नियति से मुलाकात का वादा

विरासत , , शनिवार , 27-05-2017


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जनचौक ब्यूरो

आरएसएस-बीजेपी और उनसे जुड़े संगठन मिलकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का पूरा नामोनिशान मिटा देना चाहते हैं। इसके जरिये उनका लक्ष्य एक व्यक्ति के बहाने देश की आधुनिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को खत्म करना है। इन परिस्थितियों में आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को याद करना और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि है। इस मौके पर पेश है आजादी हासिल होने के बाद संविधान सभा में दिया गया उनका ऐतिहासिक भाषण:
कई साल पहले हमने नियति से मिलने का वादा किया था, और अब वह समय आ गया है जब हम अपने उस प्रण को पूरा करने जा रहे हैं, पूरी तरह या सम्पूर्णता में न सही, लेकिन बहुत हद तक। जब मध्यरात्रि का समय होगा, जब सारी दुनिया सोई होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई भोर में जागेगा। एक ऐसी घड़ी आएगी, जो इतिहास में विरले ही आती है, जब हम पुराने को त्याग कर नए की दिशा में आगे बढ़ेंगे, जब एक युग समाप्त होगा, जब एक राष्ट्र की आत्मा, जो लम्बे समय से दमित रही है, अपनी बात कह सकेगी। यह उचित है कि इस पुनीत अवसर पर हम प्रतिज्ञा करें कि हम अपने आपको भारत और उसकी जनता और उससे भी बढ़कर मानवता की सेवा के लिए समर्पित करेंगे।
भारत ने इतिहास के आरम्भिक काल से ही अपनी अन्तहीन खोज शुरू की थी, और कितनी ही शताब्दियाँ उसके प्रयासों की सफलताओं की भव्यता और विफलताओं की गाथाओं से भरी हैं। अपने सौभाग्य और दुर्भाग्य दोनों ही स्थितियों में न तो उसने कभी अपनी तलाश के लक्ष्य को दृष्टि से ओझल होने दिया है और न ही उन आदर्शों को भुलाया है जिन्होंने उसे शक्ति प्रदान की है। आज हम दुर्भाग्य के एक युग को समाप्त कर रहे हैं और भारत अपने आपको एक बार फिर पाएगा। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वह तो आगे की ओर केवल एक कदम भर है, अवसरों की शुरुआत है, आगे और बड़ी सफलताएं और उपलब्धियाँ हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या हममें इतना साहस और इतनी बुद्धिमत्ता है कि इस अवसर का लाभ उठाएं और भविष्य की चुनौती को स्वीकार कर सकें?
स्वतंत्रता और सत्ता अपने साथ उत्तरदायित्व भी ले कर आती हैं। यह दायित्व इस सभा पर है जो कि भारत की सम्प्रभु जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली सम्प्रभु सभा है। स्वाधीनता के जन्म से पहले हमने परिश्रम की थकान को सहा है और हमारे हृदय उस वेदना की स्मृतियों से बोझिल हैं। उनमें से कुछ वेदनाएं अभी भी खत्म नहीं हुई हैं। खैर, बीती बातें पीछे छूट चुकी हैं और अब भविष्य हमारा आह्वान कर रहा है।
यह भविष्य चैन से बैठने या आराम करने का नहीं है, बल्कि सतत रूप से प्रयास और परिश्रम करने का है ताकि हम उन संकल्पों को पूरा कर सकें जो हमने कई बार लिए हैं और एक और संकल्प जो हम आज लेने वाले हैं। भारत की सेवा का अर्थ उन लाखों-लाख लोगों की सेवा करना है जो दुखी हैं। इसका अर्थ गरीबी, अज्ञान और रोग तथा अवसर की असमानता को मिटाना है। हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की यह अभिलाषा रही है कि हर व्यक्ति की आँख से हर आँसू को पोंछा जाए। हो सकता है कि हम ऐसा कर पाने की स्थिति में न हों, लेकिन जब तक आँसू हैं, जब तक दुख है, तब तक हमारा काम पूरा नहीं होगा।
और इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, काम करना होगा, कड़ी मेहनत करनी होगी ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें। ये सपने भारत के लिए हैं, लेकिन ये सपने समूचे विश्व के लिए भी हैं, क्योंकि आज सभी राष्ट्र और समुदाय एक-दूसरे के साथ इतनी घनिष्ठता के साथ जुड़े हैं कि वे दूसरों के कट कर अलग-थलग जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। शांति को अविभाज्य कहा जाता है, स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, अब सम्पन्नता पर भी यही बात लागू होती है, और इस एकीकृत विश्व में, जिसे अब अलग-अलग टुकड़ों में बांटना सम्भव नहीं है, विपत्ति पर भी यही बात लागू होती है।
भारत के लोगों, जिनके हम प्रतिनिधि हैं, से हम आग्रह करते हैं कि वे निष्ठा और विश्वास के साथ इस महान अभियान में हमारे साथ जुड़ें। यह समय क्षुद्र और हानिकारक आलोचना का नहीं है, द्वेष या दूसरों को दोष देने का नहीं है। हमें स्वाधीन भारत के भव्य प्रासाद का निर्माण करना है जहाँ उसकी सभी संतानें सुखपूर्वक रह सकें।










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