आख़िर क्या है बर्मा संकट? कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान?

देश-दुनिया , , मंगलवार , 05-09-2017


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जनचौक स्टाफ

शांति के लिए प्रसिद्ध बौद्ध धर्म बाहुल्य देश बर्मा यानी म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान संकट में हैं। म्यांमार के सैनिकों और बौद्ध नागरिकों पर हत्या, बलात्कार समेत तमाम मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर आरोप है। रोहिंग्या मुसलमानों के क़त्ल और अत्याचार की जिस तरह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं उससे पूरी दुनिया विचलित है।   

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी है। रोहिंग्या के लिए दुआ करते लोग। फोटो साभार : गूगल

पीढ़ियों से रह रहे हैं रोहिंग्या

एक अनुमान के मुताबिक़ म्यांमार में करीब 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये मुख्य रूप से बांग्लादेशी प्रवासी हैं, जो अवैध तौर पर म्यांमार में रहे हैं। म्यांमार की सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इंकार कर दिया है। हालांकि ये भी एक सच है कि ये मुसलमान म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं।

इंटरनेट व अन्य स्रोतों से उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज से करीब 700 वर्ष पूर्व 1400 ईसवी के आसपास ये लोग ऐसे पहले मुस्लिम हैं जो बर्मा के अराकान (इसे रखाइन के नाम से भी जाना जाता है) प्रांत में आकर बस गए थे। अराकान म्यांमार की पश्चिमी सीमा पर है और यह आज के बांग्लादेश (जो पूर्व में पाकिस्तान और उससे भी पहले बंगाल का एक हिस्सा था) की सीमा के पास है।

इनमें से बहुत से लोग 1430 ईसवी में अराकान पर शासन करने वाले राजा नारामीखला (बर्मा में मिन सा मुन) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में प्रश्रय दिया था। कुछ समय के बाद अराकान के राजाओं ने खुद को मुस्लिम शासकों की तरह समझना शुरू किया।   

वर्ष 1785 में बर्मा के बौद्ध लोगों ने अराकान पर कब्जा कर लिया। तब उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों को या तो इलाके से बाहर खदेड़ दिया या फिर उनकी हत्या कर दी। इस अवधि में अराकान के करीब 35 हजार लोग बंगाल भाग गए जो कि तब अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में था। वर्ष 1824 से लेकर 1826 तक चले एंग्लो-बर्मीज युद्ध के बाद 1826 में अराकान अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। तब अंग्रेजों ने रोहिंग्या मूल के मुस्लिमों और बंगालियों को प्रोत्साहित किया कि वे अराकान (राखिन) में जाकर बस जाएं। ब्रिटिश भारत से बड़ी संख्या में गए इन प्रवासियों को लेकर स्थानीय बौद्ध राखिन लोगों में विद्वेष की भावना पनपी और तभी से जातीय तनाव पनपा जो अभी तक चल रहा है।

साभार : गूगल

दूसरे द्वितीव विश्व युद्ध के दौरान दक्षिण पूर्व एशिया में जापान के बढ़ते दबदबे से आतंकित अंग्रेजों ने अराकान छोड़ दिया और उनके हटते ही मुस्लिमों और बौद्ध आपस में एक दूसरे का कत्लेआम करने लगे। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्त‍ि और 1962 में जनरल नेविन के नेतृत्व में तख्तापलट की कार्रवाई के दौर में रोहिंग्या मुस्लिमों ने अराकान में एक अलग रोहिंग्या देश बनाने की मांग रखी। लेकिन तत्कालीन बर्मा सेना के शासन ने यांगून (पूर्व का रंगून) पर कब्जा करते ही अलगाववादी और गैर राजनीतिक दोनों ही प्रकार के रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की। सैनिक शासन ने रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार कर दिया और इन्हें बिना देश वाला (स्टेट लैस) बंगाली घोषित कर दिया। तब से स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

नागरिक अधिकार छीने

बर्मा के सैनिक शासकों ने 1982 के नागरिकता कानून के आधार पर उनसे नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए हैं। ये लोग सुन्नी इस्लाम को मानते हैं और बर्मा में इन पर सरकारी प्रतिबंधों के कारण ये पढ़-लिख भी नहीं पाते और केवल बुनियादी इस्लाम की तालीम हासिल कर पाते हैं। 

साभार : गूगल

लगातार नस्लीय हिंसा

इस समय कहा जा सकता है कि दुनिया में रोहिंग्या मुसलमान ऐसा अल्पसंख्यक समुदाय है जिस पर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हो रहा है। रखाइन स्टेट में 2012 से नस्लीय हिंसा जारी है। इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं।

हालिया नस्लीय हिंसा की शुरुआत अक्टूबर 2016 में तब हुई थी बॉर्डर पोस्ट पर तैनात 9 पुलिसवालों को हमलों में मार दिया गया था। इसके बाद इसी साल 25 अगस्त को एक साथ कई थानों पर हमला हुआ।

पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बाद पिछले महीने रखाइन स्टेट में सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया था। सरकार के कुछ अधिकारियों का दावा है कि ये हमला रोहिंग्या समुदाय के लोगों ने किया था। बताया जा रहा है कि इन दोनों हमलों की ज़िम्मेदारी अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना (ARSA) नाम के संगठन ने ली है। संगठन का कहना है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।

इसके बाद सुरक्षाबलों ने मौंगडोव ज़िले की सीमा को पूरी तरह से बंद कर दिया और एक व्यापक ऑपरेशन शुरू किया।

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी है। जिसके बाद बड़ी संख्या में रोहिंग्या पलायन कर रहे हैं। फोटो साभार : गूगल

हत्या, बलात्कार, प्रताड़ना

रोहिंग्या कार्यकर्ताओं का कहना है कि 100 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। म्यामांर के सैनिकों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के संगीन आरोप लग रहे हैं। सैनिकों पर प्रताड़ना, बलात्कार और हत्या के आरोप लग रहे हैं। हालांकि सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। कहा जा रहा है कि सैनिक रोहिंग्या मुसलमानों पर हमले में हेलिकॉप्टर का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। आरोप है कि म्यांमार के बौद्ध नागरिक भी मुसलमानों पर हमला कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र ओर से जारी अनुमान के मुताबिक़ कुछ हफ़्तों पहले म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में जारी हिंसा के बीच अब तक क़रीब 60 हजार शरणार्थी बांग्लादेश की सीमा पार कर चुके हैं।

अपना सबकुछ छोड़कर बांग्लादेश भाग रहे शरणार्थियों का कहना है कि म्यांमार के सुरक्षाबल और बौद्धों की भीड़ उनके गांव जला रही है।

म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था।

साभार : गूगल

सू की से सवाल

आपको मालूम है कि म्यांमार में 25 साल बाद पिछले साल 2016 में चुनाव हुआ था। इस चुनाव में नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फोर डेमोक्रेसी को भारी जीत मिली थी। हालांकि संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं। सू की स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। हालांकि कहा जाता है कि वास्तविक कमान सू की के हाथों में ही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सू की निशाने पर हैं. कहा जा रहा है कि मानवाधिकारों की चैंपियन होने के बावजूद वे खामोश हैं। सरकार से सवाल पूछा जा रहा है कि आख़िर रखाइन में पत्रकारों को क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है। राष्ट्रपति के प्रवक्ता ज़ाव हती ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी ग़लत रिपोर्टिंग हो रही है।

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी है। जिसके बाद बड़ी संख्या में रोहिंग्या पलायन कर रहे हैं। फोटो साभार : गूगल

नाफ़ नदी किनारे हज़ारों फंसे

बताया जा रहा है कि नस्लीय हिंसा की वजह से रोहिंग्या मुसलमानों के अलावा हिंदू और कुछ जगहों से बौद्ध भी पलायन कर रहे हैं।

अंदाजा लगाया जा रहा है कि क़रीब 20,000 रोहिंग्या नाफ़ नदी के किनारे फंसे हैं जहां से बांग्लादेश की सीमा शुरू होती है। मदद करने वाली एजेंसियों का कहना है कि उन लोगों के डूबने, बीमारी से गस्त होने और ज़हरीले सांपों के काटने तक का ख़तरा है।

हाल ही में एक मानवाधिकार समूह ने म्यांमार की सैटेलाइट तस्वीर में एक रोहिंग्या गांव के 700 से ज़्यादा घरों को जलाए जाने की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थी।

संयुक्त राष्ट्र अब इस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रहा है। हालांकि म्यांमार की सेना ने किसी भी तरह की ज़्यादती से इनकार किया है।

बांग्लादेश भी नहीं स्वीकार कर रहा

उधर बांग्लादेश रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा है। रोहिंग्या और शरण चाहने वाले लोग 1970 के दशक से ही म्यांमार से बांग्लादेश आ रहे हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ्ते म्यांमार के राजदूत से इस मामले पर गहरी चिंता जताई है। बांग्लादेश ने कहा कि सीमा पर अनुशासन का पालन होना चाहिए। बांग्लादेश अथॉरिटी की तरफ से सीमा पार करने वालों को फिर से म्यांमार वापस भेजा जा रहा है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसकी कड़ी निंदा की है और कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है।

 










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Md Aamir Lion :: - 09-14-2017
Kindly save the Burma People... Allahakbar...

md wazir :: - 09-14-2017
allahakbar

samsher khan :: - 09-11-2017
Brama ke logon ko insaff milna chahiye bharat sarkar kyu nahi saport kr rahi h

Junaid :: - 09-08-2017
Big. Kriem

Junaid :: - 09-08-2017
Big. Kriem