युद्ध कोई क्रिकेट का मैच नहीं है, मजे के लिए खेलने की जिद मत करिए

मुद्दा , , रविवार , 17-02-2019


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जितेंद्र भट्ट

देशभक्ति, क्या सार्वजनिक प्रदर्शन का भाव हो सकता है? अगर हां, तो क्या यही एक तरीका है, जिससे कोई साबित करेगा कि वो देशभक्त है या नहीं?बहुत हद तक संभव है; इस सवाल पर मेरी लानत-मलामत हो जाए। गाली गलौच भी संभव है, क्योंकि वर्तमान दौर में ‘कथित देशभक्तों’ का यही ट्रेड मार्क बन गया है।

वैसे इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं। हर किसी का जवाब, दूसरे के जवाब से अलग होना संभव है।

कोई कैंडिल मार्च निकालकर खुद को देशभक्त साबित कर सकता है। कई होंगे जो भारत माता के नारे लगाकर देशभक्त होने का अहसास जिएंगे। कुछ लोग आंखों में खून चढ़ाकर युद्ध की मांग कर रहे हैं। उन्हें सीआरपीएफ के 40 जवानों के बलिदान का बदला तुरंत चाहिए।

पर उनकी मांग के मुताबिक लड़ी जाने वाली जंग लड़ेगा कौन? इस सवाल का जवाब भी उन्हें देना चाहिए। बेशक वो जिस युद्ध की बात कर रहे हैं; उसकी जिम्मेदारी भी सीआरपीएफ, भारतीय सेना और बीएसएफ जैसी सिक्योरिटी फोर्स के जवानों के कंधों पर ही है। इन्हीं को ये जंग लड़नी होगी।

देशभक्त घरों के अंदर सोफे पर गड़कर युद्ध की मांग कर सकते हैं। कुछ जो ज्यादा करने का जज्बा रखते हैं, वो कैंडिल मार्च निकालेंगे और नारे लगाएंगे। स्टूडियो में कैमरों के सामने एंकर चिल्लाते हुए पाकिस्तान के खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं, और कई दिनों तक छेड़ते रहेंगे।

पर इनमें से हर एक को समझना चाहिए कि जंग में सैनिक मरते हैं। देशभक्ति के नारे लगाने वालों का कुछ नहीं जाता। कैंडिल मार्च निकालने वालों का कुछ नहीं घटता। घरों के अंदर चाय की चुस्कियों के साथ टीवी न्यूज चैनल देखते हुए गप लड़ाते लोगों का भी कुछ नहीं जाएगा। न स्टूडियो में जोर जोर से चिल्लाने वाले एंकर्स के कड़क कोट पर सलवटें आएंगी। वो चिल्लाता रहेगा, कोट कड़क ही रहेगा।

मरते सैनिक हैं, जो बिला शक गांव में रहने वाले किसानों के बेटे हैं।

आप कैंडिल मार्च निकालो। जी भरकर देशभक्ति के नारे लगाओ। दुश्मन देश को मिट्टी में मिला देने के लिए युद्ध छेड़ देने का आह्वान करो। अगर आप ऐसा करना चाहते हैं, तो ऐसा करने का आपको पूरा हक है। इसमें किसी को कतई ऐतराज नहीं होना चाहिए। मुझे भी इसमें ऐतराज नहीं है।

पर नारे लगाते वक्त क्या ये नहीं सोचना चाहिए, कि हर बार हमारी नसें तभी क्यों फड़कती हैं, जब हमारे जवान शहीद होते हैं।

हमारी देशभक्ति और हमारा खून तभी क्यों खौलता है, जब जवानों के शव तिरंगे में लिपटते हैं।

तेज बहादुर यादव, पानी वाली दाल और जली रोटियां; आपको याद है ना?

क्या आपने ये जानने समझने की कोशिश की है, कि देश के लिए लड़ने वाले लाखों सैनिक किस हालात में रहते हैं? कैसा खाना खाते हैं? कैसे मानसिक हालात में अपनी ड्यूटी निभाते हैं?

क्या आप तेज बहादुर यादव को जानते हैं? तेज बहादुर यादव भी एक सैनिक था। दो साल पहले जनवरी 2017 में तेज बहादुर ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डालकर बीएसएफ में जवानों को परोसे जाने वाले खाने की क्वालिटी पर सवाल उठाए थे। तेज बहादुर ने कहा था कि जवानों को पानी वाली दाल और जली रोटियां खिलाई जाती हैं।

तेज बहादुर के इस वीडियो के वायरल होने के बाद गृह मंत्रालय में हड़कंप मच गया। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जांच के आदेश दिए। सरकार ने जांच कराई। सिर्फ तीन महीने के अंदर जांच पूरी हुई। जांच में खाना ठीक निकला, सवाल उठाने वाले जवान को पहले झूठा साबित किया गया, और फिर बर्खास्त कर दिया गया।  

तेज बहादुर यादव, जो एक जवान था; जिसने बॉर्डर पर सर्दी, गर्मी और बारिश में देश की सेवा की थी। पर उसके लिए देशभक्त कैंडिल लेकर नहीं निकले।

न ही सुरक्षा बलों के लाखों जवानों के खाने को लेकर उठे गंभीर सवाल पर देशभक्ति ने उफान मारा।

क्या आपको लगता है कि खाने पर सवाल उठाने वाले सैनिक तेज बहादुर यादव के साथ जो सुलूक किया गया, वो सही था? क्या देश का सैनिक एक प्याली दाल और चार बिना जली रोटियां भी नहीं मांग सकता? 

क्या सवाल पूछने वालों के साथ इस देश में यही होगा? खैर, आगे बढ़ते हैं। अभी देशभक्ति के और टेस्ट बचे हैं।

कारगिल के हीरो की लड़ाई, क्या आपको याद है?

आप देशभक्त हैं, तो आपको रिटायर्ड मेजर डी पी सिंह के बारे में जरुर जानना चाहिए। मेजर डी पी सिंह 1999 के कारगिल के हीरो हैं। अगर वो शहीद हो जाते, तो उन्हें देश कुछ दिन याद रखता। पर वो दुश्मन की गोली से मरे नहीं, जिंदा रहे। उनका एक पैर काटना पड़ा।

देशभक्तों को पता होना चाहिए कि मेजर डी पी सिंह को अपनी जायज पेंशन के लिए सात साल तक कोर्ट में लड़ना पड़ा। 1999 में कारगिल की जंग खत्म हो गई थी, लेकिन मेजर डी पी सिंह की जंग 2006 में जाकर खत्म हुई। मेजर डी पी सिंह को साबित करना पड़ा कि वो युद्ध में घायल हुए थे। हां, उन्हें साबित करना पड़ा, वो युद्ध में घायल हुए थे।

मेजर डी पी सिंह ने पैर खोने पर उफ तक न की होगी, लेकिन हमने उनसे कोर्ट के चक्कर लगवाए। क्या कोई सोच सकता है कि मेजर डी पी सिंह के लिए उन सात सालों का हर एक दिन कितना लंबा रहा होगा?

हममें से कितने लोग जानते हैं, मेजर डीपी सिंह की इस निजी लड़ाई के बारे में?

मेजर डी पी सिंह ने 15 फरवरी को फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखी है। जिसमें उन्होंने अपनी पेंशन की इस कानूनी लड़ाई के बारे में लिखा है। मेजर कहते हैं कि कोर्ट में ऐसे सैकड़ों मामले हैं। मतलब वो अकेले नहीं हैं। न जाने कितने सैनिक हैं, जो न्याय के लिए लड़ रहे हैं।

मेजर डी पी सिंह लिखते हैं कि “कोई ये सोचने की कोशिश भी नहीं कर सकता है कि उसकी मौत होगी या उसे अपने शरीर का कोई हिस्सा खोना पड़ेगा। और फिर न्याय और अपने अधिकारों के लिए उसे कोर्ट के चक्कर काटने होंगे।“

देश का मतलब सरकार नहीं होता, देशभक्ति का मतलब सरकार भक्ति नहीं !

मेजर डीपी सिंह के मुताबिक इस वक्त ऐसे हजारों मामले कोर्ट में पेंडिंग हैं। और इन मामलों में सैनिकों को अपने हक के लिए रक्षा मंत्रालय से ही लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

इस लड़ाई में सरकार सैनिकों के साथ कैसे-कैसे खेल खेलती है? मेजर डी पी सिंह का लिखा हुआ पढ़ेंगे, तो हिल जाएंगे। उन्होंने लिखा है कि “मैं मेजर नवदीप सिंह और सांसद राजीव चंद्रशेखर के साथ रक्षा मंत्री (निर्मला सीतारमण) से मिला। उन्होंने वादा किया था कि जनवरी के आखिर तक युद्ध में घायल होने के बाद विकलांग हुए सैनिकों के खिलाफ गैरजरुरी अपील वापस ले ली जाएगी। जनवरी खत्म हो गई और वादा वहीं है। मुकदमें अभी भी चल रहे हैं।“

क्या एक कैंडिल मार्च कोर्ट के चक्कर लगा रहे इन सैनिकों के लिए नहीं जलाना चाहिए?

युद्ध की मांग करने वालों, मेजर डीपी सिंह के पैर की तरफ देखो !

युद्ध की मांग करना। ड्राईंग रूम या स्टूडियो में बैठकर दुश्मन देश को मिट्टी में मिला देने की बात करना। देशभक्ति के नाम पर लगातार उन्माद फैलाना एक बात है।

लेकिन सोचने और समझने की बात है कि मेजर डीपी सिंह जैसे सैनिकों को एक युद्ध क्या देकर जाता है? इसका अहसास शायद हमें कभी नहीं हो पाएगा, क्योंकि ये दर्द वही महसूस कर पाएंगे;जिन्होंने जंग में अपनों को खोया हो।  

अगर आपको गुमान है कि आप देशभक्त हैं, और आपके दिलों के अंदर देशभक्ति अंदर तक धंसी है। तब आपको मेजर डीपी सिंह और तेज बहादुर यादव की हर एक बातों में गंभीर सवाल दिखने चाहिए।

मुझे मेरी प्यारी सरकार से सवाल पूछने का हक है, या नहीं?

आपको अपनी प्यारी सरकार से सवाल पूछने का हक है। आपको कहना चाहिए कि बताइए, जब खुफिया सूचना आठ फरवरी को दे दी गई थी कि आईईडी के इस्तेमाल का अंदेशा है। तब छह दिन तक पूरा अमला सचेत क्यों नहीं हुआ?

सवाल इस पर भी खड़े हुए हैं कि ढाई हजार जवानों की मूवमेंट एक साथ क्यों हुई? और इन जवानों को 78 बसों में ठूंसकर क्यों ले जाया गया? सवाल पूछना चाहिए कि क्या देश के लिए खून बहाने वाले सैनिक, नेताओं की तरह हवाई जहाज के जरिए मूव नहीं कर सकते?

मुझे मेरी सरकार से ये सवाल पूछने का भी हक है कि आपकी कश्मीर को लेकर नीति साफ क्यों नहीं है?

सरकार से ये सवाल भी पूछना चाहिए कि हे सरकार, आप जिस राजनीतिक दल को अलगाववादियों का समर्थक बताते रहे, अब भी बता रहे हैं। फिर क्यों अचानक आप उसके साथ मिलकर सरकार बनाने निकल पड़े? और आपने सरकार चलाई भी। पूछिए, ये दोगलापन क्यों है?

हमें पूछना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि 2009 से 2013 यानी यूपीए-2 सरकार के पांच साल के दौरान आतंकवाद से जुड़ी घटनाओं में मौत का आंकड़ा जो नीचे की तरफ आ रहा था। 2014 के बाद मोदी सरकार के पांच साल में बढ़ता क्यों जा रहा है?

वो भी तब जब दिल्ली की कुर्सी पर खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली सरकार बैठी हुई है। जो सीना ठोककर कहती है कि वो आतंकवाद को जड़ से मिटाने के लिए प्रतिबद्ध है।

मुझे नहीं देखने, तिरंगे में लिपटे जवानों के और शव!

और अंत में बेशक जंग तो कभी भी लड़ी जा सकती है। शायद दिल्ली में बैठे सियासतदानों के लिए ये फैसला उतना मुश्किल न हो। सिर्फ एक आदेश की बात है। लेकिन युद्ध सिर्फ आदेश नहीं होता। इसमें खून बहता है। कुछ उधर का बहेगा, तो कुछ अपना भी होगा। हमें अपने खून की चिंता तो करनी ही चाहिए।

आपको अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए एक युद्ध जरुरी लगता होगा। मुझे नहीं लगता। मुझसे मेरी देशभक्ति कह रही है कि मुझे देश के जवानों के तिरंगे में लिपटे और शव नहीं देखने हैं।

(जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं।) 

 








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