रेतीली परेशानी: दुनिया का अगला संसाधन संकट

मुद्दा , , शुक्रवार , 22-02-2019


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चंद्रभूषण

 

नई दिल्ली। अपने यहां लगभग रोज ही रेत-बजरी माफिया के कारनामों से जुड़ी खबरें पढ़ते-पढ़ते हम इसे छुटभैया अपराध तक सीमित एक मामला भर मान बैठे हैं। लेकिन रेत दिनोंदिन दुनिया के लिए एक बड़े संकट का सबब बनती जा रही है। अमेरिका जैसी विकसित अर्थव्यवस्था में भी रेत के उपभोग में सालाना 5 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा रही है। भारत और चीन जैसे विकासशील देशों का तो कोई हिसाब ही नहीं है कि यहां हर साल रेत की कितनी खपत होती है।

2013 के लिए जारी एक आंकड़े के मुताबिक उसी साल दुनिया ने इतना सारा कंक्रीट इस्तेमाल किया, जिससे पूरी भूमध्य रेखा पर 27 मीटर ऊंची और इतनी ही चौड़ी दीवार बनाई जा सकती थी। लेकिन रेत की तो पूरी दुनिया में इतनी भरमार दिखती है। रेतीले टीलों से भरे इतने बड़े-बड़े रेगिस्तान, जिनमें बड़े-बड़े मुल्क समा जाएं। फिर रेत के संकट जैसी किसी चीज की भला कल्पना ही कैसे की जा सकती है?

यहां यह बताना जरूरी है कि रेत की एक स्थापित परिभाषा है, जिसके ऊपर या नीचे की साइज वाली रेत से न तो कंक्रीट बनाया जा सकता है, न ही इसका इस्तेमाल प्लास्टर करने में किया जा सकता है। यह परिभाषा है, रेत के कणों का साइज 0.06 मिलीमीटर से लेकर 2 मिलीमीटर के बीच ही सीमित मानने की। मोटे तौर पर कहें तो सीमेंट के साथ इस सीमा के इधर-उधर पड़ने वाली रेत मिलाने का कोई फायदा नहीं है, क्योंकि इससे पकड़ ही नहीं आएगी।

रेगिस्तानी रेत जरूरत से ज्यादा पतली होती है, लिहाजा कॉन्स्ट्रक्शन से जुड़ी किसी भी कवायद के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। कम ही लोगों को पता होगा कि दुबई ही नहीं संयुक्त अरब अमीरात से लेकर सऊदी अरब तक के तमाम शहरों में खड़ी हो रही इतनी बड़ी-बड़ी इमारतों और लंबी-चौड़ी सीमेंटेड सड़कों के लिए रेत ऑस्ट्रेलिया से इंपोर्ट की जाती है, जिसके चलते वहां के कई शानदार बीच आज वीरान और बर्बाद हो चुके हैं।

रेत के संकट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी पिछले महीने विएतनाम के शहरी विकास मंत्री ने घोषणा की कि उनके देश में सन 2020 से रेत एक दुर्लभ कमोडिटी बन जाएगी। रेत की सबसे ज्यादा मारामारी इधर सिंगापुर में देखी गई है, जिसके चलते उसका कई पड़ोसी देशों के साथ झगड़ा भी हो चुका है। पिछले 40 वर्षों में उसने समुद्र में घुसकर अपना क्षेत्रफल 130 वर्ग किलोमीटर बढ़ा लिया है, जिसकी भराई के लिए सारी की सारी रेत उसने माफिया किस्म के उद्यमियों के जरिये विदेशों से आयातित की है।

संयुक्त राष्ट्र की पहल पर रेत के संरक्षण को अभी ग्लोबल चिंताओं में शामिल किया गया है, लेकिन इस संकट के वास्तविक रूप का आज भी किसी को अंदाजा नहीं है। यह तेल और पेयजल के संभावित संकट से भी कहीं ज्यादा बड़ा है, क्योंकि बड़े पैमाने पर रेत बनाने या उसका कोई विकल्प तैयार करने करने की कोई भौतिक या रासायनिक क्रिया अभी तक खोजी नहीं जा सकी है।

  (वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण के फेसबुक से साभार)

 








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