भ्रष्टाचार और कालेधन का ‘पैराडाइज’ है पूंजीवाद

विश्लेषण , , मंगलवार , 07-11-2017


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मुकेश असीम

स्विस बैंकों, विकीलीक्स और पनामा जैसे टैक्स हैवन के कागजातों के बाद अब बरमूडा और कई अन्य ब्रिटिश द्वीपों से गुप्त कागजात सामने आये हैं जिन्हें पैराडाइज पेपर कहा जा रहा है। ये मुख्यतः एप्पलबाई नाम की एक वकालत फर्म के कागजात हैं जो दिखाते हैं कि दुनिया भर के पूंजीपति और अभिजात वर्ग के लोग कैसे अपने ही बनाये कानूनों को तोड़कर अपने ही देशों से चोरी और जालसाजी करते हैं। इन कागजातों को दुनिया के खोजी पत्रकारों की संस्था आईसीआईजे और 98 समाचार संस्थानों ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया है और इन 1.64 करोड़ कागजातों में दुनिया भर के बड़े नामों के साथ भारत में भी शासक बीजेपी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस सहित बड़े पूंजीपतियों के नाम शामिल हैं। हां, सदी के महानायक तो हर जगह मिलते हैं, तो यहां कैसे न होते, आखिर महानायक और मोदी सरकार के काला धन विरोधी ब्रांड एम्बेसडर जो ठहरे; उसके लिए काले धन का तजुर्बा जरुरी है न। 

पर इससे हमें इस पर अधिक उत्साहित होने की जरूरत नहीं कि इनमें से किसी को सजा होगी या उसकी काली कमाई का छिपा माल जब्त होगा क्योंकि यही पूंजीवादी व्यवस्था का असली चेहरा है। कोई सोचता है कि पनामा से पैराडाइज वालों तक, किसी के खिलाफ कुछ होगा तो नासमझी है। ये लोग यह सब काम नियम, कायदे, कानूनों के अंतर्गत ही करते हैं। ये कायदे बनाये ही इस काम के लिए गए हैं। मुनाफा और पूंजी बढ़ाना पूंजीवादी व्यवस्था में बिल्कुल क़ानूनी है। 

 

  • भूखे बच्चे सबसे बड़े गुनहगार
  • महानायक फिर जाल में

 

इस व्यवस्था में सबसे बड़ा गुनाह भूखे बच्चे का एक रोटी उठा कर खा लेना है। उसके लिए उसे पीटते-पीटते क़त्ल किया जा सकता है। बिना आधार के राशन लेना बड़ी चोरी है, बिना आधार बच्चे का मिडडे मील लेना गुनाह है, बिना आधार पूरी जिंदगी काम कर बुढ़ापे में अपनी पेंशन लेना सख्त पाप है, इन सब गुनहगारों को हुकूमत चोरी नहीं करने देगी। 

लेकिन यही सरकार पनामा-पैराडाइज वालों को अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाएगी!

हाँ, इनसे उन लोगों को सीख लेनी चाहिए जो अभी भी पूंजीवाद के छद्म जनतंत्र से कुछ उम्मीद पाले हुए हैं। जयंत सिन्हा का उदाहरण दिखाता है कि इस जनतंत्र के मालिक कौन हैं। जयंत सिन्हा ओमिड्यार नेटवर्क में काम कर रहे थे और साथ में बीजेपी के लिए भी। बीजेपी की घोषित नीति रिटेल में विदेशी निवेश के खिलाफ थी और जयंत सिन्हा के मालिक रिटेल में विदेशी निवेश चाहते थे। उन्होंने जयंत सिन्हा के जरिये सरकार को ही खरीद लिया- चुनाव लड़वाया और अपने आदमी को मंत्री बनवा ली, अपनी नीति भी लागू करवा ली, जबकि विदेशी निवेश के खिलाफ बीजेपी को वोट देने वाले लोग देखते ही रह गए।

आइये समझ लेते हैं कि ये टैक्स पनाहगाह (Haven) होते क्या हैं और कैसी भूमिका निभाते हैं।  

ज्यादातर लोग टैक्स हैवन को अपराधी संस्था जैसी चीज समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। ये विश्व पूँजीवादी व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं और उसके अन्तर्गत बिल्कुल कानूनी हैं। इनका जन्म 2 तरह से हुआ - कुछ थोड़े - स्विस बैंक, लक्जेमबर्ग, मोनाको, आदि 1789 की फ्रेंच क्रान्ति के डर से फ्रांस और बाकी यूरोप के अभिजात वर्ग द्वारा अपनी सम्पत्ति को छिपाने के लिये अस्तित्व में आये। इसके लिये गुप्त खाते चालू हुए जिनका इस्तेमाल बाद में नाजियों ने यूरोप भर की अपनी लूट को छिपाने के लिये भी किया। लेकिन ज्यादातर ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन हैं - ये 1929 के एक ब्रिटिश कानून के तहत शुरू हुए। ये सब पहले और कुछ अब भी ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत छोटे द्वीप हैं। इनका उपयोग पहले ब्रिटिश और बाद में दूसरे साम्राज्यवादी देशों की कम्पनियों ने किया, एक ओर तो एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के देशों की लूट के लिये और दूसरी ओर खुद अपने देशों में भी टैक्स व अन्य कानूनों से बचने के लिये। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रत्यक्ष उपनिवेशवाद समाप्त होने के बाद जब नव स्वाधीन देशों और खुद साम्राज्यवादी देशों में भी जनवादी आन्दोलनों के दबाव से नव उपनिवेशवादी कम्पनियों पर कुछ नियमों का दबाव पड़ा तो उन्होंने इन जगहों को अपना अड्डा बनाया, जहां उन्हें न टैक्स देना था, न अपने कारनामों की कोई जानकारी पब्लिक करनी थी। लेकिन आखिर ये इनके कैसे और क्या काम आते हैं?

इनके काम करने के तरीके का उदाहरण देखिये - जाम्बिया से तांबा खनन करने वाली कम्पनी इसको नाम के लिये पनामा या मॉरीशस में रजिस्टर अपनी कम्पनी को 2000 डॉलर/टन पर बेचती है और यह कम्पनी तांबे के असली खरीदार को 6000 डॉलर/टन पर। तांबा पनामा/मॉरीशस नहीं जाता (वहां ऐसे कोई उद्योग ही नहीं) लेकिन 4000 डॉलर वहां जाता है और जाम्बिया पहुंचता है सिर्फ 2000 डॉलर। यह जाम्बिया के साधनों की लूट है और इस पर कम्पनी के मूल देश में भी कोई टैक्स नहीं और इस चोरी किये पैसे के इस्तेमाल पर कोई नियम-कायदा भी लागू नहीं। 

ऐसे ही पिछले कुछ सालों में कुछ बिजली बनाने वाली भारतीय कम्पनियों ने मॉरीशस में रजिस्टर अपनी ही कम्पनियों से कोयला आयात किया, जहां कोयला होता ही नहीं। इस कोयले को इन कम्पनियों ने ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से बाजार भाव पर खरीद कर दुगने दामों पर भारत में बेचा दिखाया। इकॉनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली की रिपोर्ट के अनुसार ऐसे करीब 60 हजार करोड़ रुपया काला धन बैंकिंग चैनल से ही मॉरीशस पहुंच गया। ऊपर से ईंधन की लागत ज्यादा दिखाकर इन कम्पनियों ने बिजली के रेट भी बढ़वा लिये - और जनता की लूट। फिर यही काला धन मॉरीशस से विदेशी निवेश के रूप में वापस भारत आया और यहाँ होने वाला मुनाफा भी टैक्स फ्री हो गया। इसमें अडानी/अम्बानी आदि सबकी कम्पनियां शामिल हैं। यही वजह है कि भारत में सबसे बड़ा विदेशी पूंजी निवेशक मॉरीशस जैसा छोटा देश है क्योंकि वहां से घूम कर यह काला धन फिर भारत आ जाता है।

इस स्थिति का वर्णन लगभग 170 साल पहले कार्ल मार्क्स ने इन शब्दों में किया था, "वही वेश्यावृत्ति, वही निर्लज्ज ठगी, अमीर बनने का वही पागलपन — उत्पा दन से नहीं वरन् दूसरों की संपत्ति पर हाथ साफ़ करके — समाज के हर क्षेत्र में व्यााप्तप था। रुग्ण और घातक हवस बेलगाम होकर फूट पड़ी थी, वही हवस जो खुद बुर्जुआ क़ानूनों से निरंतर टकराती थी, और जो ख़ासकर समाज के ऊपरी तबकों में पायी जाती थी, ऐसी हवस जिसमें वित्तीथय सट्टेबाज़ि‍यों द्वारा पैदा की गई दौलत अपनी स्वा भाविक पूर्णता तलाशती है, जिसमें सुख विषयोपभोग बन जाता है और धन, गन्दगी और ख़ून एक दूसरे में लिथड़ जाते हैं।" 

यही आज के लुटेरे पूंजीवाद की असली यथार्थ तस्वीर है।

(मुकेश असीम आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं।)










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Vimlesh :: - 11-07-2017
Good