‘आरएसएस की नजर में महिलाएं बच्चा पैदा करने की मशीन’

आरएसएस और उसकी विचारधारा , , सोमवार , 25-09-2017


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अरुण माहेश्वरी

(लड़कियों के उत्पीड़न की बीएचयू की दिल दहला देने वाली घटना के बाद महिलाओं के प्रति आरएसएस के नजरिये का मसला एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। इस लिहाज से ‘आरएसएस और उसकी विचारधारा’ के नाम से लिखी गयी वरिष्ठ लेखक अरुण माहेश्वरी की पुस्तक से बेहतर स्रोत कोई दूसरा नहीं हो सकता था। पेश है उसी का एक अंश-संपादक)

नारियों के प्रति

गोलवलकर की यह वर्णवादी, ब्राह्मणवादी दृष्टि कितने भयावह स्तर पर दकियानूस और घिनौनी थी, यह औरतों के बारे में, सन्तानोत्पत्ति संबंधी उनके विचारों को देखकर और भी ज्यादा पता चलता है। गुजरात विश्वविद्यालय में अपने एक भाषण में उन्होंने यहाँ तक कहा कि हमारे पुरखे यह साहसिक नियम बनाने में कितने बुद्धिमान थे कि किसी भी वर्ग की विवाहित महिला की पहली सन्तान एक नम्बूदिरि ब्राह्मण से ही उत्पन्न होनी चाहिए और उसके बाद ही वह अपने पति से सन्तान को जन्म दे सकती थी (एच.डी. मालवीय, की पुस्तक डैंजर ऑफ राइट रिएक्शन में उद्धृत, पृ. 33)

कुछ प्राचीन मठों की ऐसी कुछ घिनौनी प्रथाओं को वर्तमान काल में भी पुरखों की बुद्धिमत्ताबताकर कोई उनकी सराहना कर सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन गोलवलकर ने यह साहस किया था।

इन सारे प्रसंगों को गहराई से देखने पर पता चलता है कि गोलवलकर का उद्देश्य हमारे प्राचीन ग्रन्थों के दृष्टिकोण को रखना कतई नहीं था। उन्होंने ऐसी तमाम घिनौनी बातें हमारे प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, उपनिषदों, पुराणों के अध्ययन के आधार पर नहीं कही थी। इन सबसे उनका कोई लेना-देना नहीं था। वे वास्तव में हिटलर के विचारों का हुबहू भारतीय संस्करण तैयार करने में जुटे हुए थे। जर्मनी के नाजीकरण के दौरान हिटलर जिन तमाम बातों पर बल दिया करता था, गोलवलकर ने अपने विचारों में हूबहू उन्हीं विचारों को दोहराया भर है। उनकी अपनी चालाकी सिर्फ इतनी रही कि उन्होंने हिटलर का नाम लेकर उसी की बातों को उद्धृत करने के बजाय हमारे प्राचीन पुरखोंकी दुहाई दी।

हिटलर की नकल

नम्बूदिरी ब्राह्मण से हर विवाहिता स्त्री की पहली सन्तानकी घिनौनी बात पुरखों की बुद्धिमत्तानहीं बल्कि नस्ल को सुधारनेके हिटलरी सिद्धान्त का भारतीय रूपान्तरण भर है। जो हिटलर किसी समय आर्यों के शुद्ध रक्त की बात करता था, उसी ने 1933 में जर्मनी की संसद राइखस्टाग पर अपना कब्जा जमाने के बाद स्त्रियों को सिर्फ बच्चा पैदा करने की मशीन बना दिया, उन्हें सभी कल कारखानों, दफ्तरों से निकाल बाहर किया गया। नाजी पार्टी औरतों के बारे में कहती थी कि उन्हें स्वस्थ बेटों की स्वस्थ माताओं का रूप भर लेना चाहिए नाजी शासन के सबसे प्रमाणिक इतिहासकार विलियम एल. शिरेर ने अपनी पुस्तक द राईज एंड फाल ऑफ थर्ड राइखमें अपने निजी संस्मरणों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक से अधिक अवसरों पर मैंने बी डी एम (नाजी पार्टी का नारी संगठन बुंड डूगर मेडेल, अर्थात लीग ऑफ जर्मन मैडेंस अ.मा.) की नारी नेत्री को हिटलर के जमाने में नारियों को बच्चा पैदा करने के नैतिक और देशभक्तिपूर्ण कर्तव्य की याद दिलाते हुए नवयुवतियों के सामने यह भाषण देते हुए सुना कि आप किसी भी तरह बच्चा पैदा करें, भले विवाहित होकर या यदि जरूरी लगे तो अविवाहित रह कर भी। (पृ. 35)

हिटलर कहा करता था कि मुझे हृष्ट-पुष्ट सन्तानें दीजिए, मैं यह नहीं जानता कि उसका तरीका क्या हो। हिटलर नाजुक किस्म के लोगों के प्रति तिरस्कार और नफरत की भावनाएं जाहिर किया करता था। शिरेर ने ही लिखा है कि प्रोफेसरों और बौद्धिक, अकादमिक जीवन के प्रति हिटलर ने मीन कैम्फ’ (हिटलर की आत्मकथा: मेरा संघर्ष-अ.मा.) में अपनी नफरत के जो अग्निबाण बरसाए हैं, उसने शिक्षा के बारे में उसके विचारों को तय कर दिया था। उसने लिखा था राष्ट्रीय राज्य द्वारा समूची शिक्षा का मुख्य लक्ष्य सिर्फ ज्ञान ठूसना नहीं होना चाहिए, बल्कि शरीर का निर्माण होना चाहिए जो कायिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए (वही, पृ. 343)

आरएसएस की महिला शाखा में महिलाएं।

गोलवलकर हिटलर की इसी बात का तर्जुमा करते हुए लिखते हैं: अजेय शारीरिक बल पहली चीज है। हमें इतना मजबूत होना होगा कि दुनिया में कोई भी हम पर आधिपत्य न कायम कर सके। इसके लिए हमें बलिष्ठ और स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है। हमारे सभी अवतार ऐसे ही थे। हमारे पुराणों का कहना है- बल ही जीवन है, कमजोरी मृत्यु है’” (बंच ऑफ थाट्स, 1980, पृ. 65) यहीं पर वे विवेकानन्द की एक बात को भी जोड़ देते हैं। शास्त्रों का हवाला देते हैं: शररिमांध खलु धर्मसाधनम्। (जीवन के प्रति अपने कर्तव्य के पालन में शरीर ही प्रमुख औजार है।)

विधवा विवाह के खिलाफ

आरएसएस शुरू से समाज सुधार के तमाम प्रगतिशील कार्यों के कितना खिलाफ रहा है, इसका एक और उदाहरण विधवा विवाह के बारे में गोलवलकर के विचारों से भी मिलता है। गुजरात विश्वविद्यालय के जिस भाषण में उन्होंने नम्बूदिरि ब्राह्मण से पहली सन्तान प्राप्त करके नस्ल सुधारने की पुरखों की बुद्धिमत्ताका उदाहरण पेश किया था, उसी भाषण में विधवा विवाह के बारे में उन्होंने कहा: हमारे पुराणों में कहा गया है कि दूसरे की पत्नी हमारी माँ के समान होती है। लेकिन यदि कोई स्त्री अपने पति को छोड़ दे या उसके पति की मृत्यु हो जाए, तो आज का कानून ऐसी दूसरे की पत्नी के साथ विवाह करने की अनुमति देता है (एच.डी. मालवीय पूर्वोक्त, पृ. 33)

आज भाजपा के लोग कहते हैं कि शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट की राय को बदल कर मुस्लिम महिलाओं से उनके न्यायिक हक को छीनकर भारत सरकार ने मुसलमानों का तुष्टीकरण किया है। महिलाओं के अधिकारों के बारे में गोलवलकर के विचारों की रोशनी में यदि हम भाजपाइयों के इस तर्क को देखें तो इस प्रकार के तुष्टीकरणकी उनकी सारी बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। आरएसएस की मूलभूत नीति, महिलाओं को तमाम जनतांत्रिक अधिकारों से वंचित करके उन्हें सिर्फ सबलशिशुओं के उत्पादन की मशीन बना देना रही है, इसीलिए शायद वे मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं से उनके अधिकारों को छीनकर मुस्लिम समाज के हितों को साधा गया है! भारत सरकार ने शाहबानो मामले में इस्लामिक तत्ववादियों के सामने घुटने टेक दिए थे, लेकिन इसका विरोध करने वाली भाजपा महिलाओं के अधिकारों के बारे में क्या सोचती है, गोलवलकर की बातों से साफ हो जाता है।

राष्ट्र सेविका समिति का एक आयोजन।

यदि भारत में कभी संघी शासन कायम हुआ तो वे जनतंत्र का ही सिर्फ गला नहीं घोटेंगे, वर्ण व्यवस्था को पूरी निर्ममता से लागू करेंगे, महिलाओं को अधिकार शून्य, ताड़न के अधिकारी ढोलऔर पशुकी श्रेणी में उतार देंगे; अल्पसंख्यकों के साथ वही सलूक करेंगे जो हिटलर ने यहूदियों के साथ किया। यहाँ यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिटलर की प्रेरणा से गोलवलकर ने राष्ट्रवादियों के साथ ही कम्युनिस्टों को भी हमेशा अपने हमले का प्रमुख लक्ष्य बनाया था।

गोलवलकर की नजरों में हिन्दू समाज की कमजोरी वर्ण, जाति, अशिक्षा तथा नारियों आदि के बारे में सामाजिक कुरीतियों में निहित नहीं है। इस कमजोरी का मूल कारण वे मानते हैं सदियों से हिन्दुओं में राष्ट्रीयता की भावना का सुप्त हो जाना। उनके अनुसार यह राष्ट्रीयता की भावना प्रागैतिहासिक, वैदिक काल में जीवित थी। बाद में इसे 16वीं, 17वीं शताब्दी में शिवाजी आदि ने फिर से जागृत किया, लेकिन इसे फिर ब्रिटिश हमलावरों ने दबा दिया। वे कहते हैं कि चूँकि अंग्रेज हिन्दुस्तान की अन्दरूनी शक्ति से परिचित थे, इसीलिए उन्होंने सुनियोजित ढंग से हिन्दुओं को कलंकित करने का काम शुरू कर दिया। उन्हीं के प्रभाव में कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने हिन्दुस्तान में वर्ण व्यवस्था, छुआ-छूत, नारियों की स्थिति आदि के बारे में सवाल उठाने शुरू कर दिए।

गोलवलकर के शब्दों में: जो व्यक्ति हिन्दुओं को कलंकित करना चाहते हैं, वे वर्ण व्यवस्था के बारे में, अन्धविश्वासों, शिक्षा की आवश्यकता, सामाजिक ढाँचे में नारियों की दशा पर ज्यादा शोर मचाया करते हैं (गोलवलकर, वी आर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, पृ. 61) वे ऐसे समाज सुधारवादी लोगों में राष्ट्रीयता का क्षयहुआ मानते थे (वही, पृ. 6)

प्रतीकात्मक चित्र।

गोलवलकर की इस कसौटी पर ही सती प्रथा विरोधी राममोहन राय, विधवा विवाह के पक्षधर, बालविवाह के विरोधी ईश्वरचन्द विद्यासागर तथा छुआछूत के विरोधी, हरिजनों तथा नारियों को स्वतंत्रता आन्दोलन में उतारने वाले महात्मा गांधी राष्ट्रवादी नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के पतन के प्रतीक थे। यही कारण है कि आरएसएस कभी राममोहन राय, विद्यासागर और गांधी जी को सम्मान के साथ स्मरण नहीं करता। विवेकानन्द ने भी शूद्रों के जागरण का जो आह्वान किया, आरएसएस कभी उसकी चर्चा नहीं करता।

अब हम इनके अलग-अलग संगठनों की विशिष्टताओं पर आते हैं।

आरएसएस के अन्य संगठनों की गतिविधियों का जहाँ तक प्रश्न है, आजादी के पहले तक तो उसने सिर्फ एक राष्ट्र सेविका समिति का गठन किया था। कहने के लिए तो हेडगेवार ने 1936 में ही इसे बना दिया था, लेकिन आजादी के वक्त तक इसकी गतिविधियों के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। डॉ. सुरेश चन्द्र वाजपेयी ने 1936 से 1946 के काल को इस संगठन की ’’प्रारम्भिक अवस्था’’ बता कर सिर्फ इतना लिखा है कि ’’इसका आयतन बड़ा हो गया। किन्तु यह महाराष्ट्र के बाहर नहीं जा पाया।’’ (वाजपेयी, पूर्वोक्त, पृ. 9-10)

इस सन्दर्भ में गंगाधर इन्दूरकर की पुस्तक ’’राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अतीत और वर्तमान’’ में उल्लेखित कुछ तथ्य काफी महत्त्वपूर्ण हैं। इन्दूरकर खुद एक कट्टर साम्प्रदायिक तथा आरएसएस के व्यक्ति हैं। गांधी जी की हत्या के बाद जेल में बन्द किए जाने वालों में वे भी शामिल थे। वे आरएसएस के नागपुर स्थित सदर दफ्तर में काम करते थे तथा उसके प्रचार विभाग का मुख्य दायित्व सँभाले हुए थे। गोलवलकर की पहली जीवनी उन्होंने ही लिखी थी तथा आरएसएस की न्यूज एजेन्सी ’’हिन्दुस्तान समाचार’’ की स्थापना करने वालों में एक थे। 1950 में नागपुर में संघ के कुछ अधिकारियों से न पटने और गुरुजी की नजरों से गिर जाने के कारण उन्हें आरएसएस को छोड़ देना पड़ा, लेकिन आरएसएस के साम्प्रदायिक दर्शन से उनका कभी कोई विरोध नहीं रहा। उनके दिमाग में सिर्फ एक सवाल पैदा हुआ था कि अपनी तमाम प्रकार की गतिविधियों के बावजूद क्यों नहीं ’’संघ की छाप समाज के जीवन पर पड़ती है।’’ इस अकेली शंका को व्यक्त कर देने के कारण ही आरएसएस के अन्दर उन्हें हिकारत से देखा जाने लगा और उन्हें निकाल दिया गया। यह है आरएसएस के अन्दर की स्थिति। इस प्रकार के फासिस्ट संगठन के अन्दर इसी प्रकार की मानसिकता का राज होता है। इन्दूरकर के शब्दों में ’’जब तक कोई कार्यकर्ता संघ की चैखट में है, उसे हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर बैठाने का प्रयत्न होता है। पर उस चैखट से दूर होते ही बोलते समय उसे गहरी-से-गहरी खाई में धकेल देने का प्रयत्न होता था।’’ (पृ. 21) इसके बावजूद इन्दूरकर ने यह पुस्तक खुद को ’’संघ का निष्ठावान स्वयंसेवक’’ मानते हुए ही लिखी है।

हेडगेवार और गोलवलकर।

इस पुस्तक में इन्दूरकर ने आरएसएस द्वारा अपने बारे में हमेशा दोहराई जानेवाली अनेक झूठ-सच बातों को पूरी तरह सच मानते हुए लिख दिया है। फिर भी अनायास ही उनके जरिए आरएसएस के कुछ अँधेरे कोनों पर रोशनी गिर गई है। इसी प्रकार का एक कोना है राष्ट्रीय सेविका समिति।

हेडगेवार आरएसएस के स्वयंसेवकों के चारित्रिक स्तर को बनाए रखने के लिए ब्रह्मचर्य के पालन पर जोर दिया करते थे। उस वक्त के राष्ट्रीय आन्दोलन में यह प्रवृत्ति आमतौर पर पाई जाती थी। यही वजह थी कि हेडगेवार को महिलाओं का संगठन बनाने का विचार जँच नहीं रहा था। इन्दूरकर के शब्दों में: ’’भारतीय पारम्परिक मान्यता है कि स्त्री और पुरुष में सम्बन्ध मक्खन और आग जैसे होते हैं। दोनों अधिक निकट आने पर एक दूसरे की ओर आकर्षित होंगे ही। उसका फल भी निकलेगा। यदि आप चाहते हैं कि वह फल या परिणाम न निकले तो एक ही उपाय है, दोनों के बीच दूरी बनाए रखना। डॉक्टर जी ने शुरू में बाल और युवकों को एकत्रित किया। उनका ध्यान किसी दूसरी ओर न जाए इसलिए उन्होंने संघ में लड़कियों को, युवतियों को, महिलाओं को प्रवेश न देने का निर्णय किया।’’

’’श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर उर्फ मौसी जी ने एक बार वहाँ डॉक्टर जी से पूछा: क्या देश के लिए स्त्रियों का संगठन आवश्यक नहीं हैये मौसी जी ही आगे चलकर राष्ट्रसेविका समिति की संचालिका बनीं। डॉक्टर साहब ने साफ बात की। उन्होंने कहा: संगठन आवश्यक है। पर वह काम मैं नहीं कर सकूँगा। आप कीजिए। कुछ समय तक आवश्यक सहायता हम आपको देंगे। पर दोनों संस्थाएँ एक नहीं हो सकतीं।’’ (गंगाधर इन्दूरकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अतीत और वर्तमान, पृ. 110-111)

जिस राष्ट्रीय सेविका समिति के प्रति हेडगेवार का यह दृष्टिकोण था, आरएसएस के अन्तर्गत उसके पनपने और फैलने का प्रश्न ही क्या थास्त्रियों के प्रति आरएसएस के नेताओं का दकियानूसी ब्राह्मणवादी संस्कार इतना प्रबल था कि बाद के दिनों में भी आरएसएस ने अन्य कई संगठन बनाकर उनके विस्तार पर तो यथेष्ट ध्यान दिया लेकिन राष्ट्र सेविका समिति सबसे ज्यादा उपेक्षित रहा। 1936 में गठित होने के बावजूद 1990 में आकर इसकी कुछ चुनी हुई ’’सेविकाओं’’ को आरएसएस की भारतीय प्रतिनिधि सभा में भाग लेने की अनुमति मिली।

 

 

 

 

 










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