स्वामी अग्निवेश पर हमला: आलोचनाओं को कुचलने की साजिश

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 19-07-2018


swamy-agnivesh-bjp-attack-tribal-adivasi

मनोज भक्त

एक ओर रघुवर दास ने स्वामी अग्निवेश पर हमले की जांच और दोषियों की गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं, दूसरी ओर, रघुवर सरकार के नगर विकास मंत्री सी पी सिंह ने स्वामी अग्निवेश को विदेशी दलाल और उन पर हमले को आत्मप्रचार का स्टंट कहा है। मामले की जांच-पड़ताल का क्या हश्र हो सकता है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। भाजपा की ओर से इस हमले को न्यायसंगत ठहराने के लिए स्वामी अग्निवेश को ईसाइयों के समर्थक के रूप में भी पेश किया जा रहा है। स्थानीय भाजपा नेताओं के तात्कालिक वक्तव्यों के अनुसार यह हमला अग्निवेश द्वारा गौमांस और धर्म-परिवर्तन पर रोक के खिलाफ उनके वक्तव्यों के जबाब में किया गया। वे आरोप लगा रहे हैं कि स्वामी अग्निवेश भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाने आए थे। स्वामी अग्निवेश पर हमले के दिन ही सर्वोच्च न्यायालय ने भीड़-हिंसा से संबंधित कड़े निर्देश राज्य और केंद्र सरकारों को दिया है और भीड़-हत्याओं के लिए इन्हें जिम्मेवार ठहराया है। भाजपा सरकारें किस कदर इन निर्देशों का तिरस्कार करती हैं, रघुवर सरकार के दोहरेपन से यह साफ है।

18 जुलाई को भाजपा के युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् द्वारा स्वामी अग्निवेश पर हमला सार्वजनिक रूप से घोषित कार्यक्रम था और प्रशासन इससे अनजान नहीं था। स्वामी अग्निवेश अखिल भारतीय आदिम जनजाति विकास समिति द्वारा दामिन-इ-कोह (पर्वतांचल) की 195वीं बरसी पर लिट्टीपाड़ा में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे। 1823 में अंग्रेज हुकूमत ने राजमहल पहाड़ियों और इनके इर्द-गिर्द अंचलों को दामिन-इ-कोह के नाम से आदिवासियों के लिए भू-स्वायत्तता की घोषणा की थी।

इस कार्यक्रम में भाग लेने से पहले ही भाजपा के उपद्रवियों ने उन पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। स्वामी अग्निवेश ने प्रशासन पर जानबूझ कर उनकी सुरक्षा की अनदेखी की बात कही है। अखिल भारतीय आदिम जनजाति विकास समिति के अध्यक्ष माल्टा के अनुसार भी स्वामी अग्निवेश के कार्यक्रम की सूचना पुलिस-प्रशासन को दी गयी थी। प्रशासन माल्टा की सूचना से इंकार कर रहा है। 

स्वामी अग्निवेश की पहचान बंधुआ मुक्ति आंदोलन के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में है। वे आदिवासी आंदोलन से भी लगातार जुड़े रहे हैं। नब्बे के दशक पलामु (झारखंड) में जमींदारों के खिलाफ आंदोलन जोरों पर था। अग्निवेश बंधुआ मुक्ति आंदोलनकारी के बतौर इस सामंतवाद विरोधी आंदोलन के हिस्सेदार थे। 1977 में अग्निवेश हरियाणा में विधायक चुने गये थे और वे वहां कैबिनेट मंत्री के बतौर भी सरकार में शामिल हुए। फिर भी, आज के दौर में उनकी पहचान किसी दलीय राजनीति से नहीं है। वे अपने वक्तव्यों में मोदी सरकार की नीतियों और गतिविधियों की आलोचना करते रहे हैं। 

भाजपा सरकारें आलोचना की आंच नहीं बर्दाश्त कर पाती हैं। वे इसे कुचलने के लिए भीड़-हिंसा और सरकारी तंत्रों का खुलेआम इस्तेमाल करती हैं। झारखंड में रघुवर सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों की वजह से तीखे जनप्रतिवादों के सामने खड़ी है। इन प्रतिवादों को कमजोर करने के लिए इसने अभी हाल में धर्म-परिवर्तन कानून लाकर ईसाई आदिवासियों को अपना निशाना बनाया है। मुख्यमंत्री ने इसी माह ईसाई दलित-आदिवासियों के आरक्षण को खत्म करने की भी धमकी दी है।

भाजपा पहले से ही आदिवासियों के बीच ईसाई बनाम सरना दरार पैदा करने में लगी हुई है। स्वामी अग्निवेश पहाड़िया (सौरिया) समुदाय के कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे। इस समुदाय की कुल आबादी झारखंड में पचास हजार से भी कम है। यह समुदाय आदिम जनजाति में होने के बावजूद राज्य सरकार की निर्मम उपेक्षा का शिकार है। स्वामी अग्निवेश की शिरकत से भाजपा सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियां उजागर होतीं। झारखंड में भाजपा द्वारा असहमतियों को कुचलने और भीड़-हिंसा को समर्थन देने के कई उदाहरण हैं।

रामगढ़ मॉब-लिंचिंग में मारे गये अलीमुद्दीन के हत्यारों का जमानत पर जेल से निकलने पर केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने माला पहना कर स्वागत किया। पिछले माह गोड्डा में दो लोग भीड़ हिंसा के शिकार होकर मारे गये। गोड्डा से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने घोषणा की है कि हत्या के आरोपियों का कानूनी खर्च वे वहन करेंगे। विनोबा भावे विश्वविद्यालय अंतर्गत गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह के प्राचार्य और जनवादी लेखक संघ के झारखंड राज्य अध्यक्ष इमाम अली के खिलाफ पिछले साल उपकुलपति की मौजूदगी में हमला करने की कोशिश की गयी थी।

भोजपुरी और हिंदी के साहित्यकार व प्राध्यापक डॉ बलभद्र एवं नीतेश कुमार पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के हुड़दंगियों इस साल 10 जनवरी को गिरिडीह में हमला किया था। नीतेश कुमार के घर में तोड़-फोड़ भी की गयी थी। एबीवीपी के हुड़दंगियों ने चेतावनी दी थी कि वे कॉलेज को जेएनयू नहीं बनने देंगे। इसी वर्ष हजारीबाग में कोचिंग के एक प्रतिष्ठित अध्यापक रामेश्वर प्र. चौधरी पर भाजपा-एबीवीपी के हुंड़दंगियों ने रात में जानलेवा हमला कर दिया था क्योंकि वे वामपंथी थे।

असहिष्णुता का पहला दौर पूरा हो चुका है। लेखकों, कवियों, कलाकारों द्वारा पुरस्कार-वापसी की लहरों ने हमले के खिलाफ खड़े होने की जरूरत को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाया था। कुलबर्गी, दाभोलकर, पानसरे, गौरी लंकेश आदि की हत्याओं ने कट्टरपंथियों के चौतरफा फैले खूनी जाल को भी उजागर कर दिया है। यह कभी भीड़ के रूप में आता है तो कभी केशरिया राजनीति के अपने मूल रूप में सांप्रदायिक-मनुवादी चोले के साथ। भाजपा सरकारों ने कई नये कानूनों या कानून में संशोधनों के जरिये असहिष्णुता के लिए खाद-पानी जुटा दिया है।

नयी तैयारियों के साथ भीड़-हत्याओं से लेकर सोशल मीडिया में ट्रोल-हमलों के जरिये फासीवाद गश्त लगा रहा है। असहिष्णुता का नया दौर भाजपा की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। असहमतियों और इंकार की ऊर्जा को जनराजनीति में बदले बगैर इससे कैसे निपटा जा सकता है?

(मनोज भक्त सीपीआई (एमल) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। और झारखंड में रहते हैं।)








Tagswamyagnivesh bjp attack tribal adivasi

Leave your comment