विनोद मिश्र स्मृति दिवस: बहुत याद आते हैं आप, इतिहास और राजनीति के ऐसे नाज़ुक संधि-स्थलों पर!

स्मृति , , मंगलवार , 18-12-2018


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जनचौक ब्यूरो

(का. विनोद मिश्र 22 सालों के भूमिगत जीवन के बाद राजनीति की मुख्य धारा में आए। और बहुत कम समय में ही उन्होंने न केवल देश की वामपंथी राजनीति बल्कि मध्यमार्गी राजनीतिक दलों को भी अपने प्रखर राजनीतिक चिंतन और वैचारिक दृढ़ता से प्रभावित कर दिया। लेकिन इस उभरते और तेज गति से आगे बढ़ते वामपंथ के कारवां को उस समय तगड़ा झटका लगा जब वीएम के नाम से बुलाए जाने वाले विनोद मिश्र का महज 53 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके सपनों का भारत कैसा होगा इसको उन्होंने बाकायदा कलमबद्ध किया था। अपने उस सुनहरे सपने की उन्होंने एक अद्भुत तस्वीर पेश की थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष लाल बहादुर सिंह के हवाले से उस पूरे बयान को एक बार फिर यहां दिया जा रहा है। इसके साथ उनकी 20वीं पुण्यतिथि के इस मौके पर बिहार के आरा में उनकी प्रतिमा के अनावरण के साथ क्रांति पार्क का उद्घाटन हुआ है। उसका ब्योरा भी नीचे है- संपादक)   

" मेरे सपनों का भारत राष्ट्रों के समुदाय में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी देश को भी डर नहीं लगेगा और जिसे दुनिया का सबसे ताकतवर देश भी न धमका सकेगा न ब्लैकमेल कर सकेगा ।"

"मैं वैज्ञानिक विचारों के पुनरुत्थान का सपना देखता हूं जहां मनुष्य को भगवान के रूप में पराया बन गया मानव सार फिर से वापस मिल सकेगा । मानव मस्तिष्क के इस महान रूपांतरण के साथ-साथ एक सामाजिक क्रांति होगी जिसमें संपत्ति के उत्पादक अपने उत्पाद के भी मालिक होंगे ।"

" मेरे सपनों के भारत में अछूतों को हरिजन कहकर गौरवान्वित करना समाप्त हो जायेगा और दलित नाम की कोई श्रेणी नहीं होगी। जातियां विघटित होकर वर्गों का रूप लेंगी और हर व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत पहचान होगी ।"

"मेरे सपनों का भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा जिसकी आधारशिला 'सर्वधर्म समभाव' की जगह 'सर्वधर्म वर्जयेत' के उसूल पर कायम होगी ।किसी की व्यक्तिगत आस्थाओं में हस्तक्षेप किये बगैर राज्य वैज्ञानिक व तार्किक विश्वदृष्टिकोण को प्रोत्साहित करेगा ।"

मूर्ति का अनावरण।

"मेरे तमाम सपनों की मां मातृभूमि है, जिसमें हर नागरिक की राजनैतिक मुक्ति को सबसे ज्यादा कीमती समझा जायेगा, जहां असहमति की वैधता होगी ।"

"मेरे सपनों का भारत भारतीय समाज में कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं पर आधारित है जिसे साकार करने के लिए मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने अपने खून की अंतिम बूंद तक बहाने की शपथ ले रखी है।"

विनोद मिश्र स्मृति दिवस पर लोगों ने लिया बीजेपी को देश की सत्ता से उखाड़ फेंकने का संकल्प:

भाकपा-माले के दिवंगत महासचिव कॉ. विनोद मिश्र के 20 वें स्मृति दिवस को आज पूरे देश में भाकपा-माले ने संकल्प दिवस के रूप में मनाया और इस अवसर पर केंद्र की सत्ता से फासीवादी भाजपा को उखाड़ फेंकने व नए भारत के निर्माण का संकल्प लिया। इस मौके पर आरा में माले महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने क्रांति पार्क का लोकार्पण किया और उसे भोजपुर की जनता के नाम समर्पित किया। क्रांति पार्क में भोजपुर आंदोलन के शिल्पकार मास्टर जगदीश प्रसाद, कॉमरेड रामनरेश राम, कॉमरेड रामेश्वर यादव, भाकपा-माले के दूसरे महासचिव कॉ. सुब्रत दत्ता व कॉ. विनोद मिश्र की मूर्ति की स्थापना की गई है। 

राज्य के दूसरे हिस्सों में भी संकल्प दिवस का आयोजन किया गया। राज्य कार्यालय पटना में कॉ. विनोद मिश्र को श्रद्धांजलि देते हुए समकालीन लोकयुद्ध के संपादक प्रदीप झा ने कहा कि आज फासीवादी मोदी शासन के खिलाफ मोर्चेबंदी और तीखी हो गई है। जहां एक ओर फासीवादी शक्तियों ने अपना हमला तीखा कर दिया है, वहीं हम देख रहे हैं कि फासीवाद और लोकतंत्र के बीच इस महासंग्राम में जनता भी बड़ी दृढ़तापूर्वक अपनी दावेदारी पेश कर रही है। 

मूर्ति अनावरण के मौके पर आयोजित सभा।

चरम तीखे आर्थिक संकट के कमरतोड़ बोझ को, भारतीय राजसत्ता की दमनकारी शक्ति को, मीडिया के भटकाने वाले प्रचार और साम्प्रदायिक भीड़-हत्यारे गिरोहों की दमघोटू हिंसा को धता बताते हुए जनता अत्यंत प्रेरणादायक रूप से जवाबी प्रहार कर रही है। जन-प्रतिरोध के बढ़ते संकेत और बढ़ती शक्ति अब तक भाजपा शासन में रहे तीन राज्यों में भाजपा की पराजय में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। भाजपा को छत्तीसगढ़ में तो करारी हार मिली और लगभग सफाया ही हो गया, और राजस्थान में उनको बड़ा धक्का लगा है और मध्य प्रदेश में भी जोरदार चोट खानी पड़ी है। 

अन्य वक्ताओं ने कहा कि 1970 के तूफानी दशक में भाकपा (माले) ने लोकतंत्र के लिये संग्राम के दौर में ही खुद को पुनरुज्जीवित किया था। इमरजेंसी के दौर में चले बर्बर राज्य दमन का मुकाबला करते हुए भाकपा (माले) देश के सबसे दबे-कुचले लोगों के अधिकारों एवं सम्मान के लिये लड़ाई में अविचल डटी रही। 1990 के दशक में जब भाजपा ने अपना फासीवादी एजेन्डे को अंजाम देना शुरू किया तो उसके खिलाफ सशक्त जवाबी हमले की तैयारी करने के लिये हमारी पार्टी खुलकर सामने आ गई। 

बाबरी मस्जिद के शर्मनाक विध्वंस के बाद दिसम्बर 1992 को कोलकाता में आयोजित भाकपा (माले) के पांचवें महाधिवेशन से लेकर छह वर्ष बाद लखनऊ में आयोजित केन्द्रीय कमेटी की बैठक तक, जब उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली, कामरेड विनोद मिश्र ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने खड़े इस सबसे बड़ी चुनौती का मुकाबला करने में अपनी समूची ऊर्जा और अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आज हमें भाकपा (माले) की इसी गौरवमय विरासत को अपनी पूरी शक्ति से बुलंद करना है और फासीवाद को परास्त करने तथा भारत को जनता के लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ाने के कार्यभार में अपना सर्वस्व योगदान करना होगा।









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Dilip Singh :: - 12-18-2018
Super

Pyarelal Bhamboo :: - 12-18-2018
फासीवाद मरणासन्न पूँजीवाद का अंतिम अवलम्बन है जो हर यत्न से सर्वहारा वर्ग की एकता और भाईचारे को तहस नहस कर तथा उसे आपस लड़ाकर शान्ति और व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर हर दमनकारी कानून और तौर तरीकोँ को वैध ठहराता है, तथा बल प्रयोग के तानाशाही तरीकोँ को न्यायोचित ठहराता है। सत्ता का केन्द्रीयकृत आदेशात्मक स्वरुप ही उसका मौलिक रूप है। वर्तमान समय मेँ फासीवाद एक ध्रुवीय या बहुध्रुवीय सत्ता केन्द्रोँ को विश्व के विभिन्न क्षेत्रोँ मेँ प्रयोग के रूप मेँ अपनाकर विश्व सर्वहारा को धर्म,जाति,क्षेत्रीयता और राष्ट्रीय हितोँ के नाम पर लड़ा रहा है। कारपोरेट के युग मेँ जब पूँजीवाद का स्वरूप स्पष्ट रूप से अन्तर्राष्ट्रीय हो चुका है। मेहनतकस आवाम को आखिर किस उद्देश्य की पूर्ति हेतु राष्ट्रवाद के नाम पर लड़ाया जा रहा है। उत्पादन के साधनोँ के रूप मेँ जहाँ एक ओर विज्ञान और तकनीक का अत्याधुनिक विकसित रूप उपयोग मेँ लाया जा रहा है, वहाँ दूसरी और सर्वहारा वर्ग को अंध विश्वासी, अतार्किक सांमती धार्मिक कट्टरतावादी सोच के अन्धकूप मेँ संचारतन्त्र के आधुनिक कुशल प्रयोग से नियोजित ढंग से ढकेला जा रहा है। वर्गचेतना से लैस सर्वहारा ही अपने वर्गहित को समझ कर इस फासीवादी कुचक्र से मेहनतकस आवाम की एकता और भाईचारे की रक्षा कर सकता है। आज के समय मेँ क्रांतिकारी शक्तियोँ के विकसित होने की यह पूर्व शर्त है। शोषण और जुल्म को सदा सदा के लिए मिटाने के एक मात्र विकल्प सर्वहारा क्रांति को सम्पन्न करने हेतु प्रयासरत क्रांतिकारी शक्तियोँ को इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु एकजुट होना होगा। ...... Pyarelal Bhamboo ......