सवर्ण आरक्षण के जरिये मोदी सरकार कर रही है मनुवाद और पूंजी के मालिकों की सेवा

मुद्दा , पटना/भागलपुर, सोमवार , 14-01-2019


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जनचौक ब्यूरो

पटना/भागलपुर। सवर्ण आरक्षण और संविधान संशोधन के खिलाफ आहुत तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद के तहत आज पटना के कारगिल चौक पर सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के बैनर तले विरोध प्रदर्शन हुआ।

इस मौके पर नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार की कोर कमिटी सदस्य हरिकेश्वर राम ने कहा कि सवर्ण आरक्षण शासन-सत्ता की संस्थाओं व विभिन्न क्षेत्रों में सवर्णों के वर्चस्व को मजबूत करेगा, दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों की भागीदारी को कमजोर करेगा। इससे लोकतंत्र कमजोर होगा। दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों की वंचना बढ़ेगी। इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

रिंकू यादव और बाल्मीकि प्रसाद ने कहा कि सवर्णों सहित समाज के भीतर मौजूद गरीबी-बेरोजगारी का समाधान आरक्षण के जरिए नहीं हो सकता है। गरीबी-बेरोजगारी के सवालों का जवाब पूंजी की लूट और पूंजीपतिपरस्त नीतियों पर लगाम लगाकर ही हो सकता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार अंबानी-अडानी की लूट और पूंजी की लूट बढ़ाने वाली नीतियों को ढंककर संविधान व सामाजिक न्याय पर हमला कर रही है। 

अब-सब मोर्चा के अध्यक्ष विष्णुदेव मोची और सामाजिक न्याय आंदोलन के गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि सवर्ण आरक्षण के जरिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने मनुवाद को मजबूत बनाने का काम किया है। मनुवाद मजबूत होगा तो दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों व महिलाओं के साथ अन्याय व जुल्म बढ़ेगा।

सामाजिक न्याय आंदोलन के अंजनी विशु और जमशेद आलम ने कहा कि सवर्ण आरक्षण के जरिए संविधान को प्रतिगामी दिशा में बदला गया है। सामाजिक न्याय की अवधारणा पर चोट की गई है। बहुजनों के आरक्षण को खत्म करने का रास्ता बनाया गया है। अंत में इंजीनियर केदार पासवान ने आंदोलन को तेज करने और 24 जनवरी को पटना के गर्दनीबाग में आहुत महापंचायत में भारी जुटान का आह्वान किया।

इसके पहले विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की ओर से जारी अपील में कहा गया था कि आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण के जरिये संविधान, सामाजिक न्याय व बहुजनों पर बड़ा हमला बोला गया है। सवर्ण आरक्षण को लागू करने और संविधान संशोधन के जरिए संविधान की मूल संरचना व वैचारिक आधार पर हमला है। सामाजिक न्याय व आरक्षण की अवधारणा को निशाने पर लिया गया है। यह खतरनाक है। इससे दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों के आरक्षण के खात्मे का रास्ता खुल गया है। संविधान व सामाजिक न्याय पर इस दौर के इस बड़े हमले को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।

इसमें कहा गया था कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने आरएसएस  के संविधान बदलने की योजना के एक पैकेज को अमलीजामा पहनाया है। आरएसएस का संविधान व आरक्षण से नफरत जगजाहिर है। 

आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, न ही रोजगार की गारंटी से जुड़ा मामला है। यह तो ऐतिहासिक वंचना के शिकार समाज के दलित-पिछड़े हिस्सों के सत्ता व शासन की संस्थाओं में प्रतिनिधित्व-भागीदारी की गारंटी से जुड़ा हुआ है। आज भी आंकड़े कह रहे हैं कि आबादी के अनुपात में सत्ता व शासन की संस्थाओं-विभिन्न क्षेत्रों में दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों का प्रतिनिधित्व काफी कम है। केन्द्र सरकार की ग्रुप ए की नौकरियों में सवर्ण- 74.48%, OBC-8.37%, SC-12.06% हैं। अभी भी शासन-सत्ता की विभिन्न संस्थाओं व विभिन्न क्षेत्रों में सवर्णों की मौजूदगी आबादी के अनुपात में कई गुणा ज्यादा है। होना तो ये चाहिए कि दलितों-आदिवासियों-अतिपिछड़ों व पिछड़ों की संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व की गारंटी के लिए आरक्षण की सीमा 50% से बढ़ाई जाती। जिन संस्थाओं व क्षेत्रों में आरक्षण लागू नहीं है,वहां लागू किया जाता।

लेकिन सरकार ने संविधान व सामाजिक न्याय पर हमला बोलते हुए उल्टी दिशा में काम किया है। विभिन्न संस्थाओं व क्षेत्रों में सवर्णों का वर्चस्व कायम रहने व बढ़ने की गारंटी की है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था व राष्ट्र निर्माण के लिए घातक है।

सवर्णों सहित समाज के अन्य हिस्सों से गरीबी दूर करने के लिए आरक्षण समाधान नहीं है। आरक्षण आर्थिक विषमता मिटाने का एजेंडा नहीं है। गरीबी व बेरोजगारी जैसी समस्याओं के समाधान के लिए देशी-विदेशी पूंजी की बढ़ती लूट पर अंकुश लगाना होगा। बहुसंख्यकों के लिए गरीबी और बेरोजगारी पैदा करने और मुट्ठीभर अमीरों की तिजोरी भरने वाली नयी आर्थिक नीति को बदलना होगा। लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार ने सवर्णों की गरीबी के बहाने संविधान पर हमला किया है और इसके जिम्मेवार लुटेरे देशी-विदेशी पूंजी और उसके पक्ष में चलने वाली खूंखार नीतियों को बचाने का काम किया है। 

कुल मिलाकर आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण के जरिये नरेन्द्र मोदी सरकार ने मनुविधान थोपने, सवर्ण वर्चस्व को मजबूत करने और लुटेरे पूंजीपतियों की सेवा की है। 

इस मसले पर सत्ता और विपक्ष की दूरी मिटती हुई नजर आयी। सामाजिक न्याय के नाम पर चलने वाली रंग-बिरंगी राजनीति भी बेनकाब हो गई। ऐसे शर्मनाक दौर में उम्मीद केवल आम-अवाम व प्रगतिशील नागरिकों-बुद्धिजीवियों से बनती है। संविधान, सामाजिक न्याय व लोकतंत्र को बचाने की ऐतिहासिक जिम्मेवारी के साथ हमें सड़कों पर आना ही होगा!










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