एक आरोपी को हीरो बनाने में जुटा पूरा तंत्र

पड़ताल , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 24-08-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद मालेगांव बम धमाके के आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित जेल से रिहा हो गए हैं। पुरोहित मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट कोलाबा में ऑफिसर रहे। नवी मुबंई स्थित तालोजा जेल से रिहा होने पर सेना की गाड़ियों से पुरोहित को मुंबई के कोलाबा स्थित मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट ले जाया गया। जहां वो नियुक्त थे। पुरोहित सेना से निलंबित हैं और कोर्ट मार्शल का सामना कर रहे हैं। 

अदालत से जमानत मिलने के बाद अभी सेना ने उनका निलंबन वापस नहीं लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत दी है। जमानत की शर्तों के अनुसार वह कोर्ट के इजाजत के बिना देश नहीं छोड़ सकेंगे। उनका पासपोर्ट कोर्ट के पास जमा रहेगा। अगर कोर्ट की ओर से निर्देश मिला तो पुरोहित को पेश होना पड़ेगा। इसके अलावा, जांच के संदर्भ में एनआईए की मदद भी करनी होगी। कोर्ट ने पुरोहित से यह भी कहा है कि वह इस मामले से जुड़े किसी भी गवाह से दूरी बरतें। 

जेल से छूटने के बाद पुरोहित।

जमानत पर जश्न और यूपीए पर दोषारोपण

सत्ता प्रतिष्ठान के इशारे पर भारतीय मीडिया इस घटना को इस तरह से पेश कर रहा है जैसे सुप्रीम कोर्ट ने कर्नल पुरोहित को बेगुनाह बताते हुए बाइज्जत बरी कर दिया। सेना की गाड़ियों से उनका अपने यूनिट में जाने को प्रचारित किया जा रहा है कि सेना ने अपने इस जांबांज अधिकारी के स्वागत में पलक-पावड़े बिछा दिया। 

भारतीय मीडिया लोक में मालेगांव बम धमाके के आरोपी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित की जमानत का जश्न मनाया जा रहा है। ऐसा लगता है कि जमानत ही पुरोहित की बेगुनाही का ऐलान है। न्यूज चैनल सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कर्नल पुरोहित को फंसाने से सेना का मनोबल गिरा होगा? यानी न्यूज चैनलों को पूरा भरोसा है कि पुरोहित को ‘फंसाया’ गया। दूसरी तरफ मीडिया में पुरोहित से जुड़े समाचारों में इस बात की प्रमुखता है कि यूपीए सरकार ने ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसा शब्द वोटबैंक के नजरिए से गढ़ा। सत्तारूढ़ दल के नेता, मंत्री और समर्थक इस मुद्दे पर यूपीए सरकार को घेर रहे हैं। उनका तर्क है कि यूपीए सरकार ने हिंदू विरोधी मानसिकता के चलते पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, स्वामी असीमानंद और अन्य लोगों को जानबूझ कर फंसाया था। अब यूपीए सरकार के कारनामे सामने आ रहे हैं। 

मामले की असली पेंच और एनडीए सरकार का आतंक के नाम पर खेल यहीं से शुरू होता है। सत्ता में आने के बाद संघ-बीजेपी सरकार जिस तरह से हर मामले को सांप्रदायिक रंग देने और यूपीए सरकार को बदनाम करने का षड़यंत्र रच रही है, यह मामला उसका नायाब उदाहरण है। इस मामले में सरकार, इंटेलिजेंस और जांच एजेंसियों की संलिप्तता देखी जा सकती है।   

मालेगांव बम धमका और उसके गुनहगार 

महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में 29  सितंबर 2008 को हुए बम विस्फोट में 8 लोग मारे गए थे। इस धमाके में करीब अस्सी लोग घायल हुए थे। मालेगांव की हमीदिया मस्जिद के नजदीक एक मोटरसाइकिल पर रखे बम में धमाका हुआ था। केस की शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की। एटीएस के तत्कालीन चीफ हेमंत करकरे ने पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत कई लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया। शुरुआती जांच में पुरोहित ने अपने को सेना का जासूस बताया था। और एटीएस के सामने स्वीकार किया था कि वह सेना की तरफ से हिंदू अतिवादियों के खतरनाक इरादों की जासूसी कर रहे थे। पुरोहित ने अपने बयान में साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों के इरादे को खतरनाक बताया था। 

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर।

सितम्बर 2008 में मालेगांव में दो आतंकी विस्फोटों में घटनास्थल से बरामद हुई साध्वी प्रज्ञा सिंह की मोटरसाइकिल ने पुलिस को अंततः उपरोक्त आतंकी मामलों में असीमानंद और सुनील जोशी के नेतृत्व में हिंदू कट्टरपंथियों की संलिप्तता और उन्हें बारूद मुहैया कराने वाले कर्नल पुरोहित और उनके संगठन ‘अभिनव भारत’ के परस्पर गठजोड़ तक पहुंचाया। एटीएस की जांच में पुरोहित हिंदू अतिवादियों के गिरोह में शामिल पाया गया।     

प्रज्ञा और पुरोहित की महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गिरफ्तारी के महीने भर में एटीएस चीफ हेमंत करकरे मुंबई 26/11 हमलों में शहीद हो गए। एटीएस ने 2009 में अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था। लेकिन 2014 में केंद्र सरकार बदलने और एनआईए के शरद कुमार जैसे अधिकारी ने 2016 में मकोका को हटाने वाला और प्रज्ञा को क्लीन चिट देने वाला नया आरोप पत्र दाखिल किया, और इस तरह पहले प्रज्ञा और अब पुरोहित की जमानत का रास्ता सुलभ कर दिया।

जमानत में एनआईए चीफ शरद कुमार की भूमिका

पुरोहित ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उन्हें राजनीतिक क्रॉसफायर का शिकार बनाया गया है। पुरोहित ने महाराष्ट्र एटीएस पर उन्हें गलत तरीके से फंसाने का आरोप भी लगाया था। वहीं, पुरोहित का पक्ष रखते हुए सीनियर वकील हरीश साल्वे ने कहा था कि न्याय के हित में पुरोहित को जमानत दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा था कि जब इस केस में एक अन्य आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जमानत मिल सकती है तो पुरोहित को क्यों नहीं? साल्वे ने एनआईए पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया था। जबकि एनआईए के कारण ही पुरोहित को जमानत मिली है। एनआईए ने सत्ता के इशारे पर इस केस को भरसक कमजोर किया। 

इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि एनआईए चीफ शरद कुमार ने सेवा विस्तार पाने और बाद में कोई बड़ा पद हथियाने के क्रम में ‘इस हाथ दे और उस हाथ ले’ के तहत भाजपा सरकार को उपकृत किया है। शरद कुमार 2013 में ही एनआईए चीफ हो गए थे और एक वर्ष तक इन मामलों के पुराने आरोप पत्रों के अनुसार तमाम मामलों में ट्रायल चलते रहे। मई 2014 में मोदी सरकार बनते ही उनका बदला रंग नजर आने लगा। नौकरशाही में यह कोई नयी बात नहीं है। फलस्वरूप शरद कुमार को मोदी सरकार से अब तक दो बार सेवा विस्तार मिल चुका है। तीसरा, पुनः इसी अक्तूबर में मिल जाएगा। अन्यथा, उन्हें किसी और महिमावान कुर्सी से नवाजा जाएगा।

 










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