पॉलीथिन में आंत रखकर दर-दर भटकने को मजबूर है सीआरपीएफ का एक जवान

ज़रा सोचिए... , नईदिल्ली/मुरैना, शनिवार , 24-03-2018


polythin-lever-crpf-rajnath-home-minister

जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली/मुरैना। जवानों के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देने का दावा करने वाली बीजेपी की असलियत क्या है उसे सीआरपीएफ जवान मनोज तोमर की जहालत भरी जिंदगी से समझा सकता है। मध्य प्रदेश के तरसमा गांव के रहने वाले मनोज तोमर 2014 के एक नक्सली हमले में घायल हो गए थे। उसके बाद से ही मनोज अपनी आंत को पेट के बाहर पॉलीथिन में बांध कर घूमने के लिए मजबूर हैं। न तो उनका आपरेशन हो पा रहा है और न ही उसका कोई दूसरा रास्ता सूझ रहा है। आपको बता दें कि इस हमले में एक गोली उनकी आंख में भी लगी थी जिससे मनोज की एक आंख भी खराब हो गयी है। हालांकि उनकी केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात भी हुई थी। वहां से उन्हें आश्वासन तो जरूर मिला लेकिन पैसा नहीं मिला। 

दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक मनोज 2014 में झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में सात गोलियां लगी थीं। इस हमले में उनकी आंत पेट से बाहर आ गयी। उस समय गोलियां लगने के चलते उनका तत्काल आपरेशन नहीं हो सकता था। लिहाजा चिकित्सकों ने उसे टाल दिया। इस बीच उनकी आंत बाहर ही लटकी रही। लेकिन अब जब शरीर आपरेशन के लायक हो गया है तो मनोज के पास पैसे नहीं हैं।

दरअसल मनोज के इलाज में सरकार के नियम आड़े आ रहे हैं। नियम कहता है कि मनोज चूंकि छत्तीसगढ़ में ड्यूटी के दौरान घायल हुए थे इसलिए उनका इलाज रायपुर के अनुबंधित अस्पताल नारायणा में ही होगा। अगर इलाज की सारी सुविधाएं और व्यवस्था हो तो भला किसी को क्या एतराज होगा। लेकिन बताया जा रहा है कि वहां इलाज संभव ही नहीं है। जानकारों का कहना है कि सरकार एम्स से आंत और चेन्नई से उनकी आंख का इलाज करवा सकती है। लेकिन उस दिशा में किसी की तरफ से कोई पहल नहीं हो रही है। इस बीच मनोज रायपुर स्थित नारायणा अस्पताल में नियमित चेकअप के लिए जाते हैं। लेकिन उसमें भी उन्हें ढेर सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इस संदर्भ में पूछे जाने पर सीआरपीएफ ने भी अपनी मजबूरी जतायी। सीआरपीएफ के दिल्ली मुख्यालय के पीआरओ सत्येंद्र सिंह ने दैनिक जागरण को बताया कि उपचार सीआरपीएफ के लिए संबंधित राज्य के अनुबंधित अस्पताल में किया जाता है।

मनोज ने बताया कि वो आठ साल तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुरक्षा दस्ते के सदस्य भी रह चुके हैं। मनोज की गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी मुलाकात हुई थी। दो साल पहले हुई इस मुलाकात में मनोज की हालत को देखकर गृहमंत्री चौंक गए थे। मनोज का कहना है कि उन्होंने अपनी सांसद निधि से पांच लाख रूपये देने का आश्वासन दिया था। लेकिन वो मदद अभी तक नहीं मिली। मनोज ने बताया कि उनकी मुलाकात केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से भी हुई थी। लेकिन उनकी सिफारिश के बावजूद एम्स में इलाज नहीं हो सका। 

विशेषज्ञकों के मुताबिक आपरेशन के बाद आंत को पेट के भीतर किया जा सकता है। जिससे फिर वो सामान्य जीवन जीने में सक्षम हो जाएंगे। इसके साथ ही उनकी आंखों की रोशनी भी लौट सकती है। लेकिन इन दोनों कामों में 5-7 लाख रुपये का खर्च आएगा। लेकिन जवानों के नाम पर पूरे देश से वोट मांगने वाली सरकार को न तो मनोज की बदहाली दिख रही है और न ही अपने वादे। खास बात ये है कि अगर सरकार की गैरजानकारी में चीजें चल रही होंती तो एकबारगी सोचा जा सकता था। लेकिन पूरे मामले से न केवल सरकार बल्कि उसका वो शख्स परिचित है जो उस विभाग का मुखिया है और देश के सरकारी ओहदे में नंबर दो की हैसियत रखता है।

ग्वालियर के एक मेडिकल कालेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुनील अग्रवाल ने जागरण को बताया कि जब आंतें जुड़ने की स्थिति में नहीं होती हैं तो अस्थायी रूप से कोलोस्टामी बना दी जाती है। और संक्रमण रोकने के लिए मरीज को एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करना होता है।  










Leave your comment