च को आए फैसले के बाद से जारी भाजपा/सरकार की हैरानी भरी ख़ामोशी टूटी। बक़ौल दैनिक जागरण- ``समझौता ब्लास्ट मामले में पंचकूला स्थित एनआईए की विशेष अदालत द्वारा फैसले की कॉपी सार्वजनिक किए जाने के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। वरिष्ठ भाजपा नेता एवं केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शुक्रवार को कहा कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए 'हिंदू आतंकवाद' की थ्योरी को गढ़ा था। कांग्रेस ने इस थ्योरी को स्थापित करने के लिए फर्जी सबूतों के आधार पर बेगुनाह लोगों के खिलाफ केस दर्ज किए। लेकिन, अब अदालत के आदेश आने के बाद इसका पटाक्षेप हो गया है। जो लोग हिंदुओं को आतंकवादी मानते थे अब वे धर्म के प्रति निष्ठा जताने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा नेता ने कहा कि यूपीए सरकार के कदम से धमाके को अंजाम देने वाले वास्तविक गुनहगार बच निकले।`` (दैनिक जागरण की वेबसाइट)

दिलचस्प यह है कि एनआईए जज के फैसले की कॉपी सार्वजनिक हो जाने के बाद आया यह बयान फैसले में जांच एजेंसी को लेकर की गई कड़ी टिप्पणियों के सामने खोखला साबित हो रहा है। विकास नारायण राय इस बारे में अपनी बात बिंदुवार कह चुके हैं। रुटीन के रिपोर्टर वाली पुरानी आदत के चलते और आदतन ही रिपोर्टर होने के नाते जेटली के बयान को लेकर भी दो-चार लाइनें जुड़वाने के लिए `समयांतर` को कल ही भेज दी थीं जिनका जुड़ पाना शायद ही संभव हो। यूं भी इस बारे में विकास की ज़रूरी पोस्ट समेत महत्वपूर्ण चीजें छप रही हैं (हिंदी मीडिया की `मुख्यधारा` में भले ही नहीं) और छपने वाली हैं। छपने-छपाने से ज़्यादा मेरी मुश्किल यह है कि विभिन्न सामग्री से गुज़रते हुए फासिज्म को लेकर मेरा `भरोसा` मजबूत होने लगता है। समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद, मालेगांव आदि के ब्लास्ट केस किस तरह इंटरलिंक हैं और इनमें कैसी समानताएं हैं, यह बात जगजाहिर है।

समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट की शुरुआती जांच करने वाले हरियाणा एसआईटी के प्रमुख विकास नारायण राय हैरान थे कि मालेगांव ब्लास्ट केस की जांच कर रही एटीएस के चीफ हेमंत करकरे जिन एविडेंसेज तक पहुंच रहे थे, वे एक से इन केसेज के तौर-तरीक़ों में समानता का इशारा कर रहे थे। करकरे को मिले सबूत इतने सॉलिड थे कि किसी भी जिम्मेदार अफसर के लिए उन्हें नकारना मुमकिन नहीं था। वही लोग एक केस में थे, वही दूसरे में। असीमानंद का लिंक मक्का मस्जिद केस में उभर रहा था तो समझौता केस में भी जुड़ रहा था। जाहिर है कि हड़कंप मचना ही था क्योंकि सिरा संघ की टॉप लीडरशिप की तरफ पहुंचता था।

मोटे तौर पर यह कि अभिनव भारत या किसी भी संगठन का नाम लीजिए, आरोपियों की पृष्ठभूमि आरएसएस से जुड़ती थी। प्रज्ञा सिंह एबीवीपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जुड़ी रह चुकी थीं। असीमानंद का नाम आरएसएस की विंग वनवासी कल्याण आश्रम के शीर्ष नामों में शुमार था। सुनील जोशी जिसकी हत्या कर दी गई थी, मध्य प्रदेश में संघ के बड़े नामों में से था। दांगे भी आरएसएस का प्रचारक रह चुका था। आरएसएस के एक बड़े नेता इंद्रेश कुमार तक से पूछताछ की गई थी और आरएसएस के लिए खतरा इससे ज्यादा बड़ा हो सकता था। 2010 में आरएसएस ने देशभर में धरने भी आयोजित किए थे। 2014 में आरएसएस की राजनीतिक विंग भाजपा केंद्र में सरकार में लौटी थी।

इतनी ताकतवर होकर कि धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्थाएं मोदी सरकार के सामने बौनी और अप्रासंगिक नज़र आने लगीं। तभी ब्लास्ट्स के इन खास केसेज को देख रही एनआईए की भूमिका पर सवाल भी उठने लगे थे। यहां तक कि मालेगांव ब्लास्ट केस की विशेष सरकारी वकील रोहिणी सलायन ने आरोप लगाया था कि सरकार बदलने के बाद एनआईए उन्हें इन मामलों में नरम रुख अख्तियार करने के लिए कह रही है। मुख्य आरोपी संघ से जुड़े रहे थे। केंद्र में संघ की राजनीतिक इकाई की ताकतवर सरकार थी और एनआईए उसके अधीन थी। एनआईए की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता के हश्र को अंतत: समझौता एक्सप्रेस केस के फैसले के जज टिप्पणी से भी समझा जा सकता है।

 लेकिन, जज अगर अपनी पीड़ा और मजबूरी को बयान करने वाली टिप्पणी नहीं भी करते तो? तो क्या किसी जरा भी समझदार व्यक्ति के लिए देश के मौजूदा हालात को समझना मुश्किल होता? कितने मामले जनता के सामने गुजर चुके हैं। एक जज लोया की मौत को लेकर क्या-क्या बातें सामने आती रही हैं। कितने लोगों को सरेआम मारते-पीटते हुए, नृशंसता से हत्या करते हुए वीडियो बनाए गए और हमलावरों-हत्यारों के जरिये ही वायरल कर दिए गए! क्या जनता वाकिफ़ नहीं है कि ये कौन लोग हैं, किस विचार, किस संगठन से जुड़े हैं और ऐसी कौन सी ताकत है जो उन्हें बचा लेती है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बहुसंख्यक जनता ने इस स्थिति को आदर्श स्थिति के लिए स्वीकार कर लिया है।

वह इन्हीं सब के लिए हर मुद्दा-मसला भुलाकर वोट नहीं दे रही है? और क्या विपक्ष ने इसी राजनीति को स्वीकार नहीं किया है? और क्या किसान और क्या सामाजिक न्याय के मसीहाओं ने चुनावी समीकरणों को साधने के इंतज़ार के अलावा कभी जनता के अमानवीयकरण के अभियान के बरक्स कोई गंभीर मुहिम छेड़ने की कोशिश की? आज इन मसीहाओं की हैसियत अपने वोटर तक को खतरनाक किस्म के प्रायोजित परसेप्शन्स में फंसने से रोकने की नहीं है। हालत तो यह है कि मसीहा खुद उस दरवाजे पर सिर नवाते रहे हैं, कुछ वहीं के होकर रह जाते हैं और कुछ मददगार की भूमिका के वादे के साथ अपने भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिशें करते रहते हैं। इन मसीहाओं के विभिन्न जिलों के बहुत से `कद्दावर` फासिस्टों की चौखट से सिर्फ़ मौक़ा हासिल करने भर की दूरी पर डोलते दिखाई देते रहते हैं।  

 समझौता एक्सप्रेस विस्फोट केस में फैसला सुनाने स्पेशल एनआईए कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने उम्मीद के तौर पर पुलिस के उन एएसआई कश्मीर सिंह का उल्लेख किया है जिन्होंने मानवता, साहस और कर्तव्यपरयाणता का परिचय देते हुए जलती ट्रेन से लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। इसी तरह हम कुछ लोग कह सकते हैं कि हमारे बीच उम्मीद के तौर पर हेमंत करकरे या विकास नारायण राय जैसे पुलिस अफसर भी मौजूद रहते हैं जो किसी केस को एक प्रतिबद्ध प्रोफेशनल की तरह डरे बिना तथ्यों और सबूतों के आधार पर इस तरह आगे बढ़ा देते हैं कि उस लाइन को मिटा पाना मुमकिन नहीं रह जाता है। मक्का मस्जिद केस में भी मुस्लिम लड़कों को उठा ही लिया गया था

जिन्हें बाद में छोड़ देना पड़ा। अगर करकरे की जांच की लाइन गलत होती तो क्या उन्हें छोड़ पाना संभव होता? अगर विकास की फाइंडिंग्स गलत होतीं तो मोदी सरकार के दौरान नये या एडिशनल एविडेंसेज केस में न जोड़ दिए गए होते? लेकिन, इस तरह के अफसर कितने हैं? और जो हैं, उन्हें कितने दबावों से गुज़रना पड़ता है? मुंबई के आतंकी हमले में शहीद हो गए करकरे पर किस तरह के घिनौने हमले किए जा रहे थे, कौन नहीं जानता? कांग्रेस की साजिश कहकर तथ्यों से मुंह मोड़ना हास्यास्पद है। कांग्रेस की भूमिका तो थी पर इतनी कि यूपीए सरकार के दौरान भी इन केसेज में जो गति अख्तियार की जानी चाहिए थी, उसकी छूट गायब थी। सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति में पनाह ढूंढने वाली कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियों से किसी करकरे या ऐसे किसी प्रतिबद्ध अफसर को क्या मदद मिल सकती थी? पॉपुलर पॉलिटिक्स की विपक्षी पार्टियों में से किसी की भी कभी ऐसी मंशा तक नहीं रही कि अपने कोर वोटर्स को ही सेक्युलर मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहना सिखाया जाए।

नाजुक पलों में भी भीतर के इंसान से संचालित होने वाले शख़्स इतने नासमझ नहीं होते कि वे किसी दल, किसी नेता या गफलत में डूबे समाज से अपने लिए किसी कवच की उम्मीद करते हों। हम देखते हैं कि इस वक़्त में भी कोई एक मामूली पत्रकार किसी क्षण में किसी केस में भय या लालच से प्रभावित होने से इंकार कर देता है और इसकी कीमत चुकाता है। कोई पुलिस अधिकारी अपनी संवैधानिक भूमिका निबाहने के लिए तत्पर हो जाता है और इसकी कीमत चुकाता है। कोई जज अपनी कुर्सी की गरिमा और जिम्मेदारी को महसूस करते हुए अपने पिता को कह देता है कि वह ग़लत फैसला देने के बजाय गांव में आकर खेती से गुजारा कर लेना पसंद करेगा।

 लेकिन, समझौता एक्सप्रेस केस को लेकर विकास नारायण राय से बात करते हुए उनके आशावाद ने मुझे हैरान किया। वे माहौल की निराशा को स्वीकार करते हैं पर उतना ही जोर देकर कहते हैं कि जनता का बड़ा हिस्सा संविधान विरोधियों के साथ नहीं है। यह एक अलग विषय है कि वह कितना प्रभावी है या उसे कितना संबोधित किया जा पा रहा है। वे कोई नया एक्ट बनाने की जरूरत महसूस करने लगते हैं जबकि मैं सोचता हूं कि एक्ट बनाने वाले तो कोई और ही हैं या जो एक्ट हैं /उन्हें ही सिर के बल खड़ा कर दिया गया है।

संवैधानिक मूल्यों पर पाबंद पुलिस अधिकारियों पर सुनियोजित हमलों को लेकर वे चिंता तो जताते हैं पर निराश नहीं होते। कहते हैं कि अफसर को प्रोफेशनली और संवैधानिक दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। लेकिन, जनता कहां खड़ी है, ऐसे सवाल पर वे दोहराते हैं, मैं नहीं मानता कि पब्लिक देर तक यह अफोर्ड करती रहेगी। लेकिन, विपक्ष जो लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देता रहता है, चुनाव तक में तो एकजुट नहीं हो पा रहा है, इस पर वे कहते हैं कि दुनिया भर में यही सब हो रहा है लेकिन यही होता रहेगा, यह मुमकिन नहीं है।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

 








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