कश्मीर पर हम सिर्फ झूठ बोलना और सुनना चाहते हैं

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 22-06-2017


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शाहनवाज आलम

कश्मीर अब भारत के लिए एक ऐसा सवाल बन चुका है जिसका सही-सही जवाब कोई नहीं देना चाहता। जब भी किसी सवाल के साथ ऐसा होता है तब उसे पूछने वालों का अपने सवाल के सही होने पर विश्वास और मजबूत होता जाता है। वहीं जवाब से भागने वाला पक्ष कभी सवालों को टालने, कभी उलझाने और यहां तक कि उसके औचित्य को ही खारिज करने की कोशिश करता है। यह प्रयास उसे हर रोज नए-नए झूठ गढ़ने और उसे अपनी जनता में बिकवाने के लिए मजबूर करती है। इस तरह हम कश्मीर का जवाब देने के बजाए एक राष्ट्र के बतौर लगातार सामूहिक रूप से झूठ बोलते हैं, ना सिर्फ कश्मीरियों से बल्कि उससे कहीं ज्यादा खुद से। सत्यमेव जयते को आदर्श मानने वाले हम भारतीयों के लिए कश्मीर के मुद्दे पर कोई भी सच स्वीकार करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।  

अभी कुछ दिनों पहले हुए कश्मीर उपचुनावों में जिसमें 8 लोगों की जान जाने के बाद भी सिर्फ 7 प्रतिशत ही मतदान हुआ। अब घाटी के अंदर झूठ बोलने से इनकार करने वाला हर आदमी यह कह रहा है कि कश्मीर अब भारत से कोसों दूर जा चुका है, तब हमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे एमके नारायण की इस टिप्पणी को जरूर याद करना चाहिए कि अब रोजमर्रा वाली दलीलें काम नहीं आएंगी, बल्कि उनका उलटा असर होगा।

कश्मीर में हर घटना के पीछे पाकिस्तान का हाथ बताना

इसीलिए हम पाते हैं कि जब भी हम पर कश्मीर में पत्थर की तरह सवाल मारे जाते हैं तो हमारी सरकार, मीडिया, सेना, राजनीतिक दल सभी लगातार झूठ बोलने लगते हैं कि यह सब पाकिस्तान करवा रहा है, पाकिस्तान इन्हें पत्थर मारने के एवज में रुपए दे रहा है। उनके पत्थरबाजी के बीच ऐसी खबरें हमें सुकून देती हैं। हम उनके पत्थरों का जवाब खुद से झूठ बोल कर देते हैं। इस तरह हर पत्थरबाजी के बाद हम कश्मीर पर पहले से ज्यादा झूठ बोलने और सुनने वाली झुंड में तब्दील होते जाते हैं। जबकि सच्चाई तो यह है कि अब पाकिस्तान ही नहीं खुद अलगाववादी नेतृत्व भी कश्मीरियों के लिए अप्रासंगिक हो चुका है।यह सवाल वो खुद अपने बूते पर अपनी जान दांव पर लगाकर पूछ रहे हैं।

सच को नकारना कश्मीर समस्या की जड़

दरअसल, कश्मीर समस्या की जड़ में हमारी सच्चाई से कतराने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा निर्णायक रही है। इसीलिए दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ों, नदियों, झीलों और उनके बीच रहने वाले लोगों के इस जीवंत तस्वीर को हमारी नजरों ने एक बनावटी तस्वीर में तब्दील कर दिया है। क्योंकि हम धरती के इस सबसे खूबसूरत टुकड़े के मालिकों से नजर नहीं मिला पाते। हम कश्मीर को एक निर्जीव तस्वीर की तरह देखने में ही सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि बोलने वाली कोई भी शै हमसे सवाल पूछ सकती है, हमारी नैतिकता आंक सकती है। इसीलिए, जब तकरीबन 60 वर्षीय शिकारा वाले हमें डल झील के बीचोबीच ले जाकर यह बताते हैं कि इसी जगह पर ऋषि कपूर के परदेसियों से ना अंखियां मिलानागाने की शूटिंग हुई थी, मेरे साथी लक्ष्मण प्रसाद के यह पूछने पर कि क्या वो वोट देते हैं, वह अचानक सकपका जाते हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आता कि कोई भारतीय पर्यटक उनसे ऐसे सवाल क्यों पूछ रहा है ? क्योंकि वहां लोग पहाड़ और डल झील तो देखने जाते हैं या उनसे मिशन कश्मीरफिल्म के एक ऐक्शन सीन की शूटिंग स्थल तक तो ले जाने की बात करते हैं, उनसे कोई उनकी दुनिया की राजनीति पर उनकी राय नहीं पूछता। उनका जवाब था कि वो शायद जानते हैं कि हम वोट नहीं देते, हम आजादी चाहते हैं इसीलिए वो हमसे ऐसे मुद्दों पर बात करने से बचते हैं। वो बस घूम फिर कर चले जाना चाहते हैं। क्या ये सवाल हमें खुद से नहीं पूछना चाहिए कि हम ऐसे क्यों हैं

लेकिन मुझे लगता है कि कश्मीर के मुद्दे पर जैसे ही आप बात करेंगे आपकी धारणाओं पर आपको धोखा दे देने का दबाव पड़ सकता है। मसलन, बानिहाल से श्रीनगर की दो घंटे की रेल यात्रा में सुबह-सुबह कालेज जा रहे छात्रों से बात करके आपकी यह धारणा थोड़ी देर में ही चारों खाने चित्त हो जाने को अभिशप्त है कि कश्मीर के युवाओं को रोजगार चाहिए, आजादी नहीं। उन्हें सिर्फ और सिर्फ आजादी चाहिए। मुझे एक लड़के का फिल्मी अंदाज में दिया गया यह जवाब शायद ही कभी भूले कि वो गुलाम देश में रोजगार पाने से ज्यादा आजाद कश्मीर में बेरोजगार होना पसंद करेगा। ऐसा कोई भी जवाब सुनकर आप अपनी आजादी की समझ की बुनियाद पर उस खूबसूरत रेल मार्ग के दोनों तरफ पड़ने वाले चिनार के लम्बे-लम्बे दरख्तों और उनके पीछे बर्फ से अपना मुंह ढक कर खड़े दिलफरेब फलकबोस चोटियों को देख कर खुश या दुखी हो सकते हैं।

कश्मीरी किससे चाहते हैं आजादी

लेकिन आजादी किससे? भारत से ? पाकिस्तान जैसे फेल्ड, आंतरिक संघर्षों में जूझते देश का हिस्सा बनकर आप क्या पाएंगे ? भारत जैसा भी है एक उभरती हुई महाशक्ति है पाकिस्तान के पास तो न इकानामी है न रूतबा, आप पाकिस्तान के साथ क्यों जाना चाहते हैं ? जब भी कोई भारतीय पत्रकार या मामले में दिलचस्पी रखने वाला यह सवाल किसी कश्मीरी के सामने रखता है तो वो आपके सामने डिप्लोमेटिक बुनियाद पर भी तर्क रखेगा। और वो ऐसा किसी विश्वविद्यालय की कैंटीन में नहीं बल्कि अनंतनाग के बटपुरा जैसे छोटे से कस्बे की चाय की दुकान पर आपको बताएगा कि पाकिस्तान उसे इसलिए पसंद है कि भारत के मुकाबले उसने आजाद कश्मीरके लोगों के साथ किए गए तीनों मुहायदों का सम्मान करना जारी रखा है। वह आपको बताएगा कि वहां आज भी उसके चुने हुए संसद के मुखिया को प्रधानमंत्री माना जाता है, वहां आज भी उसका अपना झंडा है और आज भी वहां के हाईकोर्ट के फैसलों में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट का दखल नहीं है। क्या हमें याद है कि कश्मीर से 370 के तहत हुए हमारे मुहायदे में भी हमने उनसे यही वादे किए थे ? आप कह सकते हैं कि कश्मीरियों के पाकिस्तान के प्रति आकर्षण की एक बड़ी वजह हमारी वादा फरामोशी है।

इसी तरह हम इस अर्धसत्य में भी अब जीने के आदी हो गए हैं कि कश्मीर से हिंदुओं को, जिन्हें मैं नहीं समझ पाता हूं कि क्यों पंडितकहा जाता है जबकि वहां अन्य हिंदू जातियां भी हैं, पूरी तरह से भगा दिया गया। ये एक सच्चाई है लेकिन पूरी तरह आधी अधूरी सच्चाईयों को प्रचारित कर हम क्या हासिल करना चाहते हैं ? हमने ये क्यों नहीं स्वीकार किया और अपनी अवाम को बताया कि जब कश्मीरी हिंदुओं को वहां से पाकिस्तान समर्थित अलगाववादियों ने उन्हें उनके घरों से भागने की चेतावनी दी और राज्यपाल जगमोहन ने बिना स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को विश्वास में लिए उन्हें वहां से भागने की रातों-रात विशेष व्यवस्थाएं कीं तब भी बहुत से मुसलमानों ने इसका विरोध किया था, लेकिन जगमोहन नहीं माने थे। क्या ये सवाल नहीं बनता कि अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है और उसके मुताबिक उसकी सम्प्रभुता पर हमला हो रहा था, तब आबादी के एक हिस्से को वहां से हटा कर आपने दूसरे हिस्से को क्या पाकिस्तान के समर्थक के बतौर प्रचारित करने के लिए छोड़ दिया था?

इसीलिए जब कोई 20 वर्षीय पत्थरबाजआपसे यह पूछता है कि वे क्यों चले गए, उन्हें अपने घर में रहना चाहिए था, उनके सारे पवित्र स्थल यहां हैं, हमारी तरह जूझना चाहिए था, तब आपके पास कोई तार्किक जवाब इसके अलावा नहीं रह जाता कि वो स्थिति उनके रहने लायक नहीं रह गई थी।लेकिन ये तर्क भी उसके यह पूछ देने पर असहाय हो जाता है कि क्या हमारे रहने लायक वो वक्त था ?’

कश्मीर में वेरीनाग झील पर स्थित मंदिर। फोटो: शाहनवाज

कश्मीर में आज भी सुरक्षित हैं हिंदू मंदिर

लेकिन आज जब यह आधा झूठ एक पूरे सच में तब्दील कर दिया गया है तब झेलम नदी के स्रोत माने जाने वाले वेरीनाग झील जिसे मुगल बादशाह जहांगीर ने 1620 में संवारा था, पर खड़े होकर यह जानना किसी के लिए भी आश्चर्यजनक हो सकता है कि वहां बीचो-बीच स्थित प्राचीन मंदिर न सिर्फ साबूत खड़ा है बल्कि ताला लगे गेट के अंदर रखी मूर्ति भी पिछले 27-28 सालों से उसी तरह अपने पूजने वालों के लिए मुंतजिर है जिस तरह आखिरी बार उसके उपासकों ने उसे वहां से भागने से ऐन पहले देखा होगा।

कश्मीरी मुसलमानों की हिंदू विरोधी छवि को चुनौती देते इस मंजर को स्वीकार करके आप अपनी पसंदीदा धारणाओं को बदलने की कितनी छूट दे सकते हैं और कितनी नहीं, यह सोचते हुए जब आप वहां से डुरु की ओर जाते हैं तब रास्ते में उजाड़ पड़े अधजले मकान आपको अपनी तरफ सिर्फ इस वजह से ज्यादा आकर्षित नहीं करते कि ये पलायित कर चुके हिंदुओं के घर हैं। बल्कि इसलिए ज्यादा आकर्षिेत करते हैं कि मुसलमान पड़ोसियों ने अपने घरों से लगे हिंदुओं के इन घरों को इसलिए जला दिया कि इन खाली घरों को आतंकी छुपने और मोर्चा लेने के लिए जब इस्तेमाल करते थे तब सेना की क्रास फायरिंग की जद में उनके रिहायशी घर भी आ जाते थे। हो सकता हो कश्मीर के दूसरे इलाकों में ऐसा नहीं हुआ हो, लेकिन अगर इन अपवादों को जानबूझकर छुपाने के बजाए हकीकत को बयान किया गया होता तो हम शायद आज कश्मीर पर ज्यादा बेहतर स्थिति में होते।

कश्मीर के सच को नजरंदाज करने की कोशिश

दरअसल, कश्मीर के नाम पर खुद अपनी आवाम से लगातार बोले जाने वाले झूठ ने पिछले 6 दशकों में एक ढांचागत रूप अख्तियार कर लिया है, जिसे व्यवस्थागत वैधता भी हासिल है। इसीलिए इस झूठ का इस्तेमाल बहुत सारे बड़े झूठों को छुपाने और बहुत सारी झूठों को सच बनाने के लिए ढाल की तरह किया जाता है। लेकिन क्या आज जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं जिन पर खुद जनता से झूठे वादे करने का आरोप लगता हो। जिनके लाखों फैनउनके द्वारा बोले जाने वाले इतिहास के झूठे तथ्यों को भी सही मानते हों और जब तार्किक तरीके से बात करना और सोचना ही मोदी परिघटना का विलोम बनता जा रहा हो, तब क्या हम कश्मीर मुद्दे पर झूठ बोलने-सुनने की इस आदत से मुक्त होने की सोच भी सकते हैं? जाहिर है, हम नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते कश्मीर की स्थिति के सामान्य होने की उम्मीद नहीं कर पाएंगे। क्योंकि इधर से झूठ बोला जाना जारी रहेगा और उधर से पत्थरबाजी चलती रहेगी। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं। 'जनचौक' का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)










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