सरकार ले रही है खेती का ईनाम और किसानों को मिल रहा ठेंगा

त्रासदी , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


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पंकज चतुर्वेदी

मध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा के किसानों को जब टमाटर के सही दाम नहीं मिले तो उन्होंने इस बार टमाटर से ही रंगपंचमी मना ली। सनद रहे मालवा अंचल में होली पर रंग नहीं खेला जाता, रंगपंचमी पर ही अबीर-गुलाल उड़ता है। ऐसा यहां पिछले साल भी हुआ था। राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले के कुटनासीर गांव के किसान होशियार सिंह को जब लगा कि उसके खेत में उगे सौ क्रेट टमाटर का मंडी में मिलने वाला दाम मंडी तक ढो कर ले जाने का खर्च कहीं ज्यादा है तो उसने सारा माल सड़क पर ही फैंक दिया। उन्होंने पांचएकड़ में टमाटर लगाए थे।

मंडी में टमाटर की एक क्रैट यानि लगभग 25 किलो के महज 20 रुपए मिल रहे हैं जबकि, फसल को मंडी तक लाने का किराया प्रति क्रेट रु. 25, तुड़ाई रु. 10, हम्माली रु. 5 व दीगर खर्च मिलाकर कुल 48 रुपए का खर्च आ रहा था। अब दो रुपए के लिए व क्या दिनभर मंडी में दिन खपाते।

मध्य प्रदेश को लगातार पांच साल से कृषि कर्मण अवार्ड मिला है, लेकिन हकीकत में राज्य के किसानों के क्या हाल हैं? इसकी बानगी राज्य में टमाटर किसानों की हालत है। सनद रहे पिछले साल ही आलू किसानों के आंदोलन से राज्य सुलग उठा था।

मध्य प्रदेश का कृषि विभाग किसानों को टमाटर उगाने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है। विभाग ने किसानों को बताया कि एक हैक्टेयर में 600 क्विंटल से ज्यादा टमाटर पैदा होता है। इसकी लागत जहां महज 88 हजार होती है और बेचने पर चार लाख अस्सी हजार मिलते हैं। कृषि विभाग की वेबसाइट कहती है कि इस तरह किसान को तीन लाख 91 हजार की शुद्ध आय होती है। जब किसानों ने सैंकड़ों हैक्टेयर जमीन को अपने श्रम-रज से ‘लाल’ कर दिया तो उनके हाथ निराशा ही लगी। आज एक हैक्टेयर की फसल के दाम बामुश्किल साठ हजार मिल रहे हैं यानि लागत से भी 28 हजार कम।

भोपाल की करोंद मंडी राज्य की सबसे बड़ी सब्जी मंडी कही जाती है। यहां पर थोक में टमाटर की कीमत पचास या साठ पैसे किलो है और उससे कुछ दूर स्थित आवासीय कालोनियों में इसके दाम छह से दस रुपए किलो है।

यही हाल गुजरात के साबरकांठा जिले के टमाटर उत्पादक गांवों - ईडर, वडाली, हिम्मतनगर आदि का है। जब किसानों ने टमाटर बोए थे तब उसके दाम तीन सौ रुपए प्रति बीस किलो थे। लेकिन पिछले पखवाड़े जब उनकी फसल आई तो मंडी में इसके तीस रुपए देने वाले भी नहीं थे। थक-हारकर किसानों ने फसल मवेशियों को खिला दी। गुजरात में गांवों तक अच्छी सड़क है, मंडी में भी पारदर्शिता है लेकिन किसान को उसकी लागत का दाम भी नहीं। जिन इलाकों में टमाटर का यह हाल हुआ, वे भीषण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं, सो फसल सड़े इससे बेहतर उसको मुफ्त में ही लोगों के बीच डाल दिया गया।

इस समय दिल्ली एनसीआर में टमाटर के दाम 20 रुपए किलो से कम नहीं है। यदि ये दाम और बढ़े तो सारा मीडिया व प्रशासन इसकी चिंता करने लगेगा, लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।

टमाटर के किसानों के बर्बाद होने का बड़ा कारण पाकिस्तान, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित कई स्थानों पर टमाटर का निर्यात नहीं हो पाना भी है। अभी एक साल पहले तक अकेले पाकिस्तान को हर रोज पांच सौ ट्रक टमाटर जाते थे। इस बार पाकिस्तान में किसानों ने अपनी फसल के कम दाम मिलने पर अपनी सरकार पर दवाब बनाया और पाकिस्तान ने भारत से टमाटर आयात रोक दिया। दूसरी तरफ कनार्टक व महाराष्ट्र में भी किसानों ने टमाटर पैदा करना शुरू कर दिया, सो वहां के बाजार में भी मप्र के टमाटर की मांग नहीं रही। यही नहीं इन राज्यों में टमाटर की कैचप बनाने के कई कारखाने भी हैं। विडंबना है कि मध्य प्रदेश या गुजरात के टमाटर उत्पादक इलाके में कभी इस तरह की यूनिट लगाने की सोची नहीं गई।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े,मवेशियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आश्चर्य इस बात का होता है कि जब हताश किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चैपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनाएं हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है।

जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तब शुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा कर देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरीद केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है।

अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृषि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचैलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुष्परिणाम दाल, तिलहनों और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरुरत है कि खेतों में कौन सी फसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो,साथ ही ग्रामीण अंचल में किसानों की सहकारी संस्थाओं द्वारा संचालित प्रसंस्करण के कारखाने लगें।

          (पंकज चतुर्वेदी पानी-पर्यावरण,खेती-किसानी पर लगातार लिखने वाले पत्रकार हैं।)

 










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