Sunday, August 7, 2022

काकोरी के शहीद बताते हैं कि भीख नहीं कुर्बानियों से मिली है आजादी

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‘कस ली है कमर अब तो,कुछ करके दिखाएंगे,

आजाद  ही  हो  लेंगे, या सर  ही  कटा  लेंगे…’

 ( काकोरी केस के वीर शहीदों की पुण्य तिथि के पावन अवसर पर )

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गुलामी से त्रस्त और सिसकते इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए मन-मस्तिष्क को झकझोर देने वाले इस बेहतरीन शेर से शायद ही कोई और बेहतरीन शेर लिखा गया हो। यह शेर किसी बहुत बड़े नामचीन शायर ने नहीं लिखा अपितु इस देश के हरदिल-अजीज पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के जिगरी दोस्त 30 वर्ष की अल्हड़ आयु में फैजाबाद की जेल में फाँसी पर झूलने से पूर्व ये कहकर कि ‘हम किसी भी तरह से क्रांति लाना चाहते हैं,मैं भारत के सभी लोगों से यह विनम्र निवेदन करना चाहता हूँ कि हर हाल में हिन्दू-मुस्लिम एकता कायम रहे,वे आपस में न लड़ें,जैसे भी हो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से आजादी की क्रांति की जोरदार तैयारी हो, अशफाक उल्ला खां ने लिखा है।

‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ वारसी हसरत की संघर्ष की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता का एक अद्वितीय अध्याय है। अशफ़ाक हिन्दू-मुस्लिम एकता और सौहार्द के इतने प्रबल पक्षधर थे कि एक बार शाहजहांपुर में भयावह दंगा छिड़ा हुआ था,तब अशफ़ाक अपने परम् मित्र बिस्मिल के साथ एक आर्य समाज के मंदिर में बैठे हुए थे। दंगाई मुसलमान इस मंदिर में भी आग लगाने की फिराक में थे,अशफ़ाक इसे तुरंत भांप लिए और तुरंत अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर निकालकर दंगाई मुसलमानों की तरफ लहराते हुए गरजते हुए बोले कि ‘मैं भी कट्टर मुसलमान हूँ,लेकिन इस मंदिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से भी प्यारी है,मेरे लिए मंदिर और मस्जिद दोनों एक जैसे सम्मानित हैं,अगर किसी ने इस मंदिर की तरफ आँख उठाकर देख लेने तक की भी जुर्रत की तो उसके सीने में मैं बिना वक्त गवांए अपनी गोली उतार दूँगा।’ सारे दंगाई मुसलमान अशफ़ाक की इस जोरदार धमकी से बिल्कुल सहम गये और उस मंदिर पर किसी भी मुस्लिम दंगाई की ये हिम्मत नहीं हुई कि उसकी तरफ आँख उठाकर भी देख सकें। इस लेख का शीर्षक उक्त शेर उसी शेरदिल अजीज अशफ़ाक उल्ला खाँ ने लिखा है।

                उन्होंने आगे लिखा..

‘जमीं दुश्मन,जमां दुश्मन,जो अपने थे पराए हैं,

सुनोगे   दास्ताँ   क्या   तुम   हाले   परेशाँ   की,

हटने  के   पीछे,   डर   कर   कभी   जुल्मों  से,

तुम    हाथ    उठाओगे,   हम   पैर    बढ़ा   देंगे,

बेशस्त्र  नहीं  हैं हम,   बल  है   हमें  चरखे  का, 

चरखे  से  जमीं  को  हम, ता  जर्ख  गुँजा  देंगे,

परवा नहीं कुछ दम की,गम की नहीं मातम की,

है   जान    हथेली   पर,   एक   दम   गँवा   देंगे,

उफ्  तक  भी जुबां से हम,हरगिज़ न निकालेंगे,

तलवार उठाओ तुम, हम  सर  को  झुका    देंगे,

सीखा  है  नया  हमने ,लड़ने  का  यह  तरीका,

चलवाओ  गन  मशीनें,  हम   सीना  अड़ा  देंगे,

दिलवाओ   हमें   फाँसी , ऐलान   से  कहते  हैं,

खूँ  से  ही   हम  शहीदों   के , फौज   बना  देंगे,

मुसाफिर जो  अंडमान के तूने  बनाए  जालिम,

आजाद    होने   पर , हम   उनको   बुला  लेंगे । ‘

काकोरी कांड के ये सभी स्वातंत्र्यवीर जब जेल से अपने मुकदमों की सुनवाई के लिए कोर्ट जाते थे तब अशफ़ाक उल्ला खाँ द्वारा रचित उक्त यह वीरोचित गीत समवेत स्वर में गाते हुए जाते थे।

पश्चिमोत्तर भारत में जैसे शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की क्रांति का अलख जगाया था,ठीक उसी प्रकार मध्य उत्तर भारत के भूभाग पर एक और मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों की जमात,जिसमें प्रमुख रूप से पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफ़ाक उल्ला खाँ और राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी आदि जैसे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों के खिलाफ अपना सीना ठोककर स्वतंत्रता के रण में अपनी आहुति देने के लिए तैयार बैठे थे,30 वर्षीय पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर में, 27वर्षीय अशफ़ाक उल्ला खाँ को फैजाबाद में और 35 वर्षीय ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद में बर्बर ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु की शहादत दिवस 23 मार्च 1931से भी तीन साल तीन महीने पूर्व ही 19-12-1927 को फाँसी पर लटका दिया था। काकोरी कांड में शहीद हुए इस देश के तीनों प्रमुख महानायकों क्रमशः पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ और ठाकुर रोशन सिंह के अतिरिक्त एक और महानायक थे 26 वर्षीय शहीद राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी,जिन्हें इन तीनों महानायकों को फाँसी देने से भी दो दिन पूर्व ही अंग्रेजों ने उन्हें 17-12-1927 को ही गोंडा जेल में फांसी देकर उनका दम घोंट दिया था। इस लेख में हम काकोरी केस के शहीदों के कृतित्वों और वक्तव्यों तथा उनके उदात्त विचारों पर संक्षिप्त प्रकाश डालेंगे तथा अशफ़ाक उल्ला खाँ के जीवन परिचय और उनके देशहित, उनके प्रखर व्यक्तित्व पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डालेंगे।

हमारी स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अपनी कुर्बानी देने वाले सभी शहीदों की प्रबलतम् और पवित्रतम् यही इच्छा थी कि ‘इस दुनिया में समस्त मानव जाति के लिए पूर्ण स्वतंत्रता हो,इस धरती पर विद्यमान सभी प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का समान रूप से बराबर का हक हो, कोई भी किसी का गुलाम ना हो,इस दुनिया का कोई भी शख्स भूखा,नंगा,अशिक्षित न हो,आपस में कोई जातीय व धार्मिक विद्वेष न हो,इसके विपरीत सर्वत्र भाईचारे,अमनचैन,प्रेम,इंसाफ, आजादी व खुशहाली हो। ‘

अपनी फाँसी से पूर्व पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने पुरजोर ढंग से अपना एक शेर सुनाया था कि 

 ‘ अब  ना  एहले  वलवले हैं

         और न अरमानों की भीड़,

      देश पर  मिटने की हसरत 

अब दिल ए बिस्मिल में है। ‘

            फिर उससे भी ऊँची आवाज में दहाड़े कि…  ‘ मैं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का पतन चाहता हूँ। ‘

सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय,करूणा, शांति और मंगल की कामना वाले साम्यवादी विचारधारा के अनन्य समर्थक राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फाँसी के फंदे की तरफ ले जाने से पूर्व जब उन्हें हथकड़ी लगाई जाने लगी तो उन्होंने पुलिसकर्मियों से कहा कि ‘मुझे हथकड़ी लगाने की कोई जरूरत नहीं है,मैं फाँसी के तख्ते की तरफ खुद चलूंगा ‘ और वे तुरंत बगैर हथकड़ी के फाँसी के तख्ते की तरफ चल पड़े थे।

अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह फाँसी के दिन अलसुबह ही अपनी बैरक में कठोर व्यायाम कर रहे थे,जब जेल के वार्डन ने उनसे इसका कारण पूछा तो वे बगैर वक्त गँवाए बोले कि  ‘मैं अपनी मातृभूमि पर फिर से जन्म लेना चाहता हूँ, इसलिए मैं चाहता हूँ कि मैं और भी बलिष्ठ पैदा होंऊँ। ‘ 

अशफ़ाक़ उल्ला खाँ का जन्म 22 अक्टूबर सन् 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन के बिल्कुल नजदीक स्थित शहीदगढ़ के कदनखैल जलालनगर मुहल्ले में हुआ था, वे एक बहुत ही संपन्न परिवार में जन्मे थे, लेकिन उनका मन पढ़ने-लिखने में कभी नहीं लगा,अपितु उन्हें तैराकी, घुड़सवारी और शिकार खेलने में बहुत ही रूचि थी,बचपन से ही उन्हें देश के प्रति बहुत लगाव था,उन्हें परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े देश को स्वतंत्र कराने के लिए किए जा रहे आंदोलनों के प्रति बहुत जिज्ञासा थी। धीरे-धीरे उनके अंदर भी क्रांति की ज्वाला हिलोरें मारने लगी,वे चाहते थे कि उनकी भी एक ऐसे व्यक्ति से भेंट हो जो इस देश को स्वतंत्र कराने वाले किसी क्रांतिकारी संगठन का सदस्य हो,उस समय मैनपुरी षड्यंत्र केस चल रहा था,उस केस में एक वारंट शाहजहांपुर के एक बहादुर युवक के नाम भी था। उन्हें यह जानकर बहुत खुशी और हैरानी हुई कि वह नवयुवक कोई और नहीं अपितु उनके शहर का ही एक बहादुर नौजवान पंडित राम प्रसाद बिस्मिल था। परन्तु मैनपुरी षड्यंत्र केस की वजह से उस समय पंडित राम प्रसाद बिस्मिल भूमिगत थे,इस मामले के शांत होने के बाद अशफ़ाक बिस्मिल से मिले और अपने व्यक्तित्व, जज्बे और वीरोचित्त व देशहित में लिखे शेरों से बिस्मिल का दिल जीत लिए,दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हुई और जीवनपर्यंत यथावत रही,ये दोस्ती तभी टूटी जब दोनों को एक ही दिन अलग-अलग जगहों पर फाँसी हुई। 

अशफ़ाक उल्ला खाँ भी गांधीजी से अत्यंत प्रभावित थे,लेकिन चौरीचौरा काँड के बाद गांधीजी द्वारा अचानक असहयोग आंदोलन को वापस ले लिए जाने के निर्णय से उनका भी अपने समकालीन क्रांतिकारियों की तरह गांधीजी से बिल्कुल मोहभंग हो गया। 8 अगस्त, 1925 को शाहजहाँपुर में क्रांतिकारियों की एक महत्वपूर्ण मीटिंग देर रात तक चलती रही और 9 अगस्त 1925 को गरीब भारतीय लोगों से बेशर्मी और बेरहमी से टैक्स वसूल कर खजाने भरने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का खजाना काकोरी स्टेशन के पास लूट लिया गया। खजाना लूटने वालों में चन्द्रशेखर आजाद, अशफ़ाक उल्ला खाँ,पंडित राम प्रसाद बिस्मिल,राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी,ठाकुर रोशनसिंह,सचिन्द्र बक्शी,केशव चक्रवर्ती,बनवारी लाल,मुकुन्द लाल और मन्मथनाथ गुप्त सहित 25 लोग शामिल थे। खजाना लूटने में शामिल सभी लोग अपना वास्तविक नाम और हुलिया बदल लिए थे यथा अशफ़ाक उल्ला खाँ ने अपना नाम ‘कुमार जी ‘रख रखा था।

काकोरी में खजाने को लूटने के कार्य को सफलतापूर्वक संपादित करने के बाद केवल अशफ़ाक और चंन्द्रशेखर आजाद के सिवा लगभग सभी क्रांतिकारी पकड़े गए,ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार अशफ़ाक वाराणसी जाकर 10 महीने एक कंपनी में काम किए,लेकिन क्रांतिकारी आंदोलन में अधिक पैसे कमाकर उसे अधिक सशक्त बनाने के उद्देश्य से वे विदेश जाने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए वे अपने दिल्ली निवासी एक पठान दोस्त से मदद लेनी चाही थी। लेकिन वह पठान देशद्रोही व देश का गद्दार निकला वह अंग्रेजों से भारी ईनाम के प्रलोभन में अशफ़ाक़ उल्ला खाँ को पकड़वा कर जेल भिजवा दिया,अंग्रेजों द्वारा घोर मानसिक व शारीरिक यंत्रणा देने के बावजूद भी अशफ़ाक नहीं झुके तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बन जाने का प्रलोभन दिया परन्तु स्वातंत्र्यवीर अशफ़ाक ने उन्हें दो-टूक करारा जवाब दिया कि ‘ तुम लोग हिन्दुओं -मुस्लिमों में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को अब बिल्कुल नहीं दबा सकते, मैं अपने दोस्तों के ख़िलाफ कभी गवाही नहीं दूँगा। ‘

उक्तवर्णित वृतांत से यह पूरी तरह परिलक्षित होता है कि इस देश को स्वतंत्र कराने में हमारे शहीदों ने अपने खून से इस देश को सींचा है,तब जाकर यह देश नराधम और खूंखांर शोषक दरिंदे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के चंगुल से मुक्त हुआ है। लेकिन अत्यंत खेद के साथ लिखना पड़ रहा है कि वर्तमान समय की भारत की सत्ता  ऐसे फॉसिस्ट,क्रूर और ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों के चाटुकारिता करने वाले,इस राष्ट्र के साथ गद्दारी करने वाले कुछ समूहों के हाथों में चली गई है। इन्हीं की विचारों की प्रबल समर्थक एक अर्धनग्न शरीर दिखाने वाली बालीवुड की एक एक्ट्रेस के इस कथन से कि   ‘इस देश को स्वतंत्रता भीख में मिली है। ‘ से इस देश के लिए शहादत देने वाले शहीदों की रूह भी घृणा से कराह रही होगी।

हमारे शहीदों के सपने ‘इस दुनिया में समस्त मानव जाति के लिए पूर्ण स्वतंत्रता हो,इस धरती पर विद्यमान सभी प्राकृतिक संसाधनों पर सभी का समान रूप से बराबर का हक हो,कोई किसी का गुलाम ना हो,इस दुनिया का कोई भी शख्स भूखा,नंगा,अशिक्षित न हो,आपस में कोई जातीय व धार्मिक विद्वेष न हो,इसके विपरीत सर्वत्र भाईचारे,अमनचैन, प्रेम,इंसाफ,आजादी व खुशहाली हो ! ‘ के बिल्कुल खिलाफ अपने दो-चार पूँजीपतियारों को देश का संपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों और अन्य संसाधनों को रेवड़ी की तरह बाँट देने वाले वर्तमान समय के सत्ता के बर्बर और क्रूर कर्णधारों को जितनी जल्दी हो सत्ता से बेदखल करने के लिए इस देश के सभी लोगों को सशक्त, संगठित और प्रबलतम् विरोध करना ही चाहिए। इसी अभीष्ट कार्य से उक्तवर्णित सभी वीर शहीदों को सबसे सर्वोत्कृष्ट पुष्पांजलि और श्रद्धांजलि होगी ।

(निर्मल कुमार शर्मा राजनैतिक,सामाजिक, आर्थिक,पर्यावरण आदि विषयों पर लिखते हैं।)

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