जिग्नेश और चंद्रशेखर से आखिर किस बात का है मायावती को डर!

राजनीति , अहमदाबाद, शुक्रवार , 26-01-2018


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कलीम सिद्दीकी

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्मंत्री और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया कुमारी मायावती को दलित वोट बैंक के साथ-साथ भीम सेना के नेता चन्द्रशेखर रावण और गुजरात के नवनिर्वाचित निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी की बढ़ती हैसियत को लेकर भी चिंता है। वर्तमान में मायावती के कुछ बयान आये हैं जिसमें उन्होंने कांग्रेस की आड़ में इन दोनों युवा नेताओं को अपने निशाने पर लिया है। मायावती ने अपने जन्मदिन के मौके पर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि “ जिग्नेश के पीछे कांग्रेस का हाथ है और कांग्रेस उसके जरिये फायदा उठाना चाहती है। गुजरात में युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी के चुनाव जीतने के पीछे कांग्रेस का हाथ है। 

यह चुनाव उसने केवल दलितों के वोटों से नहीं जीता है बल्कि कांग्रेस पार्टी और हार्दिक पटेल के समर्थन से जीता है।” मायावती ने एक और तर्क दिया कि अन्य राज्यों की तरह गुजरात में दलितों की संख्या 18 से 20 प्रतिशत नहीं है गुजरात में दलित केवल 7 प्रतिशत के आस-पास हैं। कांग्रेस जान-बूझ कर सोची समझी रणनीति के तहत मेवानी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा। मायावती ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी ज़रूर मेवानी के नाम पर राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक लाभ उठाने की फ़िराक में है। 

मायावती के इस बयान से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उन्हें गुजरात की राजनीति तथा जिग्नेश मेवानी पर जानकारी कम है। वडगाम सीट पर सबसे अधिक 73000 मुस्लिम वोटर हैं। दलित वोटों की संख्या 39 – 42000 है। ठाकोर समाज के 34000 वोटर हैं। जिग्नेश और बीजेपी के बीच वोटों का अंतर 10 प्रतिशत का है। जिसे सामान्य जीत नहीं कही जा सकती है। मायावती के बयान पर राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के सुबोध परमार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “ बहन मायावती हमारे लिए सम्माननीय हैं हम लोग उनसे बहुत कुछ सीखना चाहते हैं। जिग्नेश मेवानी को मात्र कांग्रेस ने ही नहीं बल्कि बीजेपी विरोधी अन्य कई दलों ने भी समर्थन दिया था। बहुजन मुक्ति मोर्चा ने भी हमारे समर्थन में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था।

बहुजन समाज पार्टी ने जिग्नेश मेवानी के विरुद्ध उम्मीदवार खड़ा किया था लेकिन बहुजन समाज पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता जिग्नेश भाई के साथ आ गए थे”। जिग्नेश की चुनाव से पहले अपनी एक पहचान बन चुकी थी जिसके कारण कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, बहुजन मुक्ति मोर्चा सहित कई सामाजिक संगठनों ने समर्थन दिया था। जिग्नेश मेवानी ने दलित समाज की उपजातियों को एक कर सभी वर्गों का वोट हासिल किया। जिसमें मुख्यतः मुस्लिम, दलित और ठाकोर समाज का वोट अधिक था। सुबोध ने हार्दिक की भूमिका पर कहा कि “वडगाम सीट पर पाटीदार वोट मात्र 4000 से 5000 हैं। जिसके चलते हार्दिक पटेल की कोई खास भूमिका बनती ही नहीं।” हालांकि जिग्नेश और हार्दिक के अच्छे संबंध हैं। 

लखनऊ स्थित रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज़ आलम ने जनचौक से बातचीत में मायावती द्वारा जिग्नेश, चन्द्रशेखर और कांग्रेस पर निशाना साधने और मोदी-अमित शाह पर नरम रुख रखने के प्रश्न पर कहा कि “मायावती बीजेपी के हाथों में खेल रही हैं क्योंकि वह नहीं चाहती हैं कि उनका भी हाल लालू प्रसाद जैसा हो। सीबीआई और ईडी मायावती के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति तथा भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर रही है। हमेशा आरोप लगता आया है कि केंद सरकारें इन एजेंसियों का दुरुपयोग करती आई हैं। जिसके कारण मोदी अमित पर चुप रहने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है”।

इसके अलावा उन्होंने एक ऐसी बात कही जो किसी को भी चौंका सकती है। उन्होंने कहा कि “ऐसी भी संभावना है कि 2019 लोकसभा चुनाव में मायावती बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ें। मायावती केवल पहचान की राजनीति करती आई हैं। उभरते क्रांतिकारी नेताओं के कारण उन्हें अपनी ज़मीन खिसकती दिख रही है”। 

पूर्व आईपीएस एवं अम्बेडकरवादी दलित चिंतक एसआर दारापुरी ने जनचौक संवाददाता को बताया कि कांग्रेस पार्टी एक राजनैतिक दल है बिना अपना हित साधे कोई भी दल किसी को समर्थन नहीं देगा। हो सकता है जिग्नेश के खिलाफ उम्मीदवार न उतारना भी कांग्रेस के चुनावी रणनीति का हिस्सा रहा हो। जिग्नेश के बहुत से शुभ चिंतक उसे निर्दलीय चुनाव लड़ने की राय दे रहे थे। ताकि कांग्रेस की सत्ता आने पर जिग्नेश दलितों और अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाने के लिए स्वतंत्र रहे। और विरोध का विकल्प खुला रहे। दारापुरी ने आगे बताया कि मायावती का जिग्नेश से भयभीत होना स्वाभाविक है। क्योंकि जिग्नेश दलित उत्पीड़न, ज़मीन, बेरोज़गारी, शिक्षा के मुद्दों पर राजनीति कर रहा है। जबकि मायावती की राजनीति जाति और उपजातियों की है। मायावती ने दलित समाज को भी उपजातियों में बांटा है। जबकि वडगाम में जिग्नेश ने दलित समाज की उपजातियों को एकत्र किया है। बहुजन समाज पार्टी की राजनीति सीमित हो गई है। 

उत्तर प्रदेश में मायावती ने ही बीजेपी को ऊर्जा देकर बड़ा किया है तीन बार बीजेपी के साथ मिलकर मायावती सरकार बना चुकी हैं। 2002 के गुजरात चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए प्रचार किया था। 2017 गुजरात विधानसभा चुनाव में भी मायावती ने बीजेपी के दबाव में कांग्रेस के वोटों का बंटवारा करने का काम किया। मायावती और उनके परिवार के लोग भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे हुए हैं। जिसके चलते मायावती खुलकर बीजेपी का विरोध नहीं कर सकती हैं। मायावती ने चन्द्रशेखर को पहले बीजेपी का पाला पोषा हुआ बताया। अब उसे कांग्रेस का एजेंट बता रही हैं। दरअसल मायावती को उभरती नई दलित लीडरशिप से डर लग रहा है। दारापुरी के अनुसार मायावती भ्रष्टाचार के कारण बीजेपी के चंगुल में फंसी हुई हैं और 2019 में उनका बीजेपी के साथ अघोषित गठबंधन हो सकता है। 

उत्तर प्रदेश के कुछ राजनैतिक पंडित मानते हैं कि संभवतः मायावती समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर अपनी खोई ज़मीन पाने की कोशिश करेंगी। लेकिन अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य नफीसुल हसन का कहना है कि मायावती जिस प्रकार की राजनीति करती आई हैं। उससे सबसे अधिक नुकसान दलित समाज की उसी उपजाति को हुआ है जिस उपजाति से मायावती आती हैं। उत्तर प्रदेश की पासी, खटिक, सोनकर इत्यादि जातियां आगे निकल गई हैं। जबकि मायावती कई बार सत्ता में आने के बावजूद अपने जाटव समाज के लिए भी कुछ ख़ास नहीं कर पाईं। नफीसुल हसन के अनुसार बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच किसी तरह की गठबंधन की संभावना नहीं दिखती है। हसन ने बताया कि जिग्नेश की उभरती लीडरशिप से दलित मुस्लिम एक साथ आता दिख रहा है यदि यह पूरे देश में हुआ तो बड़े राजनैतिक बदलाव की संभावना बनती है। 

बहुजन समाज पार्टी के गुजरात प्रभारी छत्तू राम ने जनचौक को बताया कि वडगाम सीट पर जिग्नेश मेवानी का चुनाव लड़ना पहले से तय नहीं था और जिग्नेश ने मुझे खुद कहा था कि वह किसी भी दल से चुनाव नहीं लड़ेगा। बहुजन समाज का प्रत्याशी पहले से तय था जिस कारण उसे चुनाव लड़ना ही था। जिग्नेश ने अंतिम क्षणों में कांग्रेस का समर्थन मिलने के बाद चुनाव में जाने का निर्णय लिया। रही बात ऊना आन्दोलन की तो बहनजी संसद से लेकर सड़क तक दलित समाज के अधिकारों को लेकर लड़ी हैं। जिस कारण समाज जागरूक हुआ। चुनाव से पहले भी हम लोगों ने पूरे राज्य में सम्मलेन, सभाएं तथा नुक्कड़ सभा कर समाज को जागरूक कर बीजेपी के विरुद्ध वातावरण खड़ा किया। परन्तु कांग्रेस ने बीजेपी से नाराज़ दलित मुस्लिम मतदाताओं को गुमराह कर वोट ले लिया। हमारी मेहनत का लाभ भी कांग्रेस को ही हुआ। 

जिग्नेश मेवानी एलान कर चुके हैं वह जल्द क्षेत्रीय दलों के नताओं से मिलेंगे। ताकि 2019 में दलित विरोधी बीजेपी सरकार को रोकने के लिए सभी लोग एक साथ आ सकें। इसी मिशन के तहत जिग्नेश की मुलाक़ात मायावती से भी होने की संभावना है। राजनैतिक दलों के बयानों से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले किसी को भी इस मुलाक़ात की प्रतीक्षा करनी चाहिए। 

  

 










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KK singh :: - 01-27-2018
क्यों कि दलितवाद कर रहे हैं ये सब. दलितों के साथ साथ, महिलाओं, आदिवासियों, अल्प संख्यकों, किसानों की मुक्ति केवल सर्वहारा क्रांति से ही संभव है!