बाल विवाह, बलात्कार और सुप्रीम कोर्ट : कई सवालों का हल, कुछ अब भी अनुत्तरित

विशेष , ख़बर भी-नज़र भी, बृहस्पतिवार , 12-10-2017


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मुकुल सरल

नाबालिग पत्नी से यौन संबंध बनाना अब बलात्कार माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सुनने के बाद क्या आपके मन में कुछ सवाल उठे। हमारे भी उठे। एक साथी ने सबसे पहला सवाल पूछा कि जब बाल विवाह ही अवैध है तो फिर यह अलग से आदेश क्यों?

एक और सवाल उठा कि जब नाबालिग से यौन संबंध बनाना, चाहे उसकी सहमति हो या न हो, पहले से ही गैरकानूनी है तो फिर इस आदेश की क्या ज़रूरत थी? 

तीसरा सवाल उठा कि शादी के बाद होने वाले बलात्कार का क्या? मतलब शादी के बाद पत्नी की असहमति के बाद भी बनाए जाने यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में क्यों नहीं रखा गया, जबकि बाल विवाह में सहमति को भी बलात्कार माना जा रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट। साभार

 

  • अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
  • नाबालिग पत्नी से यौन संबंध बलात्कार माना जाएगा
  • बाल विवाह निषेध अधिनियम का विरोधाभास दूर

जानकारों से पूछने और इस फैसले को ध्यान से पढ़ने के बाद कुछ चीज़ें साफ हो गई हैं। 

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सबसे पहले जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया है। अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर बुधवार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने यह व्यवस्था दी कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म समझा जाएगा। इसलिए यह अपराध है और लड़की की शिकायत पर पुलिस पति पर रेप का केस दर्ज कर सकती है। 

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

धर्म-परंपरा के नाम पर बाल विवाह जारी

आपको मालूम है कि हमारे देश में बाल विवाह या नाबालिग का विवाह पहले से ही अपराध है। लेकिन यह आज भी जारी है। कभी धर्म के नाम पर, कभी परंपरा के नाम पर, कभी जबरन जानबूझ कर और कभी-कभी अनजाने में भी समाज में ऐसी शादियों का खूब चलन है।

कई राज्य जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल इत्यादि में तो यह काफी आम है। अक्षय तृतीया के दिन आपने यह खूब देखा और सुना होगा कि जगह जगह सामूहिक रूप से बाल विवाह किए गए और उनमें हमारे नेता और सरकार के मंत्री भी शामिल हुए।

इससे अलग एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कुछ लोग आज भी वोटर आईडी कार्ड बनवाने और शादी करने की उम्र में कनफ्यूज़ करते हैं। वोट के लिए बालिग या एडल्ट होने का मतलब है 18 साल का होना, जबकि शादी के लिए बालिग का अर्थ है लड़की की उम्र कम से कम 18 वर्ष और लड़के की उम्र 21 वर्ष हो। लड़का 18 साल में बालिग नहीं माना जाता है। इससे कम होने पर दोनों माइनर यानी नाबालिग में आते हैं, जिनका विवाह जुर्म है। 

कानून का विरोधाभास

लेकिन इसमें एक पेच था, एक विरोधाभास जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को नया फैसला देना पड़ा। जानकारों का कहना है कि आईपीसी की धारा 375 (2) कहती है कि 15 से 18 साल आयु वाली पत्नी से अगर पति संबंध बनाता है तो उसे बलात्कार नहीं माना जाएगा। यानी नाबालिग से विवाह अवैध होने के बाद भी इस दौरान बनाया गया संबंध वैध ही था। यही इस कानून का विरोधाभास था। यानी अगर नाबालिग पत्नी चाहे तो उसका विवाह रद्द तो किया जा सकता था लेकिन पति पर यौन संबंध बनाने के लिए बलात्कार का केस दर्ज नहीं कराया जा सकता था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अब यह संभव है।

 

 

  • नाबालिग पत्नी की सहमति से भी यौन संबंध अपराध
  • पति पर चलाया जा सकता है बलात्कार का मुकदमा
  • कुछ सवाल बाक़ी, वैवाहिक बलात्कार पर कोई फैसला नहीं
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अपवाद को दूर किया

सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 में से “15 वर्ष से कम नहीं” शब्दों को हटाकर “18 वर्ष से कम नहीं” शब्द रख दिए हैं। इसी बदलाव से अब 18 साल से कम की पत्नी से संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आ गया है। 

यह आदेश सभी धर्म, संप्रदाय और वर्गों पर समान रूप से लागू होगा।  और यहां यह भी समझ लीजिए कि यह नया आदेश सिर्फ जबरन या बिना सहमति के सेक्स संबंध बनाने पर लागू नहीं होता, बल्कि सहमति पर भी लागू होता है। जैसा हमने ऊपर कहा कि जब नाबालिग से यौन संबंध बनाना चाहे उसकी सहमति हो या न हो, पहले से ही अवैध है तो फिर इस नये आदेश से क्या ज़रूरत थी? तो उसका यही मतलब है क्योंकि विवाह के तहत पति यानी पुरुष को यह आज़ादी या संरक्षण मिला हुआ था कि वह पत्नी से संबंध स्थापित कर सकता है, उसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता था। जो अब हो सकता है। 

तो कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के नये आदेश ने बाल विवाह निषेध अधिनियम के विरोधाभास को दूर कर दिया है। बाल विवाह के खिलाफ हमारे देश में आज़ादी से भी पहले कानून  बन गया था। वर्ष 2006 में इसमें संशोधन हुआ लेकिन यह विरोधाभास बना रहा और लोग इसका नाज़ायज फायदा उठाते रहे। 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पति को संरक्षण देने वाला यह अपवाद संविधान के मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 14, 15 और 21 (बराबरी, जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी का अधिकार) के विरुद्ध है और पॉक्सो एक्ट (लैंगिक उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012) का उल्लंघन है। 

अभी कुछ सवाल बाक़ी

लेकिन कोर्ट के इतने सुधार के बाद भी इस कानून में कुछ कमियां अभी भी दिखाई दे रही हैं। जैसे कोर्ट ने कहा है कि नाबालिग को विवाह के एक साल के भीतर इस संबंध में शिकायत करनी होगी। सीआरपीसी की धारा 198 (6) के तहत 18 साल से कम की पत्नी की यौन शोषण की शिकायत पर तभी संज्ञान लिया जाएगा जब यह एक साल के भीतर हो। 

मैरिटल रेप

इसके अलावा तीसरा सवाल अभी अनुत्तरित है कि शादी के बाद होने वाले बलात्कार यानी मैरिटल रेप का क्या? मतलब शादी के बाद पत्नी की असहमति के बाद भी जबरन बनाए जाने यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में क्यों नहीं रखा गया। तो इस मामले में सरकार और कोर्ट दोनों दुविधा में हैं। कोर्ट ने नाबालिग के संबंध में फैसला देते हुए यह कहा भी कि इसे वैवाहिक रेप का मामला न समझा जाए। यह नाबालिगों की शादी पर लागू होगा। जबकि आज के समय में यह बहस तेज़ है और इसे लेकर महिला संगठन काफी समय से लड़ाई लड़ रहे हैं कि सामान्य विवाह के भीतर भी बिना सहमति के सेक्स को बलात्कार का दर्जा दिया जाए। आज लड़ाई इसी बात की है, कि “नो का मतलब नो” होना चाहिए। “नहीं यानी नहीं”। निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बनी जस्टिस जेएस वर्मा समिति ने 2013 में इसके लिए कानून में संशोधन की सिफारिश की थी। कई देशों में ऐसे कानून भी हैं, लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय में सरकार ने कहा था कि भारत में विवाह एक पवित्र संस्था है, जिसमें बनने वाले संबंधों को अगर बलात्कार की श्रेणी में रखा जाएगा तो यह संस्था ही टूट जाएगी। जबकि ऐसा नहीं है। इस तरह के कानून कई देशों में हैं और समाज उसका पालन भी कर रहा है। 

फिर भी स्वागत योग्य फैसला

हालांकि यह सब कानून, फैसले, आदेश तभी पूरी तरह लागू हो पाएंगे जब हमारा समाज महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा देगा। उसकी इच्छा का सम्मान करेगा। उसे देह से आगे एक मनुष्य माना जाएगा, तब ही यह बदलाव संभंव हैं, लेकिन फिर भी ऐसे आदेश और कानून बहुत ज़रूरी हैं क्योंकि अगर समाज खुद कोई बदलाव नहीं करता तो फिर न्यायपालिका या विधायिका को उसमें हस्तक्षेप करना ही चाहिए। यह हस्तक्षेप ही बड़े बदलाव का रास्ता तैयार कर सकते हैं। 










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