गुरिल्ला योद्धा ओमर मुख्तार से थरथर कांपती थी मुसोलिनी की सेना

विरासत , , सोमवार , 25-12-2017


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उदय राम

साम्राज्यवाद जिस समय भारत में 23 मार्च 1931 को 3 बहादुर योद्धाओं को फांसी चढ़ा रहा था। उसी साल 16 सितम्बर 1931 को साम्राज्यवादी ताकतें लीबिया में वहां के 73 साल के महान योद्धा उमर मुख्तार को फांसी चढ़ा रही थीं। ये उन सभी योद्धाओं को साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए मानवता की रक्षा करने का इनाम था। हमको और आपको आज 73 साल के उस महान योद्धा के बारे में जानना जरूरी है। जिसने नाजीवाद के खिलाफ 20 साल सशस्त्र संघर्ष किया। एक गुरिल्ला वार किया। और फिर पूरी बहादुरी के साथ अपनी जनता के लिए लड़ते हुए शहीद हुआ। साम्राज्यवादी ताकतें जिनके पास आधुनिक हथियार, टैंक, तोप, प्रशिक्षित सेना थी

लेकिन उनसे लड़ने वाली जनता बिल्कुल निहत्थी थी। लेकिन इतिहास गवाह है इतना सब हरबा-हथियार होने के बावजूद साम्राज्यवाद को पूरे विश्व में निहत्थी जनता से लड़ाई में मुंह की खानी पड़ी। पूरे विश्व में साम्राज्यवाद ने छल और कपट से लड़ाइयों को जीता है। अब हम उमर मुख्तार पर आते हैं। 

ओमर मुख्तार

जब यूरोप के साम्राज्यवादी मुल्कों ने एशियाई और अफ्रीकी के देशों को गुलाम बनाने के लिए अपनी आधुनिक सेनायें वहां भेजी तो उनकी इस लूट के खिलाफ  साधारण से दिखने वाले आम इंसान, योद्धा के रूप में सामने आए। जिन्होंने अपने लोगों के सामने मजबूती से लड़ने की मिशाल पेश की, अन्याय के खिलाफ उनको एकजुट किया। और फिर साम्राज्यवादियों के सामने ऐसी चुनौती पेश कि उन्हें उनके सामने घुटने टेकने पड़े। इन्हीं योद्धाओं में एक महान योद्धा थे लीबिया के मुख़्तार - ओमर मुख़्तार 

ओमर मुख़्तार का जन्म 1859 ईसवी में हुआ और वे एक स्कूल के अध्यापक थे 1895 ईसवी में वे सूडान चले गये उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध मेहदी सूडानी के आंदोलन में भाग लिया परंतु इस आंदोलन की विफलता के पश्चात वे पुन: लीबिया लौट आए।

1911 में इटली ने उस्मानी शासन से युद्ध करके लीबिया को अपने नियंत्रण में ले लिया। उमर मुख्तार ने लीबियाई कबीलों के योद्धाओं की सहायता से इटली के साम्राज्यवादियों के विरुद्ध सशस्त्र आंदोलन आरंभ किया और उन्हें भारी क्षति पहुँचाई। इंक़लाबी ओमर मुख़तार को 16 सितम्बर 1931 को 20 साल के जद्दोजहद के बाद इटली की फ़ौज फांसी पर चढ़ा देती है। 

एक वाक़या

ओमर मुख्तार के साथियों ने इटली के 2 सिपाहियों को पकड़ा और वो उनका क़त्ल करने की कोशिश करने लगे तभी ओमर मुख्तार ने उन्हें रोकत हुए कहा :- हम बंदियों को नहीं मारते ..!

इस पर गुरिल्ला लड़ाकों ने कहा - वो तो बंदियों को मारते हैं।

इसके बाद ओमर मुख्तार ने जो जवाब दिया वो काबिले तारीफ है।

ओमर मुख्तार ने कहा - वो जानवर हैं लेकिन हम नहीं 

ये वाक्य क्रांतिकारियों की दिशा बताता है कि हम जानवर नहीं जो खून बहाते फिरें। हम क्रांतिकारी हैं हम खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। हमने हथियार आत्मरक्षा में उठाया है। क्योंकि दुश्मन भी हथियार से लैस है और बहसी जानवर बना हुआ है। ये पूरे विश्व के क्रांतिकारियों की दिशा है। 

सन 1929 में इटली जब लीबिया पर अपना कब्ज़ा करने की लगातार कोशिश कर रहा था तब लीबिया के बागियों का सरदार ओमर मुख़्तार इटली की सेना को नाकों चने चबवा रहा था। मुसोलिनी को एक ही साल में चार जनरल बदलने पड़े। अंत में हार मान कर मुसोलिनी को अपने सबसे क्रूर सिपाही जनरल ग्राज़ानी को लीबिया भेजना पड़ा। ओमर मुख़्तार और उनके सिपाहियों ने जनरल ग्राज़ानी को भी बेहद परेशान कर दिया। जनरल ग्राज़ानी की तोपों और आधुनिक हथियारों से लैस सेना को घोड़े पर सवार उमर मुख़्तार व उनके साथी खदेड़ देते। वे दिन में लीबिया के शहरों पर कब्ज़ा करते और रात होते-होते ओमर मुख्तार उन शहरों को आज़ाद करवा देता। ओमर मुख़्तार इटली की सेना पर लगातार हावी पड़ रहा था और नए जनरल की गले की हड्डी बन चुका था। अंततः जनरल ग्राज़ानी ने एक चाल चली। उसने अपने एक सिपाही को उमर मुख्तार से लीबिया में अमन कायम करने और समझौता करने के लिए बात करने को भेजा। उमर मुख्तार और जनरल की तरफ से भेजे गए सिपाही की बात होती है। उमर अपनी मांगें सिपाही के सामने रखते हैं। सिपाही चुपचाप उन्हें अपनी डायरी में नोट करता जाता है। सारी मांगें नोट करने के बाद सिपाही उमर मुख्तार को बताता है कि ये सारी मांगें इटली भेजी जाएंगी और मुसोलिनी के सामने पेश की जाएंगी। इटली से जवाब वापस आते ही आपको सूचित कर दिया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा जिसके चलते ओमर मुख़्तार को इंतज़ार करने को कहा गया। ओमर मुख्तार इंतज़ार करते हैं। इटली की सेना पर वे अपने सारे हमले रोक देते हैं। मगर इटली से जवाब आने की बजाय आते हैं 

खतरनाक हथियार, बम और टैंक। जिससे शहर के शहर तबाह कर दिए जा सकें। समय समझौते के लिए नहीं हथियार मंगाने के लिए मांगा गया था। कपटी ग्राज़ानी अपनी चाल में सफल होता है। नए हथियारों से लीबिया के कई शहर पूरी तरह से तबाह कर दिए जाते हैं। 

नाजी कर्नल एक जगह कहता है कि आज ओमर मुख्तार को मार गिराएंगे। पहले पुल कब्जे में लेंगे। टैंक, मशीनगन से हमला करेंगे। दूसरा अफसर कहता है कि मैं हैरान हूं कि बागियों ने पुल क्यों नही उड़ाया। कर्नल बोलता है कि ओमर मुख्तार सिर्फ लड़ना जानता है दिमाग चलाना नहीं जानता है। वो आप लोगों की तरह कोई मिलिट्री स्कूल में नहीं गया था। सभी हंसते हैं। 

यही सेना की बेवकूफी उन सब को मौत के मुंह में धकेल देती है क्योंकि ओमर का जो गुरिल्ला वार का अनुभव था वो बड़ी से बड़ी सेना को भी घुटने पर ले आ देता था। 

मैदान-ए-जंग मे ओमर मुख़्तार दो साल तक टिके रहे औऱ इटली की फ़ौज के साथ हुए एक झड़प में घायल हुए ओमर मुख़्तार को 11 सितम्बर 1931 को जनरल ग्राज़ानी की फ़ौज ने गिरफ़्तार कर लिया, 15 सितम्बर 1931 को हाथों, पैरों, और गले में हथकड़ी जकड़ कर ओमर मुख़्तार को जनरल ग्राज़ानी के सामने पेश किया गया। 73 साल के इस महान बुजर्ग योद्धा से जनरल ग्राज़ानी ने कहा "तुम अपने लोगों को हथियार डालने को कहो"। ठीक पीर अली ख़ान की तरह इसका जवाब ओमर मुख़्तार ने बड़ी बहादुरी से दिया और कहा "हम हथियार नही डालेंगे, हम जीतेंगे या मरेंगे और ये जंग जारी रहेगी। तुम्हें हमारी अगली पीढ़ी से लड़ना होगा औऱ उसके बाद की अगली से...

मुख्तार को जंजीरों में जकड़ कर ले जाते हुए।

और जहां तक मेरा सवाल है मैं अपने फांसी लगाने वाले से ज़्यादा जीऊंगा।

और उमर मुख़्तार की गिरफ़्तारी से जंग नहीं रुकने वाली ... जनरल ग्राज़ानी ने फिर पूछा "तुम मुझसे अपने जान की भीख क्यों नही मांगते? शायद मै यूं दे दूं... 

ओमर मुख़्तार ने कहा "मैंने तुमसे ज़िन्दगी की कोई भीख ऩही मांगी। दुनिया वालों से ये न कह देना कि तुमसे इस कमरे की तनहाई में मैंने ज़िन्दगी की भीख मांगी।" इसके बाद ओमर मुख़्तार उठे और ख़ामोशी के साथ कमरे से बाहर निकल गए। इसके बाद 16 सितम्बर सन 1931 को इटली के साम्राज्यवाद के विरुद्ध लीबियाई राष्ट्र के संघर्ष के नेता ओमर मुख़्तार को उनके ही लोगों के सामने फांसी दे दी गयी। जिस निडरता से ओमर मुख्तार फांसी के फंदे की तरफ बढ़ते हैं। ये सिर्फ एक मजबूत वैचारिकता से लैस कोई महान योद्धा ही कर सकता है। ओमर की फांसी के बाद लीबिया के आम जनमानस में जो रोष और आंखों में पानी था वैसा ही ठीक हाल नाजी सेना के बहुत से सैनिकों और अफसरों का भी था। 

नाजी सेना को लगा था कि ओमर मुखतार को मारने से युद्ध रुक जाएगा। लेकिन ओमर तो पहले ही कहा था कि ये युद्ध हमारी आजादी तक चलेगा, मेरे मरने से ये युद्ध बन्द होने वाला नहीं है मेरे बाद मेरी आने वाली पीढ़ियां ये लड़ाई लड़ेंगी उसके बाद उससे अगली पीढ़ी लड़ेगी। 

आज पूरे विश्व में यही तो लड़ाई चल रही है। ओमर मुख्तार के बाद की दूसरी-तीसरी पीढ़ियां लीबिया, सीरिया, फिलस्तीन से लेकर पूरे विश्व में साम्राज्यवाद की लूट के खिलाफ मजबूती से लड़ रही हैं। 

भारत में भी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने का अपना लम्बा इतिहास रहा है। उसी इतिहास को आगे बढ़ाते हुए भारत में भी तेभागा, तेलंगाना, नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ गुरिल्ला वार मजबूती से जड़े जमाये है। जिसका साम्राज्यवाद और उसकी पिट्ठू लुटेरी सत्ता के खिलाफ लड़ने का एक शानदार इतिहास है। भारत में भी कितने ही महान योद्धाओं ने जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए अपनी शहादतें दी हैं।  भारत में भी कितने ही क्रांतिकारी योद्धाओं को धोखे से बातचीत के लिए बुलाकर सत्ता ने निर्ममता से उनका कत्ल किया है। ये युद्ध जारी है और रहेगा तब तक जब तक इंसान का इंसान शोषण बन्द नही करता। 

(उदय राम सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। और जनता से जुड़े तमाम सवालों पर लिखते रहते हैं।)







  










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