नीलाभ मतलब सरोकारी पत्रकारिता की अविरल मुस्कान

श्रद्धांजलि , नई दिल्ली, शनिवार , 24-02-2018


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राम शिरोमणि शुक्ल

नीलाभ मिश्र को याद करने का मतलब पत्रकारिता को याद करना है। मित्र, सहकर्मी अथवा करीब से जानने वालों के अलावा, किसी पत्रकार के बारे में उसके पाठकों और उसके सरोकारों के माध्यम से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। एक ऐसे दौर में पत्रकार और पत्रकारिता के बारे में एक खास तरह का निराशा का भाव बढ़ रहा हो, जब अधिकांश पत्रकार सरकार की गोद में जा बैठे हों और उनका भोंपू बनकर आम जन की आवाज को दबाने और झूठ फैलाने में लगे हों, कुछ ही बचे पत्रकारों में से एक नीलाभ थे जिनकी पत्रकारिता खुद को जनसरोकारों के साथ जोड़े रख रही थी।

शायद इसीलिए नीलाभ के मित्रों, सहकर्मियों और करीबियों से कहीं ज्यादा उनको दुख पहुंचा है, जिन्हें नीलाभ के होने भर से एक उम्मीद की किरण नजर आती रही है। मेरे जैसे अनगिनत लोग होंगे जिन्हें यह विश्वास रहा होगा कि नीलाभ हैं तो वे बातें भी होंगी जो आज के समय बहुत ज्यादा जरूरी हैं। नीलाभ की अपनी यह खासियत थी कि वह कभी प्रचार के भूखे नहीं रहे और न ही किसी तरह का स्टारडम उन्हें भाया। बहुत बड़े पत्रकार-संपादक होने के बावजूद अत्यंत सरल स्वभाव वाले नीलाभ की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनसे कभी भी आसानी से मिला जा सकता था, किसी भी विषय पर बात की जा सकती थी और कुछ सीखा जा सकता था। 

हिंदी के बड़े पत्रकारों-संपादकों को लेकर यह शिकायतें आम हुआ करती हैं कि उन तक पहुंच बहुत आसान नहीं होती, किसी सामान्य जन के लिए बातचीत अथवा विमर्श की गुंजाइश भी बहुत सीमित रहती है। नीलाभ इस मामले में सर्वथा भिन्न शायद इसीलिए रहे कि वह खुद को हमेशा आम जन के साथ जुड़े रहने और उनके साथ खड़े होने के पक्षधर थे।  

नीलाभ के साथ गिनती की एक-दो मुलाकातें रहीं, वह भी मित्रों के साथ। लेकिन कभी नहीं लगा कि मैं किसी अपरिचित से मिल या बात कर रहा हूं। यह उनकी ऐसी विशेषता थी जो कुछ बिलों में ही होती है। मैंने कभी नीलाभ के साथ काम नहीं किया। लेकिन जब भी मौका लगा नीलाभ को सुना। सुनने-समझने की कोशिश की। टीवी पर बहसों के दौरान उनके विचारों को। उनके मित्रों से जो शुरू के दिनों से लंबे समय उनके किसी न किसी रूप में साथ रहे। उनके सहकर्मियों से जिन्होंने साथ काम किया, बहुत कुछ सीखा और खुद को धन्य माना। आज अगर नीलाभ के दुखद निधन पर दुखी हुआ तो इन सभी जानकारियों की वजह से ही। तब भी जब पहली बार यह पता चला कि वह गंभीर रूप से बीमार हैं और चेन्नई में उनका इलाज चल रहा है। तब उनके शुभेच्छुओं की ओर से एक अपील भी सोशल मीडिया में आई थी जिसमें मदद की गुहार की गई थी।

तब सबसे पहला सवाल दिमाग में यह आया था कि विश्व गुरु बनने और न्यू इंडिया बनाने के खोखले दावे करने वाली एक ऐसी व्यवस्था में जिसे अपने लोगों और उनके स्वास्थ्य की चिंता नहीं है, हम कैसा समाज निर्मित करना चाहते हैं। अभी दो दिन पहले ही कुछ पत्रकार मित्रों के बीच नीलाभ के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं जताई जा रही थीं। हम सब को तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद यह विश्वास था कि जिस तरह नीलाभ खुद के और दुनिया के संतापों को हमेशा मुस्कुराते हुए किनारे लगा दिया करते थे, इस बीमारी को भी चेन्नई में परास्त कर हम सबके बीच आ जाएंगे। 

नीलाभ के घनिष्ठ मित्रों में एक वरिष्ठ पत्रकार मिथिलेश कुमार सिंह कहते हैं, जबसे निधन की खबर सुनी है, मन बहुत दुखी है। कुछ करने का मन नहीं कर रहा है। हमने लंबे समय तक केवल एक साथ काम ही नहीं किया है। हमने काम के दौरान और काम के बाद भी सरोकारों और सरोकारी पत्रकारिता को लेकर लंबी जद्दोजेहद की है। नीलाभ को लेकर इतने संस्मरण हैं कि कहे नहीं जा सकते। बतौर पत्रकार और बतौर व्यक्ति नीलाभ के होने का मतलब था। वह मतलब अब और ज्यादा बढ़ गया है। मिथिलेश कहते हैं, मैंने अपना एक यारबाश खोया।

अब यह आवाज नहीं सुनाई देगी, का रे, अइबे ना? पटना में वह लंबे समय तक मेरा ग्लासफेलो रहा। ग्लासफेलो माने ड्यूटी खत्म हुई नहीं कि भाग मंगोलिया। यह नवभारत टाइम्स के दिन थे और आवारों की फौज थी। दुनिया बदलने को बेचैन आवारों की फौज जिसका दायरा रोज ब रोज बढ़ता जा रहा था। वह मंगोलिया अब है कि नहीं, नहीं मालूम लेकिन तुम नहीं हो- इसे मैं पचा नहीं पा रहा हूं। मिथिलेश बताते हैं कि उन्होंने भले ही बहुत ज्यादा नहीं लिखा लेकिन जो लिखा वह बहुत दूर तक गया। पहल में केदारनाथ सिंह पर लिखे को याद करते हुए वह बताते हैं कि रघुबीर सहाय से लेकर मुक्तिबोध पर नीलाभ हमेशा बात करते रहते थे। 

टीवी पत्रकार और आउटलुक के वेब में कुछ काम कर चुकीं वर्षा नीलाभ को कुछ इस तरह याद करती हैं। पत्रकारिता की दुनिया तेज़ तर्रार संपादकों से भरी हुई है, जो न्यूज रूम में अपने गुस्से और बात-बात पर कमियां निकालने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन नीलाभ जी का स्वभाव इसके ठीक उलट था। वे शांति और सहजता के साथ बात करने वाले संपादक थे। आउटलुक में उनके साथ कार्य के दौरान मेरा अनुभव बेहद अच्छा था। वे आपके सुझावों को सुनते थे। उनके साथ सीखने को मिलता था। उनकी भाषा बेहद समृद्ध थी। हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं पर उनकी बेहद अच्छी पकड़ थी। हिंदी में उन्होंने शब्दों को अपनाने के लिए एक स्टाइल शीट बनाई थी। ई या यी का फर्क हो, वो नहीं वह लिखो...। ये भाषा से जुड़ी छोटी छोटी बातें थीं जो आपकी शब्दावली को समृद्ध बनाती हैं। अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी शानदार पकड़ थी। वह एक-एक शब्द की उत्पत्ति की व्याख्या कर डालते थे।

न्यूज़ रूम में उनका कमरा किताबों से भरा हुआ था। उनकी शख्सियत की सबसे कमाल बात उनकी सहजता थी। वे नए व्यक्ति को उसकी पूरी संभावना के साथ देखते थे। इस भाव से नहीं कि सामने वाला ए-बी-सी उनके सामने क्या ठहर सकता है। मुझे याद है उनसे पहली मुलाकात के दौरान मैंने अपने ब्लॉग के बारे में बताया। मेरे सामने उन्होंने मेरे ब्लॉग की कई पोस्ट देख डाली। उस पर उनकी प्रतिक्रिया से मुझे अच्छा लगा। कई बार खबर को लेकर उनसे बातचीत के दौरान ही मुझे बहुत सारी ऐसी जानकारी मिल जाती जिससे खबर समृद्ध हो सके। वे भेड़चाल और शोरोगुल वाली पत्रकारिता नहीं करते थे। असल खबर के मर्म को समझते थे। इसीलिए पत्रकारिता की दुनिया में उनकी अलग पहचान थी। आज के समय में हिंदी पत्रकारिता में नीलाभ की कहीं और ज्यादा जरूरत थी।

हिंदी आउटलुक में लंबे समय तक साथ काम कर चुके नवीन त्यागी कहते हैं कि मैंने कई पत्रकारों-संपादकों के साथ समय-समय पर काम किया लेकिन नीलाभ के साथ काम करते हुए हमेशा यही लगता था कि एक पत्रकार-संपादक को वैसा ही होना चाहिए जैसा नीलाभ हैं। नीलाभ की यह खूबी थी कि वह दूसरों का लिखा बहुत गंभीरता से पढ़ते थे और उस पर सुझाव देते थे। नीलाभ अपने आप में एक स्कूल और अध्यापक थे, जो शायद एक अच्छा और समग्र बनाने की कोशिश के तहत हर सहकर्मी पत्रकार के साथ मेहनत करते थे।

इसके अलावा, नीलाभ की सबसे बड़ी बात यह थी कि उनकी आम जन और उनके हित हुआ करते थे न कि खुद कुछ हासिल कर लेना। उनके जैसे पत्रकार के साथ काम करते हुए हमेशा यह लगता रहा कि अगर वह चाहते तो वह सब कुछ उन्हें आसानी से मिल सकता था जिसके लिए आज के तमाम पत्रकार कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उन्होंने खुद को केवल पत्रकारिता तक सीमित रखा। हिंदी पत्रकारिता के लिए वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि से कम नहीं थे। 

नेशनल हेरल्ड और नवजीवन के एडिटर इन चीफ रहे नीलाभ लिवर सिरोसिस से पीड़ित थे। उनका चेन्नई स्थित अपोलो अस्पताल में इलाज चल रहा था। नीलाभ ने साल 2016 में नेशनल हेरल्ड के डिजिटल संस्करण की शुरुआत की थी। इससे पहले नीलाभ करीब एक दशक से ज्यादा समय तक आउटलुक हिंदी के संपादक रहे। नवभारत टाइम्स पटना से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले नीलाभ न्यूज टाइम के जयपुर संवाददाता भी रहे।

दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए नीलाभ ने राजस्थान में इनाडू टीवी को भी लांच किया था। इस तरह वह प्रिंट से लेकर टीवी पत्रकारिता तक हर जगह अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई। नीलाभ को इसके लिए भी हमेशा जाना जाएगा कि उन्होंने संपादक नाम की संस्था को बचाए रखने में हरसंभव कोशिश की जिसे बहुत ही सुनियोजित तरीके से एक तरह से खत्म किया जा चुका है। आज जब पत्रकार और पत्रकारिता पर बड़े संकट हैं, नीलाभ का न रहना कुछ ज्यादा ही तकलीफदेह कहा जा सकता है। 

(राम शिरोमणि शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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