"ट्रम्प प्रशासन" के झटके और हिचकोले खा रही भारतीय विदेश नीति

मुद्दा , , शनिवार , 08-06-2019


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दयानंद

देश में लोक सभा चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, विशाल जनादेश वाले एक बेहद मजबूत सरकार का गठन हो चुका है। उम्मीदों और जन आकांक्षाओं की हिलोरें आसमान छू रही हैं लेकिन हकीकत की दोयलमान धरातल पर सरकार की नीति केवल हिचकोलें खा रही है। चुनाव में आवश्यक मुद्दों को  राष्ट्रवाद के नारों तले इस तरह दबा दिया गया कि ये मुद्दे सिसकियां भी न ले सके। विदेशी मामलों के जानकारों की मानें तो विगत सरकार की कूटनीतिक विफलताओं की लिस्ट काफी लंबी होने वाली है। इस विफलता का आशय बहुत ही स्पष्ट है, बदहाल विदेश नीति का बेड़ागर्क होना तय दिख रहा है। 

अमेरिकी सरकार द्वारा भारत पर दबाव की राजनीति को लगातार बढ़ाने में ट्रम्प प्रशासन पूरी शिद्दत से जुटा है पर भारत का रुख एक मजबूत सरकार की विदेश नीति का कतई दर्शन नहीं कराता है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत को एक के बाद एक झटके दिए जा रहे हैं, और देश की विदेशी नीति के निर्धारक शूरमाओं के पास स्थिति को संभालने की कौन कहे उन पर उनकी उलझनें ही भारी पड़ती दिख रही हैं। अगर बीते पांच वर्षों के दौरान भारत-अमेरिका सम्बन्धों पर निगाह डालें तो भारतीय विदेश नीति के मामले में ट्रम्प प्रशासन का आक्रामक रवैया लगातार बना हुआ है। डोनाल्ड ट्रम्प की भारत पर दबाव की राजनीति को कई महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में समझा जा सकता है।

1. जलवायु और प्रदूषण के मुद्दे पर डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अंतराष्ट्रीय मंच पर भारत का उपहास 

ताजा मामला अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत के संदर्भ में दिए गए बयान से जुड़ा है। जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत का जमकर उपहास उड़ाया है। हाल में जारी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में भारत, चीन और रूस में वायु प्रदूषण का स्तर अमेरिका से ज्यादा बताया गया था और इस रिपोर्ट के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ब्रिटिश चैनल आईटीवी को दिए इंटरव्यू में इन देशों का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ''भारत, रूस और चीन जैसे देशों में अच्छी हवा और पानी तक नहीं है, विश्व के पर्यावरण को लेकर ये देश अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाते हैं और न ही इन देशों को इस ज़िम्मेदारी का अहसास है, इन देशों में प्रदूषण और सफ़ाई को लेकर न कोई सोच है और न ही कोई ठोस नीति।" हालांकि कार्बन उत्सर्जन के मामले में आज भी अमेरिका विश्व के अन्य देशों की तुलना में अग्रणी है लेकिन भारत का जलवायु के मामले में निरंतर दोषपूर्ण होना वाकई चिन्ताजनक है। कई शहरों की हवा सांस लेने लायक भी नहीं है और कई नदियों का पानी उपयोग के लायक नहीं बचा है। 

2. रूस से एस-400 हवाई रक्षा प्रणाली नहीं खरीदने के लिए अमेरिका द्वारा दबाव बनाया जाना

भारत और रूस के बीच इस एस-400 हवाई रक्षा प्रणाली की खरीद के लिए पिछले साल अक्तूबर 2018 में पांच अरब डॉलर का समझौता हुआ था। यह समझौता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच व्यापक चर्चा के बाद हुआ था। एस-400 सतह से हवा में मार करने में सक्षम अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणाली है, चीन ने रूस से इस प्रणाली की खरीद के लिए 2014 में सबसे पहले समझौता किया था। ट्रंप प्रशासन ने चेतावनी दी है कि रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली ‘एस-400' खरीदने के भारत के फैसले का अमेरिका तथा भारत के बीच रक्षा संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा। अमेरिकी कांग्रेस ने रूस से हथियारों की खरीद को रोकने के लिए काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सेंक्शंस एक्ट (सीएएटीएसए) कानून बनाया था, और इसी कानून के तहत अमेरिका प्रतिबंध लगा सकता है। उसने कहा कि यदि भारत एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदने के फैसले पर आगे बढ़ता है तो उससे रक्षा संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा।

कई खूबियों से लैस है एस-400 मिसाइल 

● इस मिसाइल सिस्टम को जमीन से हवा में मार करने वाला दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार माना जाता है, यह सिस्टम एयरक्राफ्ट, क्रूज मिसाइल और यहां तक कि परमाणु मिसाइल को 400 किलोमीटर पहले ही नष्ट कर सकता है।

● इस मिसाइल सिस्टम में तीन प्रमुख चीजें लगी हुई हैं। मिसाइल लॉन्चर, शक्तिशाली रडार और कमांड सेंटर। इसमें लगा हुआ रडार 600 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य को देख सकता है।

●  नॉटो इस सिस्टम की दूर तक मार करने की क्षमता की वजह से इसे दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार मानता है। एस-400 दुश्मन के सभी हवाई हमलों को नष्ट कर सकता है और यह जमीन में लड़ रहे सैनिकों की मदद भी रोक सकता है।

3. अमेरिका द्वारा भारत को मिले जीएसपी (जनरलाइज सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस) दर्जे को समाप्त करना।

जीएसपी की शुरुआत अमेरिका द्वारा 1976 में विकासशील देशों में आर्थिक वृद्धि बढ़ाने के लिए की गयी थी। इस दर्जे को प्राप्त देश हजारों सामान बिना किसी शुल्क के अमेरिका को निर्यात कर सकते हैं। इसमें उन्हें छूट मिलती है। जनरलाइज सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस (जीएसपी) अमेरिका का सबसे बड़ा और पुराना व्यापार तरजीही कार्यक्रम है, इसका लक्ष्य लाभार्थी देश के हजारों उत्पादों को बिना शुल्क प्रवेश की अनुमति देकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। भारत 2017 में जीएसपी कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा, इस साल भारत ने अमेरिका को 5.7 अरब डॉलर का निर्यात किया था। भारत ने लगभग 630 करोड़ डॉलर का सामान अमरीका में निर्यात किया जिस पर बहुत कम या ना के बराबर शुल्क लगा था।

और अब अमेरिका ने भारत को मिले जीएसपी (जनरलाइज सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस) दर्जे को समाप्त कर दिया है, यह 5 जून 2019 से लागू हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में इसका ऐलान किया। ट्रंप ने कहा कि "भारत ने अमेरिका को अपने बाजार तक समान और तर्कपूर्ण पहुंच'' देने का आश्वासन नहीं दिया है।" हालांकि ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत को ये गहरा झटका अचानक नहीं दिया गया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने चार मार्च को ही कहा था कि "अमेरिका जीएसपी के तहत भारत को प्राप्त लाभार्थी विकासशील देश का दर्जा खत्म करने पर विचार कर रहा है।" इस संबंध में भारत को मिला 60 दिन का नोटिस तीन मई को समाप्त हो चुका है और इस 60 दिनों में भारत की तरफ से इस अनुबंध को बचाने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। इस अनुबंध के टूटने से होने वाली क्षति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत को जीएसपी का सदस्य होने के चलते उसे लगभग 26 करोड़ डॉलर का फ़ायदा होता था जो अब नहीं मिलेगा। साथ ही बेरोजगारी का दंश झेल रहे देश के युवाओं के लिए रोजगार का भयानक संकट उत्पन्न होना तय है।

4. भारत द्वारा ईरान से तेल आयात पर अमेरिका का रुख

भारत अपनी ज़रूरत का करीब 12% कच्चा तेल ईरान से आयात करता है। अमेरिका ने ईरान से कच्चा तेल खरीदने की जो छूट भारत को दी थी उसे एक मई से हटाने का एलान कर दिया है। भारत के लिए ईरान से तेल ख़रीदना बहुत फ़ायदे का सौदा है, ईरान न सिर्फ माल बंदरगाह पर डिलीवर करता है बल्कि भारत को दो माह के उधार की सुविधा भी देता है ।

इसके अलावा कुछ मात्रा में कच्चे तेल का भुगतान रुपए में किया जाता रहा है। भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के द्वारा भुगतान नेशनल ईरानियन ऑयल कंपनी (एनआईओसी) के यूको बैंक खाते में किया जाता रहा है। 

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कॉमर्शियल इंटेलिजेंस ऐंड स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के अनुसार भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाले देश इस प्रकार हैं।

देश   वर्ष 2017-18  वर्ष 2018-19  

इराक  4.57 करोड़ बैरल  4.66 करोड़ बैरल

सऊदी अरब  3.61 करोड़ बैरल  4.03 करोड़ बैरल

ईरान  2.25 करोड़ बैरल 2.39 करोड़ बैरल 

यूएई  1.42 करोड़ बैरल 1.75 करोड़ बैरल

वेनेजुएला  1.83 करोड़ बैरल 1.73 करोड़ बैरल

नाईजीरिया  1.81 करोड़ बैरल 1.68 करोड़ बैरल

कुवैत  1.1 करोड़ बैरल  1.07 करोड़ बैरल 

मैक्सिको  0.99 करोड़ बैरल 1.02 करोड़ बैरल  

ईरान से तेल आयात रुकने से कई तरह की समस्याओं का आना स्वभाविक है। कच्चे तेल के मूल्य में बढ़ोतरी से शेयर बाजार में गिरावट, पेट्रोल-डीजल के दाम में और तेजी से बृद्धि, आवश्यक वस्तुओं के मूल्य में बढ़ोतरी सहित कई समस्याएं स्वभाविक रूप से दस्तक देंगीं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

5. एच-1 बी और एलवन वीजा पर अमेरिका का रुख

अमेरिका में ट्रम्प सरकार के आने के बाद से एच-वन बी और एल-वन में काफी बदलाव आया है जिससे भारतीय पेशेवरों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ट्रम्प प्रशासन ने एच-1 एल-वन वीजा के नवीनीकरण को और जटिल बना दिया है।

बस्तुतः एच-1बी वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा है। यह किसी कर्मचारी को अमेरिका में छह साल काम करने के लिए जारी किया जाता है। इसे पाने वाले व्यक्ति को स्नातक होने के साथ किसी एक क्षेत्र में विशेष योग्यता हासिल होनी चाहिए, साथ ही इसे पाने वाले कर्मचारी की सैलरी कम से कम 60 हजार डॉलर यानी करीब 40 लाख रुपए सालाना होना जरूरी है। इस वीजा की एक खासियत भी है कि यह अन्य देशों के लोगों के लिए अमेरिका में बसने का रास्ता भी आसान कर देता है, एच-1बी वीजा धारक पांच साल के बाद स्थायी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस वीजा की मांग इतनी ज्यादा है कि इसे हर साल लॉटरी के जरिये जारी किया जाता है। एच-1बी वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल टीसीएस, विप्रो, इंफोसिस और टेक महिंद्रा जैसी 50 से ज्यादा भारतीय आईटी कंपनियों के अलावा माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियां भी करती हैं। 

अमेरिका ने वित्त वर्ष 2020 के लिए भारतीयों, पेशेवरों समेत विदेशी नागरिकों को लोकप्रिय एच-1 बी वीजा दिए जाने की संख्या 65,000 तक सीमित कर दी है। इसके अलावा ट्रम्प प्रशासन द्वारा वर्ष 2019 में एच1-बी वीजा (H-1B Visa) के लिए आवेदन शुल्क बढ़ाने का प्रस्ताव अमेरीकी संसद में लाया गया। श्रम मंत्री एलेक्जेंडर एकोस्टा ने अमेरिकी सांसदों को बताया कि एक अप्रेंटिस कार्यक्रम को विस्तार देने के संबंध में निधि बढ़ाने के लिए यह प्रस्ताव दिया गया है।

पहली बार भारत सरकार अमेरिका के सामने इतना बेबस और लाचार दिख रही हैं। चुनाव परिणाम के बाद एक विशाल जनादेश वाली मजबूत सरकार को नया विदेश मंत्री भी मिल चुका है। देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा कर लगातर झटके देने की ट्रम्प नीति का कोई सार्थक उपाय देश के पास है या नहीं ।

  (दयानन्द स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और शिक्षा, राजनय और कई मामलों के विशेष जानकार हैं।)










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