Wednesday, July 6, 2022

‘‘आधी रोटी” का पूरा सच

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यह आत्मकथा एक ऐसे दलित व्यक्ति के जीवन-संघर्षों की गाथा है जिसने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित देवरिया जिले के एक छोटे से गांव चरियांव खास (जगदीशपुर मौजा मठबालागिर) में जन्म लिया था। जहां ग्रामीण जाति-व्यवस्था के साये में निर्द्वन्द पांव पसारे हुए जमींदाराना हेकड़ी एवं महाजनी सूदखोरी के कपटी चंगुल के गठजोड़ में जकड़ी हुई, उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधुआ मजदूरी के लिए अभिशप्त प्रजा के तौर पर नाना संताप झेल रही थी।

पूर्वांचल के अन्य गांवों की तरह ही यहां भी भूख, गरीबी, अशिक्षा, बंधुआ मजदूरी और जातीय दुराग्रह का अखंड साम्राज्य स्थापित था। ऐसे माहौल की दुश्वारियों से निकलकर उत्तर प्रदेश सरकार की उच्च सेवा तक पहुंचना कोई हंसी खेल नहीं। यही नहीं बल्कि लेखक ने अपनी नौकरी के दौरान साहसपूर्वक और कहीं-कहीं तो अपनी जान की बाजी लगाकर भी सरकारी सेवा में ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए जो इस बेईमान तंत्र में कदाचित असंभव नहीं, तो मुश्किल जरूर है। जो जरूरी बात है वह यह है कि लेखक अपने पिछले दिनों के दारिद्रय एवं मुफलिसी को कभी भूलता नहीं और इसीलिए वह समाज के प्रति संवेदनशील है और लगातार सामाजिक कार्यों में न सिर्फ रूचि लेता है बल्कि उसमें अगुवाई भी करता है। ऐसे जीवन संघर्ष की कथा से होकर गुजरना भी अपने आप में एक नया अनुभव होगा। ऐसे अनुभवों की गाथा लिखने वाले लेखक है मान्यवर हरि शरण गौतम।

‘‘आधी रोटी, वह भी बासी” – जैसे शब्दों से शुरू होकर यह आत्मकथा पाठक के मन में लगातार जिज्ञासा बनाए रखती है।

इस आत्मकथा को पचीस उप-शीर्षकों में बांटकर लिखा गया है। इसे हम मुख्य रूप से चार संदर्भो में समझ सकते हैं, बचपन में पारिवारिक परिस्थितियां, शिक्षा के लिए संघर्ष, विपरीत घरेलू परिस्थितियों के बावजूद भी लगातार उच्च सरकारी सेवा हेतु सतत संघर्ष  और कृषि विभाग- गंडक समादेश सेवा से लेकर बिक्रीकर में विभिन्न पदों पर सेवा के दौरान कई तरह के जीवन अनुभव और अंततः सामाजिक सेवाओं के जरिए व्यापक जन सरोकारों से जुड़ाव का सफर।

आत्मकथाकार हरि शरण गौतम ने गांव में आधा सेर ‘गोजई’ की दिन भर की मजदूरी के बदले माता-पिता, चाचा एवं दादी द्वारा जमीदारों के खेतों में काम करते हुए उनकी गरीबी, तंगदस्ती और बदहाली का सीधा-सच्चा एवं सजीव चित्रण किया है। पर्याप्त काम न मिल पाने के कारण तथा कम मजदूरी होने के कारण अक्सर ही घर में फाका होता था जिसका असर बालक हरि शरण गौतम पर पड़ना लाजिमी था।

‘‘आधी रोटी”, मां ने कांपते हुए हाथ में लेकर डबडबाई हुई आंखों और सिसकती आवाज में अपने हृदय के टुकड़े को पकड़ाते हुए कहा कि ‘‘बेटा, आज यही खा कर पढ़ने जाओ।“  जिसे बालक हरि शरण ने विरोध स्वरूप फेंक दिया था और बरसात की गीली मिट्टी में भीगने के बावजूद भी उस रोटी के टुकड़े को पोंछकर, छोटी बहन जिसका नाम ‘गेंदा’ था, खा गई थी।

यह चित्रण दिल को छूने वाला है। जहां मनुष्य और कुत्त- बिल्ली की भूख के व्यवहारों को आमने-सामने रखकर सोचने की गुंजाइश बनती है। गांव में भुखमरी या फांके की नौबत आने पर लोगों द्वारा सवैया लौटाने की शर्त पर अनाज उधार लेने का भी चलन था। लेकिन वह उधार भी शायद सबके लिए मयस्सर नहीं था। लेखक की मां को गांव की ही ‘‘धोबन चाची” द्वारा उधार देने से मना कर देने का प्रसंग भी सामने आता है।

लेखक का परिवार पुश्तैनी रूप से कबीरपंथी था, जहां अक्सर साधु-संत आया करते थे, किंतु आर्थिक कमजोरी ने धीरे-धीरे उन्हें बाहुबली-उच्च वर्गीय भू-स्वामियों का बंधुआ मजदूर भर बनाकर रख छोड़ा था। लेखक के पिता कोइलरी में इसलिए नौकरी करने नहीं जा पाए क्योंकि उनके ऊपर जमींदार का  500 रुपया का कर्ज था, जिसकी एवज में उन्हें गोरख राय नाम के भूमिहार की हलवाही करने के लिए मजबूर कर दिया गया। घर की छोटी सी खेती में पूरा घर मिलकर रात-दिन मेहनत एवं देखभाल करता था, किन्तु वहां भी पैदावार के नाम पर इतना कुछ नहीं था कि परिवार का पेट भर सके।

स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ने में अव्वल होने के बावजूद भी लेखकर को कदम-कदम पर अपमानित और प्रताड़ित किया गया एवं हतोत्साहित करके शिक्षा के मार्ग को रोका गया। लेखक ने एक ऐसे प्रसंग का जिक्र किया है जिसमें गोकुला राय नाम का हेड मास्टर यह घोषणा करता है कि ‘‘देखता हूं किस चमार का लड़का खैरबनुआ से मिडिल पास कर लेता है।” वह ऐसा इसलिए घोषणा करता है क्योंकि खैरबनुआ के कुछ चमारों ने उसके यहां काम करने से मना कर दिया था। ऐसे में लेखक को अन्य स्कूल में दाखिला लेना पड़ा। चूंकि लेखक पढ़ने में होशियार था, यह बात जानकर गांव के भूमिहार जमीदारों ने इनकी पढ़ाई छुड़ाकर अपने पास खाता-बही देखने के लिए रखने का प्रस्ताव उनके पिता को दिया था। ऐसी परिस्थितियों में भी हरि शरण गौतम ने अपनी कठिन मेहनत और लगन के द्वारा न सिर्फ शिक्षा प्राप्त की, बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने में उच्च श्रेणी की सफलता भी पाई। आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई ग्रामीण परम्परा के अनुसार उनकी शादी भी बहुत छोटी उम्र (कक्षा नौ में पढ़ने के दौरान) ही हो गयी थी, फिर भी उन्होंने अपनी पढ़ाई की उच्च अभिलाषा को न सिर्फ कार्य रूप में बदला बल्कि उसमें अच्छी सफलता भी प्राप्त की। इंजीनियरिंग कालेज में उनका दाखिला इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि उनके पास फीस और पढ़ाई के पैसे नहीं थे। यूनिवर्सिटी में बी. एससी, एम एससी करने के दौरान भी पैसे की तंगी के कारण फटे कपड़े, टूटी चप्पलें क्षण-क्षण तिलमिलाती एवं अपमानित करती थीं। ऐसे कई प्रसंग हैं जिससे जाहिर होता है कि लेखक ने विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई-लिखाई की रूचि को बनाए रखकर, उसमें भी महत्वपूर्ण स्थान अर्जित किया है।

इस आत्मकथा में उनके नौकरी के दौरान कार्यकलापों का विस्तृत लेखा जोखा है। नौकरी के दौरान लेखक को भौतिक जातिवाद के स्थान पर मानसिक जातीय दुराग्रह एवं भेदभाव ने कहीं अधिक प्रताड़ित किया तथा अक्सर हतोत्साहित किया है।

लेखक की पहली नौकरी कृषि विभाग में संगणक पद पर प्रारम्भ हुई, जहां पर उन्होंने अपने साथ जातीय भेदभाव को कई संदर्भों में इंगित किया है। यद्यपि डेढ़ वर्ष बाद ही उनकी प्रोन्नति सांख्यकीय निरीक्षक के पद पर हो गई थी, और उन्हें गण्डक समादेश, गोरखपुर में स्थानान्तरित कर दिया गया था। नौकरी में रहते हुए उन्होंने पीसीएस की परीक्षा देने के लिए अथक संघर्ष किया और कुछ विभागीय अधिकारियों द्वारा इस बावत उन्हें परेशान भी किया गया लेकिन उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल करके ही छोड़ा। अन्ततः पीसीएस 1984 बैच में चयनित होकर 1986 में बिक्री कर विभाग में अधिकारी के रूप में अपना पदभार इटावा में ग्रहण कर लिया।

इटावा में रहते हुए उन्होंने कई घटनाओं का जिक्र किया है जिसमें उन्हें डराने घमकाने के मामले शामिल हैं, किन्तु उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता तथा कार्य कुशलता से कहीं भी अपनी हार नहीं होने दी। इटावा में ही लेखक के वरिष्ठ प्रभारी अधिकारी की बदमाशों ने हत्या कर दी थी, जिसके कारण उन्हें मनोवैज्ञानिक झटका भी महसूस हुआ किन्तु इन विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने कभी भी लोभ, लालच या दबाव में अपने कर्तव्यों के साथ समझौता नहीं किया। बिक्री कर अधिकारी के रूप में लेखक को कई ऐसे संवेदनशील स्थानों पर काम करना पड़ा, जहां या तो माफिया बाहुबलियों का बोलबाला था या टैक्स अपवंचकों की उच्च स्तरीय अफसरों और मंत्रियों से सांठगांठ थी। दलित अधिकारी होने के कारण उन्हें हर ऐसे स्थान पर तैनात किया जाता था, जहां हर तरह के ऐसे खतरे थे तथा इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति थी या तो बदमाश बाहुबलियों के हाथों मारे जाओ या नौकरी का खतरा मोल  लो। फिर भी लेखक ने बड़ी सूझबूझ से अपना कार्य सम्पन्न किया तथा इसके लिए उन्हें कई बार पारितोषिक भी मिला। फिर भी कई बार उनके किए कार्यो की प्रशंसा दूसरों को मिली और उन्हें हतोत्साहित किया गया। एक जगह पर उन्होंने ‘‘अम्बेडकर इन्टरप्राइजेज”‘ नाम की फर्जी फर्म बनाकर एक व्यापारी द्वारा अम्बेडकर के नाम पर ठगी का सनसनीखेज मामला उजागर करने की बात लिखी है। लेखक ने नौकरी के दौरान कई प्रकरणों में विपरीत परिस्थितियों का जिक्र किया है, जिसमें जातीय कारणों से उन्हें अपमानित करने की कोशिश की गई।

आत्मकथाकार हरि शरण गौतम ने अपने जन्म स्थान के अपने जीवन संघर्षो का वर्णन करते हुए नौकरी पाने से लेकर नौकरी में भिन्न-भिन्न स्थानों पर कार्य के दौरान होने वाली घटनाओं का जिक्र किया है। ज्यादातर घटनाओं में उन्होंने दलित समाज के प्रति सवर्ण समाज के व्यक्तियों के मन में उपहास, उपेक्षा तथा अमर्यादित आचरण के कथानक भी सामने लाए हैं जो पूरी तरह से प्रामाणिक हैं।

पुस्तक का अन्तिम भाग लेखक द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों का दस्तावेज है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेखक ने एससी/एसटी के प्रमोशन में आरक्षण से लेकर ओबीसी की 17 जातियों को एससी/एसटी ग्रुप में शामिल किए जाने सम्बन्धी सरकार की अनुशंसा पर जो संवैधानिक लड़ाई लड़ी है, उसका दिलचस्प वाकया देखने को मिलता है। गोरखपुर में रहते हुए लेखक ने छोटे-छोटे दलित संगठनों का एक फेडरेशन बनाया तथा अपनी सामाजिक न्याय की लड़ाई को नई धार दी।

कुल मिलाकर ‘‘आधी रोटी” नाम की आत्मकथा, जो हाल ही में दलित साहित्य एवं संस्कृति मंच गोरखपुर, उत्तर प्रदेश द्वारा वर्ष 2021 में प्रकाशित की गई है, अपने कथ्य तथा तथ्य के कारण बहुत ही महत्वपूर्ण बन पड़ी है। ‘‘आधी रोटी” के आत्मकथाकार हरि शरण गौतम बिक्री कर विभाग में एडीशनल कमिश्नर, वाणिज्य कर के पद से दिसम्बर 2013 में कानपुर से सेवानिवृत्त हुए हैं तथा गोरखपुर में बस गये हैं। वे उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति/ जनजाति संगठनों का संयुक्त मोर्चा, गोरखपुर के प्रान्तीय अध्यक्ष हैं, तथा डॉक्टर बी.आर. अम्बेडकर पुस्तकालय एवं जन कल्याण समिति, गोरखपुर के अध्यक्ष हैं। आप मठबालगिर बुद्ध विहार समिति, जगरीशपुर, चरियांव खास, गौरी बाजार, देवरिया के भी अध्यक्ष हैं।

‘‘आधी रोटी” (आत्मकथा)

लेखक: हरि शरण गौतम

प्रकाशकः दलित साहित्य एवं संस्कृति मंच गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

मूल्य: 250/- रूपए (पेपरबैक)

    : 300/- रूपए (हार्ड कवर)

मोबाइल नम्बर: 9451519473

(पुस्तक समीक्षा- बी. आर. विप्लवी)

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