इमरजेंसी मे लोकतंत्र खतरे में था, मोदी राज में सभ्यता: प्रशांत भूषण

कार्यक्रम , लखनऊ, शनिवार , 16-12-2017


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जनचौक ब्यूरो

लखनऊ। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा है कि मोदी सरकार हर संवैधानिक संस्था को जर्जर करने पर तुली है। हर तरफ डर और दहशत का माहौल बनाया जा रहा है, ऐसा आपातकाल में भी नहीं हुआ था। इमरजेंसी के दौरान सिर्फ लोकतंत्र खतरे में था लेकिन इस सरकार में सभ्यता ही खतरे में पड़ गई है। सरकार के समर्थन से हत्यारे गिरोहों को छुट्टा छोड़ दिया गया है जो लोगों को सिर्फ निर्ममता से कत्ल ही नहीं करते उसका वीडियो भी प्रसारित करते रहते हैं जिसे पसंद करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इस अपराध में सोशल मीडिया का इस्तेमाल हो रहा है और इसके संचालकों के साथ खुद मोदी फोटो खिंचवाते हैं। हत्यारों का इतना महिमा मंडन हमारी सभ्यता में पहले कभी नहीं हुआ था। प्रशांत भूषण ने ये बातें रिहाई मंच के स्थापना के 10 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित एक सेमिनार में कही। सेमिनार का विषय ‘न्यायिक भ्रष्टाचार और लोकतंत्र’ था।

प्रशांत भूषण ने कहा कि हमारी न्याय पालिका हो या जांच एजेंसी सबको अपना पिट्ठू बनाने का प्रयास चल रहा है। कई बन चुके हैं कुछ बन रहे है। सहारा- बिड़ला प्रकरण में जिनका नाम आता है वह सीवीसी के मेंबर बनाए जाते हैं। एक दूसरे व्यक्ति हैं जिन पर बैंक के एक अफसर की गोपनीय रिपोर्ट लीक करने का आरोप है। यह दोनों मोदी-शाह के आदमी हैं। राकेश अस्थाना प्रकरण में हम सब जानते हैं कि किस तरह से उन्हें आपत्तियों के बावजूद सीबीआई में लाया गया। इलेक्शन कमीशन के हेड गुजरात के मुख्य सचिव रह चुके हैं।

कार्यक्रम में मौजूद श्रोता।

गुजरात में पेट्ररोलियम विभाग का चेयरमैन भी मोदी सरकार ने अपने एक चहेते को बना दिया और अपनी चहेती कंपनियों को गैस खोदने का आवंटन दे दिया। जिसमें फर्जी तरीके से आम जनता का पैसा डुबो दिया गया। यह घोटाला 20 हजार करोड़ का था। सबसे अहम बात ये थी कि इस खुदाई में गैस ही नहीं निकली। दस साल पहले ईवीएम पर वीपैट का आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने दिया था। अब इलेक्शन कमीशन कह रहा है कि हम केवल एक विधानसभा की वीपैट को जांचेंगे। जिस कम्पनी को चिप बनाने का ठेका मिला है उन पर भाजपा से जुड़े होने का आरोप है। यह सब शंका पैदा करती है। अब सर्वोच्च न्यायालय खुद इस पर आदेश करने से मना कर रहा है। 

संविधान में सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ दो लोगों के बीच विवाद निपटाने की संस्था नहीं है। उस पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की भी जिम्मेदारी है। सरकार अगर अपना दायित्व नहीं निभा रही है तब न्यायपालिका की जिम्मेदारी आती है। लेकिन आज अदालतें जवाबदेही से भी स्वतंत्रता चाहती हैं। आज कुछ न्यायाधीश ऐसी धारणा रखने लगे हैं कि वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता का मतलब है सरकार से स्वतंत्रता ताकि आप उस पर निगरानी रख सकें। न्यायपालिका के भ्रष्टाचार को अगर नहीं रोका गया तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खत्म हो जाएगी। 

प्रशांत भूषण ने कहा कि मेडिकल कालेज के प्रसाद एजूकेशन ट्रस्ट कालेज मामले में सीबीआई केस के संदर्भ में न्यायिक भ्रष्टाचार को समझा जा सकता है। ये पूरा मामला पब्लिक डोमेन में है। इस मामले में सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश भी शामिल हैं। जिसमें जजों की तरफ से तीन करोड़ रुपए फैसले के लिए मांगे गए थे। इस मामले में 2 करोड़ रुपए भी छापेमारी के दौरान पकड़े जा चुके हैं। सीबीआई की एफआईआर से पता चलता है कि इसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। अगर सीबीआई इसकी जांच करती है तब वह न्यायाधीश को ब्लैकमेल कर सकती है जो अब दिखने भी लगा है। इसीलिए हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट गए और एसआईटी जांच की मांग की। उस समय मुख्य न्यायधीश कोर्ट में बैठे थे उन्होंने संविधान पीठ का गठन किया और खुद उसके अध्यक्ष बने जिसमें पांच में से तीन सदस्य ऐसे थे जो उसी केस में शामिल थे। बाद में हमारी याचिका को ही खारिज कर दिया गया और हम पर 25 लाख जुर्माना लगाया गया। क्या सर्वोच्च अदालत यह चाहती है कि सीबीआई जजों की जांच करे? आखिर उसे जजों की निगरानी में इसकी जांच से क्या समस्या है? अब सर्वोच्च अदालत और हाईकोर्ट में कितनी निष्पक्षता है आप समझ सकते हैं। सरकार बेईमान जज चाहती है ताकि वह उन्हें ब्लैकमेल कर सके। न्यायाधीशों के खिलाफ होने वाली शिकायतों पर स्वतंत्र जांच आयोग होना चाहिए।

अदालत की अवमानना के दुरुपयोग के मामलों में बहुत बढ़ोतरी हो गई है। कुछ जज खुद को शहंशाह समझने लगे हैं, वे किसी भी सवाल का जवाब देना उचित नहीं समझते। न्यायपालिका में बहुत भ्रष्टाचार है लेकिन उसके निवारण का कोई तरीका नहीं है।  

जजों की नियुक्ति में पहले कानून की समझ के बजाए कानून मंत्री से पहचान जरूरी समझा जाता था लेकिन अब चीफ जस्टिस से पहचान ही मुख्य योग्यता है। अब ये किसी को भी सेलेक्ट कर लेते हैं। इस नियुक्ति में कोई पारदर्शिता नहीं है। हम सरकार से एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग की मांग हमेशा से करते रहे हैं। 

प्रशांत भूषण ने कहा कि हमारा न्यायिक तंत्र देश के एक प्रतिशत लोगों को भी न्याय नहीं दे सकता। लॉ कमीशन की रिपोर्ट पिछले 25 साल से पड़ी है। सरकार नहीं चाहती कि न्यायिक व्यवस्था दुरुस्त हो। अब तो रिटायर्ड जज भी करोड़ों कमा रहे हैं। यह धंधा तब तक खत्म नहीं होगा जब तक कि न्यायिक सुधार नहीं होते। जनता ही इसे सुधार सकती है। इसके लिए आंदोलन करना होगा।

रिहाई मंच अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब ने कहा कि न्यायिक भ्रष्टाचार का सीधा सम्बंध राजनीतिक भ्रष्टाचार से है। इसलिए राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने वालों को न्यायिक भ्रष्टाचार के खिलाफ भी बोलना होगा। ये दोनों ही एक दूसरे को बचाने का काम करते हैं। इसीलिए रिहाई मंच आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के सवाल को अदालत और सड़क दोनों जगह लड़ता है।

 










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ShishRam Kanswal :: - 12-16-2017
न्यायपालिका पर विस्वास उठ रहा है।