जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका का कदम आत्मघाती

विश्व पर्यावरण दिवस , , सोमवार , 05-06-2017


trump-climate-paris-china-india-change

डॉ. रवि चेल्लम

कहने वाले कुछ भी कहें, लेकिन जलवायु बदलाव सामने खड़ी चुनौती है और इसे महज़ चीन की ओर से खड़ा किया गया हौव्वा करार नहीं दिया जा सकता। वैज्ञानिक तथ्यों की कसौटी पर इस सत्य को कसा सकता है कि दिन-ब दिन कार्बन पर टिकती हमारी जीवन शैली ही घटते जंगलों के लिए जिम्मेदार है। जिसकी वजह से धरती का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं और पर्यावरण में असंतुलन महसूस हो रहा है। 

ट्रंप ने खींची नई दीवार

ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जिस तरह से पेरिस समझौते से हाथ खींचा है उससे दुनिया के सामने एक ऐसा संकट खड़ा हो गया है जिसमें मानवता के भविष्य को उग्र राष्ट्रवादी एजेंडे के आगे नतमस्तक होना पड़ सकता है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे बड़े देश अमेरिका ने जलवायु को लेकर सालों से हो रहे रिसर्च और बातचीतों के दौर को एक झटके में बेकार साबित कर दिया है। मेक्सिको के बॉर्डर पर 

दीवार खड़ी करने का दम भरने वाले ट्रंप ने अपने इस फैसले से दुनिया और अमेरिका के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी है, जिसमें अमेरिका सीरिया और निकारागुआ से भी निचले पायदान पर खड़ा दिख रहा है।

अब सवाल ये है कि क्या जलवायु परिवर्तन को लेकर शुरुआत से ही यही एजेंडा नहीं था? उग्रराष्ट्रवाद की जिस दक्षिणपंथी लकीर के इर्द गिर्द उन्होंने अपना चुनावी प्रचार बुना उसमें मेक्सिको के बॉर्डर पर दीवारमुस्लिमों की अमेरिका में एंट्री बैन के साथ ही पेरिस समझौते से खुद को अलग करना भी अहम चुनावी मुद्दा था। अब सवाल ये भी है कि क्या ट्रंप प्रशासन इस समझौते से ऐसे ही निकल पाएगा जिस नाटकीयता के साथ इसका ऐलान किया गया है, तकनीकी रूप से अगर देखें तो ऐसा करने में ट्रंप प्रशासन को पूरा एक साल लग सकता है। और वैसे भी उन्होंने 'पुन: वार्ता' के बाद समझौते में फिर से प्रवेश के लिए भी रास्ता छोड़ा हुआ है, लेकिन जर्मनी, फ्रांस और इटली ने ये साफ कर दिया है कि ऐसा करना इतना भी आसान नहीं होगा। 

जलवायु परिवर्तन पर विवाद

अमेरिका का चीन और भारत पर हमला

कोयले की खपत को लेकर जिस तरह से ट्रंप ने भारत और चीन पर हल्ला बोला है उसके पीछे तथ्य कम पूर्वाग्रह ज्यादा लगते हैं, सच्चाई ये है कि भारत और चीन दोनों अपने अक्षय ऊर्जा संसाधनों की क्षमता को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ताज़ा उदाहरण राजस्थान का है जहां हाल ही में हुई नीलामी के बाद सौर ऊर्जा की दरें अब 2.44 रुपए प्रति यूनिट पर आ गई हैं।

दरअसल कोयला मुक्त भविष्य उतनी भी दूर की कौड़ी नहीं लगती। सरकार 2022 तक अक्षय ऊर्जा का उत्पादन 175 गीगावाट तक लाना चाहती है वहीं केंद्रीय बिजली अथॉरिटी ये साफ कर चुका है कि 2027 तक देश को नए कोयला पावर प्लांट की ज़रूरत नहीं है, ऐसे में भारत की कोयला को लेकर निर्भरता कम होगी, ऐसी उम्मीद करना बहुत ज्यादा नहीं लगता। माना जा रहा है कि 2030 तक भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों का 40 फीसदी नवीकरण ऊर्जा से पूरा हो जाएगा। अपनी रिपोर्ट में सीईए ने अनुमान लगाया है कि भारत 2027 तक 275 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित करेगा, जो पेरिस के लक्ष्य से अधिक है। ध्यान देने वाली बात है कि कोल इंडिया के 2020 तक 1 बिलियन कोयला उत्पादन के लक्ष्य पर भी रोक लगा दी गई है, जो कोयले पर घटती निर्भरता का ही संदेश देता है।

कोयला जल्द ही इतिहास का विषय

कोयला अब एक ऐसा बोझ है जिसको लेकर दुनिया अब बहुत ज्यादा दूर तक नहीं चल सकती। दुनिया इस बात को अब समझ रही है। भले ही इस समझदारी में ट्रंप प्रशासन शामिल हो या नहीं उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ट्रंप प्रशासन के हाथ खींचने के बावजूद क्लाइमेट एक्शन का काम होता रहेगा, इसमें शक नहीं। खुद अमेरिका में ही कई राज्य राष्ट्रपति ट्रंप के इस फैसले की मुखालफ़त कर रहे हैं।

पेरिस समझौते से बाहर आने के बावजूद कार्बन उत्सर्जन ट्रंप शासनकाल में भी कम होगा, हालांकि ये ओबामा प्रशासन की ओर से दिए गए वादे से कम ही होगा। अनुमान है कि 2025 तक कार्बन उत्सर्जन 2005 के स्तर के नीचे 15-19 फीसदी तक कम होगा जो कि ओबामा प्रशासन के 26-28 फीसदी की कमी के अनुमान से कम है।   

जलवायु परिवर्तन पर विवाद

कौन भुगतेगा ट्रंप के फैसले का खामियाजा?

तो असल सवाल ये है कि इस गैरजिम्मेदार फैसले का खामियाज़ा किसको भुगतना पड़ेगा? जाहिर है एक अर्से से संसाधनों का दुरुपयोग कर ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए जिम्मेदार विकसित देशों पर इसका उतना प्रभाव नहीं पड़ेगा,जितना कि उन विकासशील देशों पर जिनकी अर्थव्यवस्थाएं कृषि पर आधारित हैं या फिर जंगलों और समुद्र तटों के सहारे खड़ी हैं। आने वाले इस संकट को समझते हुए ही 48 अति पिछड़े देशों ने साल के अंत में होने वाले COP2 सम्मेलन में पेरिस समझौते और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए प्रयासों को दोगुना करने की अपील की है ।

तीसरा सबसे बड़ा ग्रीन हाउस गैस एमिटर देश होने के बावजूद भारत अपनी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की वजह से मानसून पर बहुत ज्यादा निर्भर तो है ही,साथ ही जलवायु बदलाव की वजह से हो रहे असंतुलन को लेकर भी संवेदनशील है। देश के कई हिस्सों में असंतुलित मौसम जैसे कई जगह सूखा और बारिश को जलवायु बदलाव के सबसे गंभीर परिणामों की तरह देखा जा रहा है। ऐसे में क्लाइमेट एक्शन दुनिया के सभी बड़े देशों की सामूहिक नैतिक जिम्मेदारी है।

अमेरिका का कदम आत्मघाती

दरअसल प्रदूषण के अतीत को पकड़ कर, ट्रम्प प्रशासन ने एक आत्मघाती कदम ही उठाया है। सच्चाई ये है कि स्वच्छ प्रदूषण रहित ऊर्जा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए उस आशीर्वाद की तरह ही है जिसमें नागरिकों की अच्छी सेहत, जॉब सिक्योरिटी का वादा छुपा है। लेकिन खुद को पारंपरिक कहने वाले ट्रंप दीवार बनाने में ज्यादा यकीन करते हैं ना कि जीवन बचाने में।

मिस्टर ट्रंप जैसा आपने कहा ये सही है कि हमें ग्लोबल वॉर्मिंग की फैट डोज़ की जरूरत है। जरूरत है बिल्कुल.....नफरत के वातावरण के खिलाफ़ लोगों के एक दूसरे को लेकर वॉर्म होने की। मानवीय होने की, संवेदनशील होने की। हमें यकीन है कि इस चुनौती से हम लोग निपट लेंगे, बगैर आपके। आप अपने डॉलर गिनते रहिए।

                                (लेखक ग्रीन पीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक हैं।)

 

                                                        अनुवादः अल्पयु सिंह










Leave your comment