काश! एक बार नीतीश अपने अतीत के आईने में झांक लेते

राष्ट्रपति चुनाव , , सोमवार , 26-06-2017


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सत्येंद्र प्रताप सिंह

नई दिल्ली। नीतीश कुमार बिहार विधानसभा चुनाव 2000 के बाद पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। तब नीतीश के पास बहुमत नहीं था। हार लगभग तय होने के बावजूद राज्यपाल का निमंत्रण मिलने पर उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। तब शायद वे यह सोच कर बहुमत जुटाने उतरे थे कि हर मुकाबले का एक मैसेज होता है। नतीजा क्या निकला? विश्वासमत हासिल करने में विफल होता देख बिहार विधानसभा में ही इस्तीफ़े की घोषणा कर उन्होंने राज्यपाल को सातवें दिन अपना व अपनी सरकार का इस्तीफा सौंप दिया। सवाल है कि बहुमत जब हासिल नहीं था तो मुख्यमंत्री पद की शपथ क्यों लिए थे? 

पार्टी ने भी ये वाकया दोहराया

यह हुई इनकी बात, अब बात इनकी पार्टी की। वाकया 2007 के राष्ट्रपति चुनाव का है। तब यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के मुकाबले एनडीए समर्थित निर्दलीय भैरो सिंह शेखावत चुनाव मैदान में थे। भैरो सिंह शेखावत की हार तय थी, लेकिन तब नीतीश कुमार व उनकी पार्टी एनडीए के साथ थी तो इन्होंने भैरो सिंह शेखावत का साथ दिया था। तब इन्होंने यह कहा था कि हर मुकाबले में एक मैसेज होता है, उसे समझना चाहिए। नतीजा क्या निकला ? भैरो सिंह की हार हुई और प्रतिभा देवीसिंह पाटिल राष्ट्रपति चुनी गईं। 

तीसरा सवाल, नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की ही यदि बात करें तो बतौर पार्टी बहुत कमजोर होने के बावजूद वह कई राज्यों के चुनाव में क्यों उतर चुकी है? 

दिल्ली नगर निगम चुनाव में ही क्यों उतरे थे? हकीकत तो यह है कि 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव में जदयू ने बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ा था, यह जानते हुए भी कि वह कोई सीट नहीं जीतने वाली। नतीजा ये रहा कि पार्टी ने जमानतें जब्त करवाईं। जबकि पार्टी को अपनी ताकत पता थी। ऐसे उदाहरण अनगिनत हैं। 2004 के आम चुनाव में नीतीश ने बाढ़ संसदीय क्षेत्र से हार सुनिश्चित मानकर ही वहां से चुनाव लड़ा। हालाकि इसके साथ-साथ उन्होंने नालंदा से भी चुनाव लड़ा था। वहीं सबसे बड़ा सच तो यह है कि नीतीश कुमार के चुनावी करियर की शुरुआत 1977 और 1980 में बिहार विधानसभा चुनाव की हार से ही हुई थी। इस तरह से लगातार कई चुनाव वो हारे थे।

नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव।

अपनी ही बनाई कसौटियों पर खरे नहीं उतरे

बहरहाल राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार की उम्मीदवारी पर नीतीश कुमार ने यह कहते हुए सवाल खड़ा किया है कि उन्हें हारने के लिए उम्मीदवार बनाया गया है। लेकिन यदि वह अपने अतीत के आईने में झांके तो दिखेगा की ऐसे कई मौके आए हैं जब खुद नीतीश और उनकी पार्टी ने हार तय होने के बावजूद अपनी उम्मीदवारी जताई है, चुनाव लड़ा है, उम्मीदवारों का समर्थन किया है। और तो और नीतीश कुमार आज जिस राष्ट्रपति चुनाव में एक उम्मीदवार को हारने वाला बताकर समर्थन करने को तैयार नहीं दिखाई देते, ऐसे ही एक दूसरे मौके पर वे हारने वाले उम्मीदवार का समर्थन कर चुके हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि आज उसूली तौर पर नीतीश अपना स्टैंड बदल रहे हैं। और उसके पीछे अवसरवाद के अलावा दूसरा क्या कारण हो सकता है? 


 










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