विकास की हक़ीक़त : वसुंधरा राज में 6 माह में 13 हजार से ज़्यादा बच्चों की मौत

एक नज़र इधर भी , , बृहस्पतिवार , 30-11-2017


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अखिलेश अखिल

यह है हमारे लोकतंत्र और विकासवादी राजनीति का नया नज़ारा कि राजस्थान में पिछले छह माह में सरकारी अस्पतालों में 13 हजार से ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई है और सरकार ज़िम्मेदारी लेने की बजाय इधर-उधर के कारण गिना रही है। इन मौतों में अकेले अक्टूबर में 1527 बच्चों की मौत हुई है। 

बच्चों की मौत के यह आंकड़ें किसी गैरसरकारी संगठन या किसी अन्य एजेंसी के नहीं हैं। राजस्थान के अस्पतालों में हुई इन मौतों की जानकारी खुद सरकार ने दी है। मौत के ये आंकड़े  सरकार की ओर से हाईकोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में दिए गए हैं। 

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में 51 दिनों में 80 से ज्यादा नवजात बच्चों की मौत के बाद  कोर्ट सक्रिय। फोटो साभार

बांसवाड़ा कांड के बाद सक्रिय हुआ कोर्ट

आपको बता दें कि राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में 51 दिनों में 80 से ज्यादा नवजात बच्चों की मौत मीडिया में आने के बाद हाईकोर्ट ने इस पर स्वतः  संज्ञान लिया था और सरकार से इस बारे में रिपोर्ट मांगी थी। 


सरकार की ओर से दिए गए जवाब में बताया गया है कि अक्टूबर तक पिछले छह माह में नवजात समेत कुल 13,673 बच्चों की मौत हुई है। 

सरकार ने कोर्ट को बताया है कि मौतों का सबसे बड़ा कारण मेडिकल स्टाफ की कमी के अलावा अशिक्षा और खस्ताहाल सडकें हैं। इस मामले की अगली सुनवाई सात दिसम्बर को होगी।


ज़िम्मेदार कौन?

यहां केंद्र सरकार की बात छोड़ भी दी जाए तो राज्य सरकार से तो पूछा ही जाना चाहिए कि इन मौतों के पीछे जो कारण राज्य सरकार ने बताये हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्यों इतनी बड़ी तादाद में हमारे बच्चे मौत के मुँह में समाते चले गए?  

अगर खराब सड़कों की वजह से मरीजों की मौत हुई है तो ख़राब सड़कें अभी तक राज्य में क्यों हैं? वसुंधरा राजे की सरकार ने अभी तक सड़कों का निर्माण क्यों नहीं कराया है? जब सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं तो विकास की सारी बातें बेमानी हो जाती हैं। 


राज्य सरकार ने यह भी कहा है कि अस्पतालों में सरकारी स्टाफ की बहुत कमी है। सरकार का यह भी मानना है कि लोगों में अशिक्षा की वजह से भी बच्चों की मौत हुई है।  ये तमाम कारण वैसे हैं जो राज्य सरकार के जिम्मे आते हैं। 

 

अशिक्षित समाज को शिक्षित करने की जिम्मेदारी आखिर राज्य सरकार के ऊपर ही तो है। कहते हैं कि शिक्षा के प्रचार और प्रसार के नाम सरकार अरबों रुपये खर्च कर रही है फिर भी अशिक्षा का रोना सामने आ रहा है। सरकार बनाते समय तो यह वादा नहीं किया गया था कि अशिक्षा के कारण बच्चों की मौत होती रहेगी। फिर अगर अस्पताल में मेडिकल स्टाफ की कमी है तो इसकी सज़ा जनता को क्यों दी जा रही है? सरकार को किसने रोका है कि स्टाफ की कमी को दूर नहीं करे। 

ऐसा नहीं है कि बच्चों की मौत की यह कहानी कोई पहली बार देखने को मिल रही है। अभी कुछ ही महीने पहले इसी तरह की कहानी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में भी देखने को मिली थी। और छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भी। 

सच्चाई तो यही है कि जब लूटतंत्र लोकतंत्र पर हावी हो जाए तो उस लोकतंत्र के मायने नहीं रह जाते। जनता को जान की हिफाजत, स्वास्थ्य, शिक्षा, भोजन, पानी और बिजली की ज़रूरत होती है। जो सरकार इन मूलभूत सुविधाओं को भी मुहैया नहीं करा सकती उसके होने और रहने का क्या औचित्य है?

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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