मीडिया और राजनीति की जुगलबंदी ने बच्चों को उन्मादी भीड़ बना दिया है!

त्रासदी , , सोमवार , 18-02-2019


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जितेंद्र भट्ट

उन बच्चों की उम्र 10 से 12 साल के बीच रही होगी। ज्यादा से ज्यादा 14-15 साल। उनके हाथों में तिरंगा काफी सुंदर दिख रहा था। वो भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे।

कुछ के हाथों में पोस्टर थे। उन पोस्टरों पर पाकिस्तान के खिलाफ कुछ इबारतें लिखी हुई थीं।  इसके अलावा बच्चों के हाथों में जो चीज थी। उसने मासूम से बच्चों को हिंसक भीड़ की शक्ल दे दी थी। कुछ बच्चों ने हाथों में छोटे-छोटे डंडे थाम रखे थे।

 बच्चों के हाथों में तिरंगा जितना सुंदर दिख रहा था, उतने ही खराब लग रहे थे वो डंडे। बच्चों के हावभाव के साथ डंडे हिंसा का भाव पैदा कर रहे थे।

 जब तक मेरी कार उनके करीब पहुंचती, वो बेकाबू होकर मेरी कार की तरफ दौड़ आए। ब्रेक लगाना पड़ा। कार रुकी, तो वो चारों तरफ बिखर गए। उन्होंने कार को घेर लिया। वो भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। नारों की गूंज बढ़ती चली गई।

मेरी दोनों तरफ की कांच वाली खिड़कियों पर बच्चों ने हाथ मारे। इसमें इतना जोर तो नहीं था कि कांच टूट पड़ता। लेकिन हाथों की थपकियों का अंदाज हिंसक था। उन्होंने हाथ के इशारे से खिड़की खोलने को कहा।

वो बच्चे थे। पर भारत माता की जय के नारों से उनका खून उबाल मार रहा था। दो चार बच्चे ड्राईविंग सीट वाली खिड़की की तरफ आ गए। वो एक साथ बोल रहे थे। उनमें बचपन की व्यग्रता थी। साथ ही टीवी चैनल्स के जरिए उनके दिल और दिमाग में देशभक्ति की शक्ल में उन्माद भर दिया गया था।

जिसे वो देशभक्ति समझ रहे थे, वो डरावना था। सच मानिए, जिस अंदाज में वो कार को चारों ओर से घेरे हुए थे, और चीख रहे थे। वो पल भर के लिए डरा गया था।

उन बच्चों के चेहरे पर साफ-साफ दिख रहा था कि उनके दिमागों पर ‘भीड़ की सत्ता’ ने कब्जा कर रखा है। ऐसा लगा कि वो जानते हैं कि भीड़ क्या कर सकती है? उन्हें भीड़ की ताकत का अहसास था। उन्हें पता था कि वो जब तक भीड़ का हिस्सा हैं, ताकतवर हैं।

 भीड़ के आवेग ने उनके उन्माद को और बढ़ा दिया था। वो इस पल किसी को भी आदेश देने की स्थिति में पहुंच गए थे। उस वक्त सड़क से गुजरने वाले किसी भी शख्स की शख्सियत उन बच्चों के लिए बेमानी थी। उन्हें इस बात से फर्क नहीं था कि कार टैक्सी है, ऑटो है या फिर कार पर प्रेस का स्टिकर चिपका है।

उन बच्चों ने गर्वीली, मगर अनियंत्रित सी आवाज में कहा - पाकिस्तान मुर्दाबाद बोलो। मैंने बिना कुछ कहे, इशारों-इशारों में अपने हाथ को मुट्ठी बनाते हुए नारे लगाने वाले अंदाज में ऊपर की तरफ लहरा दिया।

कई बच्चे अभी भी कार के आगे डटे थे। उन्होंने जोर देकर कहा - पाकिस्तान मुर्दाबाद बोलो। 

मैंने कहा - मुर्दाबाद। 

बच्चों ने कहा - पाकिस्तान मुर्दाबाद। 

मैंने कहा - हां, पाकिस्तान मुर्दाबाद।

इसी के साथ बच्चों ने हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने शुरू किए। और मुझे भी ऐसा करने को कहा। मैंने कहा - हिंदुस्तान जिंदाबाद। बच्चे संतुष्ट हो गए। बच्चे एक दूसरे से कहने लगे - इसने पाकिस्तान मुर्दाबाद कह दिया है। जाने दो।

बच्चे विजयी भाव से भर गए थे। ऐसा लगा, जैसे देशभक्तों की इस भीड़ ने पाकिस्तान को एक जंग में रौंद दिया हो। बच्चों ने कार को आगे जाने का रास्ता दे दिया।

मैं सोच में पड़ गया। जहां तक उन बच्चों के चेहरों को मैंने पहचाना। वो ज्यादा से ज्यादा सातवीं, आठवीं या फिर नौवीं क्लास में पढ़ते होंगे।

मेरे लिए ये कौतुहल था। इन बच्चों के अंदर पाकिस्तान मुर्दाबाद की भावना कौन भर रहा है? कौन है जो बच्चों को समझा रहा है कि सड़क पर आती जाती गाड़ियों में सवार लोगों से पाकिस्तान मुर्दाबाद बुलवाया जाए, तो देशभक्ति होगी?

इन बच्चों को किसने बतलाया कि पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारों से पुलवामा के 40 शहीदों की आत्मा को शांति मिलेगी। और उन शहीदों के परिवारवालों के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। पिछले कई दिन से कह रहा हूं। फिर कहूंगा। उन्माद, देशभक्ति नहीं होती है।

(जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।)








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