‘भयावह स्तर तक दकियानूस और घिनौने थे गोलवलकर के विचार’

आरएसएस और उसकी विचारधारा , , शुक्रवार , 18-08-2017


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अरुण माहेश्वरी

आरएसएस और उसकी विचारधारा की चौथी किस्त-

नारियों के प्रति

गोलवलकर की यह वर्णवादी, ब्राह्मणवादी दृष्टि कितने भयावह स्तर पर दकियानूस और घिनौनी थी, यह औरतों के बारे में, सन्तानोत्पत्ति के बारे में उनके विचारों को देखकर और भी ज्यादा पता चलता है। गुजरात विश्वविद्यालय में अपने एक भाषण में उन्होंने यहां तक कहा कि हमारे पुरखे यह साहसिक नियम बनाने में कितने बुद्धिमान थे कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली सन्तान एक नम्बूदिरी ब्राह्मण से ही उत्पन्न होनी चाहिए और उसके बाद ही वह अपने पति से सन्तान को जन्म दे सकती थी (एच.डी. मालवीय, की पुस्तक डैंजर ऑफ राइट रिएक्शन में उद्धृत, पृ. 33)

कुछ प्राचीन मठों की ऐसी कुछ घिनौनी प्रथाओं को वर्तमान काल में भी पुरखों की बुद्धिमत्ता बताकर कोई उनकी सराहना कर सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन गोलवलकर ने यह साहस किया था।

इन सारे प्रसंगों को गहराई से देखने पर पता चलता है कि गोलवलकर का उद्देश्य हमारे प्राचीन ग्रन्थों के दृष्टिकोण को रखना कतई नहीं था। उन्होंने ऐसी तमाम घिनौनी बातें हमारे प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, उपनिषदों, पुराणों के अध्ययन के आधार पर नहीं कही थी। इन सबसे उनका कोई लेना-देना नहीं था। वे वास्तव में हिटलर के विचारों का हुबहू भारतीय संस्करण तैयार करने में जुटे हुए थे। जर्मनी के नाजीकरण के दौरान हिटलर जिन तमाम बातों पर बल दिया करता था, गोलवलकर ने अपने विचारों में हूबहू उन्हीं विचारों को दोहराया भर है। उनकी अपनी चालाकी सिर्फ इतनी रही कि उन्होंने हिटलर का नाम लेकर उसी की बातों को उद्धृत करने के बजाय हमारे प्राचीन पुरखोंकी दुहाई दी।

सावरकर के साथ गोलवलकर।

हिटलर की नकल

नम्बूदिरी ब्राह्मण से हर विवाहिता स्त्री की पहली सन्तानकी घिनौनी बात पुरखों की बुद्धिमत्ता नहीं बल्कि नस्ल को सुधारनेके हिटलरी सिद्धान्त का भारतीय रूपान्तरण भर है। जो हिटलर किसी समय आर्यों के शुद्ध रक्त की बात करता था, उसी ने 1933 में जर्मनी की संसद राइखस्टाग पर अपना कब्जा जमाने के बाद स्त्रियों को सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन बना दिया, उन्हें सभी कल कारखानों, दफ्तरों से निकाल बाहर किया गया। नाजी पार्टी औरतों के बारे में कहती थी कि उन्हें स्वस्थ बेटों की स्वस्थ माताओं का रूप भर लेना चाहिए।नाजी शासन के सबसे प्रमाणिक इतिहासकार विलियम एल. शिरेर ने अपनी पुस्तक राईज एंड फाल ऑफ थर्ड राइखमें अपने निजी संस्मरणों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक से धिक अवसरों पर मैंने बीडीएम (नाजी पार्टी का नारी संगठन बुंड डूगर मेडेल, अर्थात् लीग ऑफ जर्मन मैडेंस - .मा.) की नारी नेत्री को हिटलर के जमाने में नारियों को बच्चा पैदा करने के नैतिक और देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य की याद दिलाते हुए नवयुवतियों के सामने यह भाषण देते हुए सुना कि आप किसी भी तरह बच्चा पैदा करें, भले विवाहित होकर या यदि जरूरी लगे तो अविवाहित रह कर भी। (पृ. 35)

हिटलर कहा करता था कि मुझे हृष्ट-पुष्ट सन्तानें दीजिए, मैं यह नहीं जानता कि उसका तरीका क्या हो। हिटलर नाजुक किस्म के लोगों के प्रति तिरस्कार और नफरत की भावनाएं जाहिर किया करता था।

शिरेर ने ही लिखा है कि प्रोफेसरों और बौद्धिक, अकादमिक जीवन के प्रति हिटलर ने ’’मीन कैम्फ‘ (हिटलर की आत्मकथा : मेरा संघर्ष-.मा.) में अपनी नफरत के जो अग्निबाण बरसाए हैं, उसने शिक्षा के बारे में उसके विचारों को तय कर दिया था।उसने लिखा था राष्ट्रीय राज्य द्वारा समूची शिक्षा का मुख्य लक्ष्य सिर्फ ज्ञान ठूसना नहीं होना चाहिए, बल्कि शरीर का निर्माण होना चाहिए जो कायिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए (वही, पृ. 343)

हेडगेवार और गोलवलकर।

गोलवलकर हिटलर की इसी बात का तर्जुमा करते हुए लिखते हैं : “अजेय शारीरिक बल पहली चीज है। हमें इतना मजबूत होना होगा कि दुनिया में कोई भी हम पर धिपत्य कायम कर सके। इसके लिए हमें बलिष्ठ और स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है। हमारे सभी अवतार ऐसे ही थे। हमारे पुराणों का कहना है ’’बल ही जीवन है, कमजोरी मृत्यु है (बंच ऑफ थाट्स, 1980, पृ. 65) यहीं पर वे विवेकानन्द की एक बात को भी जोड़ देते हैं। शास्त्रों का हवाला देते हैं : शररिमांगों खलु धर्मसाधानम्। (जीवन के प्रति अपने कर्तव्य के पालन में शरीर ही प्रमुख औजार है)

स्वयंसेवकों का पथ संचलन।

बुद्धिजीवियों के खिलाफ

कहने का तात्पर्य यह है कि हिटलर की तमाम बातों का भारतीय रूपान्तरण ही गोलवलकर और आरएसएस का मूलभूत दृष्टिकोण रहा है। आरएसएस ने हमेशा बुद्धिजीवियों के प्रति नफरत के सिवाय और कुछ जाहिर नहीं किया। वार के दिनों में यदि कोई उनके अखबार पांचजन्यऔर आर्गनाइजरको देखे तो पता चलेगा कि बुद्धिजीवियों, पत्राकारों के प्रति इनके अन्दर तिरस्कार की कितनी तीव्र भावनाएँ हैं। इस मामले में भी हिटलर ही हमेशा उनका गुरू रहा है। हिटलर जब जर्मनी का चांसलर बन गया, उसके साढ़े चार महीने बाद 10 मई, 1933 के दिन, बर्लिन विश्वविद्यालय के सामने अंटर डेन लिडैन चौक पर, हिटलर के तूफानी दस्ते की छात्राओं ने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय की सारी किताबों को निकालकर उसके विशाल ढेर में आग लगा दी थी। पुस्तकों की होली जलाने की ऐसी घटनाएँ उसी समय जर्मनी के अन्य कई शहरों में घटीं। इस प्रकार के पुस्तक दहन के बाद हिटलर के प्रचारमंत्री गोयेबल्स ने शान से कहा था : “जर्मन जनता की आत्मा अब फिर अपने को व्यक्त कर सकेगी। ये लपटें सिर्फ अन्तिम तौर पर पुराने युग की समाप्ति को ही प्रज्जवलित कर रही हैं, ये नए युग के आगमन को भी प्रकाशित करती हैं।‘ (शिरेर, पूर्वोक्त पृ. 333)

इस प्रकार पुस्तकों के दहन से जर्मन संस्कृति का नाजी युग प्रकाशित हुआ था। शिरेर ने बताया है कि नाजी काल में एक भी महत्त्वपूर्ण जर्मन लेखक की जर्मनी में कोई कृति प्रकाशित नहीं हुई थी। टामस मान के नेतृत्व में प्राय: सभी लेखक जर्मनी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हुए थे; जो थोड़े से रह गए वे या तो चुप रहे या चुप कर दिए गए।’’ (वही, पृ. 334)

संवोधित करते भागवत उनके पीछे तस्वीरों में पूर्व सरसंघचालक।

यहीं पर शिरेर ने एक अचरज की बात बताई है कि नाजी जर्मनी में शॉ (बर्नार्ड शॉ) के कुछ नाटकों को खेलने की अनुमति दी गई थी, शायद इसलिए कि उन्होंने अंग्रेजों का मजाक उड़ाया था और जनतंत्र पर व्यंग्य लिखे थे और शायद इसलिए भी उनकी (शॉ की) कुशाग्रता और उनके वामपंथी राजनीतिक विचारों को नाजी दिमाग पकड़ नहीं पाया था (वही, पृ. 335)

आश्चर्य की बात यह है कि नाजियों का अंधानुकरण करते हुए गोलवलकर ने भी जनतंत्र का मजाक उड़ाने के लिए बर्नार्ड शॉ की ही व्यंग्योक्ति का सहारा लिया है। (देखिए, बंच ऑफ थाट्स, पृ. 101)

 

 










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Udai :: - 04-17-2019
Good

G s :: - 04-09-2019
ये वही लोग हैं जो देवदासी बनाते थे ये वही लोग है न जो औरतों को मात्र मशीन समझते है बहुत घृणा आती है ऐसे सोच पर

:: - 08-28-2018

Bhanubhai.parmar. :: - 02-17-2018

Vithal waggan :: - 02-12-2018
Super

??????? :: - 11-09-2017
हर देश, संस्कृति और जनमानस के इतिहास में एक मिथक होता है, एक सुपर हीरो जैसी कथा जिसमें उनका नायक उनके आदर्शों पर चलकर उनकी विपरीत विचारधारा पर चलने वाले खलनायक के खिलाफ़ जीत हासिल कर आदर्श स्थापित करता है। जनतंत्रीय व मार्क्सवादियों के इतिहास ज़्यादा पुराना नही और इतने अल्पकाल में उनके लिए सिर्फ़ एक ही बड़ी जीत हासिल हुई है और वह है द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान फासीवादियों की पराजय । इसी का लाभ उठाते हुए जनतंत्रीय विचारधारा ने ब्रिटेन व उसके मित्र व उपनिवेशों में जबकि मार्क्सवादी विचारधारा ने रूस व उसके अधीनस्थों में फासीवाद का भय उपजाकर सत्ता हासिल की और राजसुख भोगा , शोषण भी किया और हिटलर को खलनायक रूप में गढ़ा और अब उसी मिथकीय खलनायक को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर थोपकर लोगों को फिर डराना चाहते हैं। नंबूदरी बहुत होशियार थे । उनके नियमों का उनके समय के अनुसार आकलन करना बेहतर रहेगा ।

Ajit kumar keshri :: - 11-05-2017
मैं अजित कुमार केशरी आज तक के इतिहास से जो जानकारी मिली है , कि जो लोग जितने ज्यादा शक्तिशाली है, राजा वही बना है, और अपने प्रजा को ऊंगली पे नचाया है, महिला को उपभोग की वस्तु का दर्जा क्रूर और ताकत वर तानाशाह की देन है, और कानून कमजोर के लिए बनाया जाता है, ताकतवर व्यक्ति के लिए धन दौलत बन्दूक सैनिक यही इसका कानून है, शासक सैकड़ो महिला से सेक्स करता है, आम आदमी सिर्फ एक से वो भी महिला के मर्जी के खिलाफ नही कर सकता है, आज भी वही हो रहा है सिर्फ नाम बदला है, काम वही है,

????? ????? :: - 11-05-2017
बहुत तथ्यपरक लेख है ,हिटलर की मेनकैम्फ पढी है ,लेकिन आपने हिटलर ओर गोलवर का जो तुलनात्मक विश्लेषण किया है वह महत्वपूर्ण है। मैं एक बात नही सभझपाती हूँ कि गोलवरकर विचारधारा भारत में एक ऐसे समय मे केसे स्थापित होगई जब भारत राजा राममोहन राय के ,मय से शुरु होकर यह सामाजिक आन्दोलन तेजी से विकास करते हुए गांधी युग मे प्रवेश कर चुका था ,इसके अतिरिक्त साम्यवादी दल ओर विचारधारा भी प्रगति पर थी।एसे समय फासिस्ट झंडा लेकर गोलवरकर ओर ,सावरकर जेसे लोग भारतीय राजनीति ओर ,समाज में जगह बनाने में केसे सफल हो गए।

Raj bhosale :: - 11-04-2017
Super this is a truth

Vinod kumar :: - 11-03-2017
I am reading it since 1982 in the libraries... It is exactly the same, what is given above.. Even after years of reading I do not know how to combat these evil words in the name of humanity.. May God Bring the Truth among us...

Prabhat Kumar Mishra :: - 08-19-2017
Certified facts which every indian should must .

Arvind Kumar :: - 08-19-2017
Good eye opener article

Dr sharad srivastava :: - 08-18-2017
तर्कसंगत ढंग से सिलसिलेवार तथ्यपरक लेखन है, भविष्य मे लोग संघ के विषय मे लिखते समय इसे संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल करना चाहेंगे ।

kk singh :: - 08-18-2017
गद्दारों और दलालों की यही फितरत है!

Neelam jain :: - 08-18-2017
नियोग प्रथा .....