रिहा होंगे जेलों में बंद 4000 से ज्यादा बेकसूर आदिवासी

ज़रा सोचिए... , , मंगलवार , 14-05-2019


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों में भारतीय दंड विधान व स्थानीय विशेष अधिनियम के तहत प्रकरण वापसी को लेकर जल्द ही आवश्यक न्यायालयी कार्यवाही की जाएगी। छत्तीसगढ़ के आठ जिलों के दस हजार से अधिक आदिवासी जेलों में बंद हैं। इनमें से करीब चार हजार आदिवासियों की रिहाई का सैद्धांतिक फैसला लिया गया है।

आदिवासियों के हितों को लेकर राज्य सरकार की ओर से बनाई गई कमेटी ने सोमवार को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के जनजाति वर्ग के खिलाफ दर्ज मामलों की समीक्षा की। जस्टिस एके पटनायक की अध्यक्षता में बनाई गयी इस कमेटी ने जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों की रिहाई को लेकर अधिकारियों के साथ चर्चा की।

प्रदेश की जेलों में बंद 4007आदिवासियों में कुछ ऐसे हैं जो जंगल से जलाऊ लकड़ी बीनने, मात्रा से अधिक शराब बनाने, कोई जमानतदार न होने या माओवादी होने के आरोप में 17-18 साल से सजा काट रहे हैं। इनकी रिहाई के लिए पटनायक कमेटी ने 3 बिंदु तय किए हैं। इसके तहत 1141 मामलों की समीक्षा होगी। ये फैसला सोमवार को कमेटी ने अपनी पहली बैठक में किया।

दरअसल, बस्तर की जेलों में कई ऐसे आदिवासी 17-18 साल से बंद हैं जिन पर नक्सलियों की मदद या स्लीपर सेल के रूप में काम करने के आरोप हैं। कमेटी ने संबंधित अधिकारियों से 3 बिंदुओं के आधार पर 15 जून तक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। इस रिपोर्ट के आधार पर मामलों की समीक्षा होगी।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के विरुद्ध दर्ज प्रकरणों की समीक्षा के लिए राज्य शासन द्वारा उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके पटनायक की अध्यक्षता में गठित कमेटी की पहली बैठक सोमवार को रायपुर के न्यू सर्किट हाउस में हुई। बैठक में बस्तर रेंज के सात जिलों कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा व बीजापुर तथा राजनांदगांव जिले में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के विरुद्ध दर्ज प्रकरणों की समीक्षा भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं व स्थानीय विशेष अधिनियम के तहत की गई।

साथ ही इन प्रकरणों में न्यायालयी कार्यवाही की स्थिति संबंधी जानकारी ली गई। सभी प्रकरणों के अवलोकन और विचार-विमर्श के बाद समिति द्वारा प्रत्येक प्रकरण की गुण-दोष के आधार पर समीक्षा कर संबंधित अनुसूचित जनजाति वर्ग के हित में समयबद्ध कार्ययोजना के तहत न्यायोचित कार्यवाही करने का निर्णय लिया गया।

2015 में सुकमा के तत्कालीन कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के बाद तत्कालीन रमन सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ चल रहे मामलों को निपटाने के लिए 3 सदस्यीय कमेटी बनाई थी। मध्यप्रदेश की पूर्व चीफ सेक्रेटरी निर्मला बुच इसकी अध्यक्ष थीं। स्थायी समिति ने 7 बैठकों में 189 मामलों में जमानत पर रिहाई की अनुशंसा की। इनमें से 66 मामलों में आदिवासी जमानत पर रिहा हुए, 48 में दोष मुक्त हुए और 13 मामलों में कोर्ट से सजा हुई। शेष ठंडे बस्ते में चले गए थे।

 








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Dilip gamit :: - 05-15-2019
Jald hi bina sarat riha kar dena chahiye.

Dilip gamit :: - 05-15-2019
Adivasio ko khatam karne ki sajis hai ye.