“भात दे हरामी... भात दे!!”

त्रासदी , झारखंड, बुधवार , 18-10-2017


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जनचौक स्टाफ

झारखंड के सिमडेगा जिले में राशन न मिलने पर भूख की वजह से बच्ची की मौत से पूरा देश हिल गया है।

एक तरफ दावा किया जा रहा है कि देश आगे बढ़ रहा है, अमीरी बढ़ रही है और एक तरफ ऐसी घटनाएं सामने आती हैं कि दिल दहल जाता है। भूख और भूख से मौत देश की एक बड़ी सच्चाई है, हालांकि शासन-प्रशासन कभी नहीं मानता कि भूख से कोई मौत हुई है, वो इसे बीमारी, कुपोषण का नाम दे देता है, लेकिन बीमारी या कुपोषण किस वजह से हुआ इसे कभी नहीं बताया जाता है।

अभी 12 अक्टूबर को जारी हुए विश्व भूख सूचकांक के नए आंकड़ों ने भी देश की भयावह स्थिति को सामने लाकर रख दिया है। इस सूचकांक में हमारा देश तीन पायदान और नीचे खिसक कर सौवें स्थान पर पहुंच गया है। हालांकि शासक इसे भी झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं।

झारखंड में 11 साल की बच्ची संतोषी की भूख से मौत। फोटो साभार

 

11 साल की संतोषी की मौत

भूख से मौत 11 साल की संतोषी नाम की बच्ची की हुई। अब जब यह घटना पूरे देश के सामने आ गई तो इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं। मीडिया में ख़बर आने के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास मंगलवार को सिमडेगा पहुंचे। उन्होंने जिले के डिप्टी कमिश्नर मंजूनाथ भजंत्री से पूरे मामले की जानकारी ली। बताया जाता है कि अधिकारी इसे मलेरिया से हुई मौत मान रहे हैं। लेकिन इलाके के सामाजिक संगठनों के अनुसार 27 सितंबर को संतोषी को बुखार था ही नहीं, तो फिर उसे मलेरिया कैसे हो सकता है। बच्ची की मौत 28 सितंबर को हुई।

मुख्यमंत्री ने डीसी को खुद जांच करने के आदेश दिए और कहा है कि 24 घंटे के अंदर इसकी रिपोर्ट दी जाए।

अब तक सामने आए तथ्यों और बयानों के मुताबिक 11 साल की लड़की संतोषी भूख से तड़प-तड़प कर महज इसलिए मर गई, क्योंकि उसका परिवार अपने राशन कार्ड को आधार से लिंक नहीं करा पाया। इस परिवार को पब्लिक ड्रिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम (पीडीएस) स्कीम के तहत पिछले कई महीनों से राशन नहीं मिल पा रहा था।

आपको बता दें कि अभी तक सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए आधार अनिवार्य नहीं किया जा सकता। और राशन जैसी चीज़ के लिए तो बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता।  

अब झारखंड के खाद्य और आपूर्ति मंत्री ने भी कहा कि मामले की जांच की जाएंगी कि यह सब कैसे हो गया। मंत्री का कहना है कि इस बात को पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि राशन कार्ड को आधार से लिंक न करने वालों को भी राशन की सुविधा दी जाएगी। हालांकि झारखंड, राजस्थान समेत कई राज्यों से लागातार शिकायतें मिल रही हैं है कि बिना आधार के राशन नहीं दिया जा रहा।

केंद्र और राज्य सरकारें कुछ भी दावें करें लेकिन केंद्र सरकार खुद हर चीज़ में आधार को अनिवार्य करने पर अड़ी हुई है और यह मामला अभी तक सुप्रीम कोर्ट  में विचाराधीन है।

मेरी बेटी 'भात-भात' कहते हुए मर गई 

लड़की की मां कोयली देवी ने बताया कि "जब मैं चावल लेने सेंटर गई तो राशन कार्ड के आधार से लिंक न होने की बात कहकर मुझे राशन देने से मना कर दिया गया और मेरी बेटी 'भात-भात' कहते हुए मर गई। भूख की वजह से संतोषी के पेट में दर्द हो रहा था और उसका शरीर भी अकड़ गया था।"

 

इस घटना का खुलासा सोमवार, 16 अक्टूबर को खाद्य सुरक्षा को लेकर काम करने वाली एक संस्था ने किया था। संस्था के मुताबिक, बीते 28 सितंबर को संतोषी की मौत इसलिए हो गई, क्योंकि उसके पर घर पर पिछले आठ दिन से राशन ही नहीं था।

बेहद गरीब है परिवार

मृतक संतोषी के परिवार के पास न तो जमीन है, न कोई नौकरी और न ही कोई स्थायी आय है जिसके कारण उसका परिवार पूरी तरह से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत मिलने वाले राशन पर ही निर्भर था और इसी से पूरा परिवार को भोजन मिल रहा था। पिछले आठ दिनों से घर में अन्न का एक दाना नहीं था और न ही इतने पैसे थे कि वे राशन खरीद सकते। घर के सभी लोग भूखे थे लेकिन बच्ची यह भूख बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने दम तोड़ दिया।

राइट टू फूड कैंपेन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर पीड़ित परिवार को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन स्कीम के तहत राशन दे दिया जाता तो बच्ची को 8 दिनों तक भूखा नहीं रहना पड़ता और उसकी जान नहीं जाती।

इस घटना ने सबको झकझोर दिया है। भूख की इसी भयावहता को बांग्लादेश के कवि रफ़ीक आज़ाद ने अपनी कविता में बेहद शिद्दत के साथ रेखांकित किया है। प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक ने इस कविता का हिन्दी में अनुवाद किया है। इस घटना के बाद "भात दे हरामी" शीर्षक से यह कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। इसे पढ़ा और सुना जाना बेहद ज़रूरी है।


भात दे हरामी


बेहद भूखा हूँ

पेट में, शरीर की पूरी परिधि में

महसूस करता हूँ हर पल, सब कुछ निगल जाने वाली एक भूख.

बिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाली खेतों मे जल उठती है भयानक आग

ठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीर .

महज़ दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिले, बस और कोई मांग नहीं है मेरी.

लोग तो न जाने क्या क्या मांग लेते हैं.

वैसे सभी मांगते हैं

मकान गाड़ी, रुपये पैसे, कुछेक में प्रसिद्धि का लोभ भी है

पर मेरी तो बस एक छोटी सी मांग है, भूख से जला जाता है पेट का प्रांतर

भात चाहिए, यह मेरी सीधी सरल सी मांग है,

ठंडा हो या गरम

महीन हो या खासा मोटा

या राशन मे मिलने वाले लाल चावल का बना भात,

कोई शिकायत नहीं होगी मुझे, एक मिट्टी का सकोरा भरा भात चाहिये मुझे.

दो वक़्त दो मुट्ठी भात मिल जाये तो मैं अपनी समस्त मांगों से मुंह फ़ेर लूँगा.

अकारण मुझे किसी चीज़ का लालच नहीं है, यहाँ तक की यौन क्षुधा भी नहीं है मुझ में

मैं तो नहीं चाहता नाभि के नीचे साड़ी बांधने वाली साड़ी की मालिकिन को

उसे जो चाहते है ले जाएँ, जिसे मर्ज़ी उसे दे दो.

ये जान लो कि मुझे इन सब की कोई ज़रूरत नहीं

पर अगर पूरी न कर सको मेरी इत्ती सी मांग

तुम्हारे पूरे मुल्क मे बवाल मच जायेगा,

भूखे के पास नहीं होता है कुछ भला बुरा, कायदे कानून

सामने जो कुछ मिलेगा खा जाऊँगा बिना किसी रोक टोक के

बचेगा कुछ भी नहीं, सब कुछ स्वाहा हो जायेगा निवालों के साथ

और मान लो गर पड़ जाओ तुम मेरे सामने

राक्षसी भूख के लिए परम स्वादिष्ट भोज्य बन जाओगे तुम.

सब कुछ निगल लेने वाली महज़ भात की भूख

ख़तरनाक़ नतीजों को साथ लेकर आने को न्योतती है

दृश्य से द्रष्टा तक की प्रवहमानता को चट कर जाती है.

और अंत मे सिलसिलेवार मैं खाऊंगा पेड़ पौधें, नदी नालें

गाँव देहात, फुटपाथ, गंदी नाली का बहाव

सड़क पर चलते राहगीरों, नितम्बिनी नारियों

झंडा ऊंचा किये खाद्य मंत्री और मंत्री की गाड़ी

आज मेरी भूख के सामने कुछ भी न खाने लायक नहीं

भात दे हरामी, वर्ना मैं चबा जाऊँगा समूचा मानचित्र


- रफ़ीक आज़ाद

(अनुवाद : अशोक भौमिक)


रफ़ीक आज़ाद के साथ यहां जनकवि बाबा नागार्जुन की
1955 में लिखी कविता वह तो था बीमारभी पढ़ना बेहद प्रासंगिक होगा। क्योंकि सिमडेगा ज़िले के अधिकारी लगातार दावा कर रहे हैं कि बच्ची भूख से नहीं मलेरिया से मरी है।


वह तो था बीमार


मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार

लिखवा लेगा घरवालों से- 'वह तो था बीमार'

अगर भूख की बातों से तुम कर न सके इंकार

फिर तो खायेंगे घरवाले हाकिम की फटकार

ले भागेगी जीप लाश को सात समुन्दर पार

अंग-अंग की चीर-फाड़ होगी फिर बारंबार

मरी भूख को मारेंगे फिर सर्जन के औजार

जो चाहेगी लिखवा लेगी डाक्टर से सरकार

जिलाधीश ही कहलायेंगे करुणा के अवतार

अंदर से धिक्कार उठेगी, बाहर से हुंकार

मंत्री लेकिन सुना करेंगे अपनी जय-जयकार

सौ का खाना खायेंगे, पर लेंगे नहीं डकार

मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार

लिखवा लेगा घरवालों से- 'वह तो था बीमार'

- बाबा नागार्जुन

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