Saturday, October 1, 2022

पहाड़ की खुरदुरी जमीन पर मोहन मुक्त ने खड़ा किया है कविता का हिमालय

ज़रूर पढ़े

वो तुम थे एक साधारण मनुष्य को सताने वाले

अपने अपराध पर हँसे ठठाकर,

और अपने आसपास जमा रखा मूर्खों का झुंड

 अच्छाई को बुराई से मिलाने के लिए, कि न छंट सके धुंध,

बेशक हर कोई झुका तुम्हारे सामने

कसीदे पढ़े तुम्हारी शराफ़त और अक़्ल के

तुम्हारे सम्मान में झलके गोल्ड मेडल

जीवित रहे, ख़ुश हुए,

न सोच लेना ख़ुद को महफ़ूज़। कवि को याद है।

एक को मारोगे, और जन्म लेंगे

सब कुछ हो गया है दर्जः शब्द, हरकतें और तारीख

और तुम्हारे काम आ सकती है बेहतर एक सर्द सुबह

एक रस्सी, और तुम्हारे भार से झुकी हुई एक डाल।

पोलिश कवि चेस्लाव मिवोश की कविताः सताने वाला  

रिचर्ड लाउरी के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित रूपांतर

(साभारः द कलेक्ट्ड पोएम्सः 1931-1987, द एक्को प्रेस, 1988)

युवा कवि मोहन मुक्त ने अपनी कविताओं से हिंदी कविता संसार में खलबली मचा दी है। मोहन के काव्य पर नोट्स लिखते लिखते, देहरादून स्थित समय साक्ष्य प्रकाशन से “हिमालय दलित है” (2022) का दूसरा संस्करण भी छप कर आ चुका है। हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में उनकी जगह क्या है, इस बारे में स्पष्ट रूप से कोई दलील यहां पर नहीं दी जा रही है लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि ये रिश्ता शायद उतना सहज और गलबही वाला न हो क्योंकि मोहन साहित्य के मठाधीशों, और जातीय, सवर्णवादी, सामंती वर्चस्वों को न सिर्फ़ फ़ाश कर रहे हैं बल्कि उनकी धज्जियां भी अपनी कविता और विचारों के माध्यम से उड़ाते आ रहे हैं।

दूसरा वो दलित साहित्य का वो स्वर है जो पहली बार इतने मुखर और बेबाक हैं कि अपने दलित होने की व्यथा-कथा नहीं बल्कि प्रखर अंदाज़ में आत्मसजगता और अंतर्विरोधों का वर्णन कर रहा है और दलितों और उत्पीड़ितों को अपने खोये सम्मान के लिए एक नयी भाषा में जगा रहा है। वो एक नयी पुकार के लिए उठा स्वर है। उसकी अदम्यता और हौसले का ही ये उन्मेष है कि वो ये कहने का साहस करता है कि हिमालय दलित है। और ‘वो ख़ुद जमा हुआ है, वो ख़ुद थमा हुआ है।’ (पृ 17, पृ 120)

मोहन उस अनुनय विनय सत्कारी सद्भाव के छद्म वाली कुलीन, अभिजात सवर्ण दुनिया के सामने विनीत होकर अपनी बात नहीं रखते क्योंकि इस छद्म विनम्रता या कथित सौम्यता की आड़ में जो घटित होता आया है उससे भी वो बाख़बर हैं लिहाज़ा अपनी बात दो टूक रख देते हैं। इसका आशय ये नहीं कि मोहन भाषा में संयमी नहीं हैं और एक मानवीय गुण से वंचित हैं। आप उनकी कविताओं को पढ़कर जानेंगे कि दबे कुचले नागरिक समुदाय से समानुभूति यानी एम्पैथी का कैसा विरल संसार उन कविताओ में व्याप्त है। अपने जन की चिंता का ऐसा नागरिक उद्वेग ऐसी बेचैनी, सिर्फ किसी नारे या जोश की मोनोटनी नहीं हो सकती। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और ऐतिहासिक हैं।

जब मैं कहता हूँ लौटों जड़ों की ओर

तो उसका मतलब है लौटो जड़ की ओर

जो एक है।।।केवल एक ही

जब मैं कहता हूँ लौटों जड़ों की ओर

तो मैं उस जगह की बात करता हूँ

जहाँ विज्ञान और दर्शन में कोई विरोध नहीं

(कविता जड़ों की ओर।।।पृ 71)

मोहन सदियों के अत्याचारों और शोषणों से कराहती आ रही पीड़ित मनुष्यता का पक्षधर कवि हैं। वो सीधे उस जनता को संबोधित कवि हैं जो अदृश्य अप्रकट और अगोचर और अमूर्त नहीं है, बाकायदा उपस्थित है, हाड़मांस वाली है और प्राणवान है और रक्तरंजित है। सदियों के जख्मों की याद दिलाती, उन्हें भरते हुए भी न भूलने के लिए हमेशा जगाए रखती, प्रेरित करती रहती कविता है उनकी, उसमें शास्त्रीयता का, व्याकरण का कविता की अपनी छटाओं और विशिष्टताओं का बोलबाला नहीं है, वो सजीधजी बनीठनी नहीं है वो बिल्कुल खुरदुरी सख्त और बाज़दफा शुष्क है।

कविता के पंडितों और मान्यवरों को ये कविताएं शायद स्वीकार्य न हो, हो सकता है इसमें हज़ार कमियां गल्तियां कमज़ोरियां और काव्यगत विशेषताओं-ख़ूबियों का अभाव या कमी बताई जाए या बताई जा रही हो लेकिन यहां तो ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि मोहन की कविताओं की विशिष्टता उनका वो उबड़खाबड़ स्वर ही है। वो शुष्कता और खुरदुरापन ही उनकी कविता की ज़मीन है और उनकी सादगी और सच्चाई मौलिक है, ठीक जैसे एक धरती होती है जिसमें अपनी प्यास बुझाने के लिए नागरिकों को भटकना और तड़पना पड़ता है। मोहन इस धरती के संसाधनों पर मजलूमों और वंचितों, दलितों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, और समाजों-संस्कृतियों-राजनीतियों से बेदखल लोगों के हक के लिए जगह बनाती, आवाज़ उठाती, लड़ती भिड़ती, चोट खाती, गिरती फिर उठती कविता के शिल्पकार हैं।

जब भी पहाड़ी सीढ़ीनुमा खेतों की बात होती है

उनके सौंदर्य की बात होती है

तो मुझे उनमें दर्जे दिखाई देते हैं

इंसानों के दर्जे

ऊपर और नीचे तक फैले

अपनी अपनी जगह स्थिर

जब उन खेतों के किनारे की पगडंडियों का ज़िक्र होता है

तो मुझे डोलियाँ याद आती हैं

अरे सुहागनों और दुल्हनों वाली डोलियाँ नहीं

अजन्मे बच्चों के साथ तड़पती

अपने जिस्म से बहते ख़ून की तरह बर्बाद हो चुकी

औरतों की डोलियाँ

रोगियों की डोलियाँ

(कविताःनिराश, पृ 101)

चिली (चीले) के कवि पाब्लो नेरुदा ‘इम्प्योर पोएट्री’ यानी अशुद्ध या मैलीकुचैली, खुरदुरी कविता के पक्षधर थे। इसे लेकर उन्होंने 1935 में एक छोटा सा लेकिन तीक्ष्ण निबंध भी लिख डाला था। निबंध क्या है गद्य कविता जैसा एक लंबा थरथराता नोट है। नेरुदा के इस नोट को उनके चाहने वाले उनका एक घोषणापत्र भी कहते हैं। “दिन और रात के कुछ खास पलों में स्थिर चीज़ों के संसार को क़रीब से देखना अच्छा है। खनिजों और सब्जियों का बोझ ढोते हुए लंबी धूल भरी दूरियों को पार करने वाले चक्के, कोयले के ढेरों से निकले बोरे, पीपे और टोकरे, कारपेंटर के औजारों के बक्से के हत्थे और कुंदे। आदमी का धरती से संपर्क का बहाव इन तमाम चीज़ों से होता है जैसे कि तमाम संकटग्रस्त गीतकारों का एक पाठ।।।”

“…वही हो वो कविता जिसकी हमें तलाश हैः हाथ के अहसानों से उधड़ी हुई, जैसे कि एसिडों से, पसीने और धुएं मे तरबतर, लिली और पेशाब की गंध से सराबोर, हमारी रोज़ीरोटी के कारोबारों में अलग अलग ढंग से छितरी हुई, कानून के भीतर और उससे आगे कहीं। कविता हो इतनी बेरौनक, इतनी मैली, इतनी अशुद्ध जैसे कि हमारे पहने हुए कपड़े, या हमारी देहें, सूप के दाग से भरे, हमारे शर्मनाक व्यवहार में धूल-धूसरित, हमारी त्यौरियां और हमारी झुर्रियां और हमारे रतजगे और हमारे सपने, पर्यवेक्षण और भविष्यवाणियां, नफ़रत और प्रेम के हमारे ऐलान, हमारी मौजें और दरिंदगी, मुठभेड़ के धक्के, राजनीतिक वफ़ादारियां, इंकार और संदेह, अभिपुष्टियां और आज़माइशें और वसूलियां।” इस तूफ़ानी नोट के अंत में नेरुदा लिखते हैं, “जिन्हें चीज़ों के बुरे स्वाद से परहेज़ है वे मुंह के बल बर्फ़ पर गिरेंगे।“ (https://penguin।co।in/toward-an-impure-poetry-by-pablo-neruda/)

नेरुदा ने कहा था कि, “मैं अपनी कविता में हमेशा लोगों के हाथों को देखना चाहता हूं…मैंने हमेशा ऐसी कविता को तरजीह दी है जिसमें अंगुलियों के निशान दिखाई देते हैं- दोमट जैसी उपजाऊ मिट्टी की कविता जिसमें पानी गा सकता है, रोटी की कविता जिसमें हर कोई खा सकता है।” बर्तोल्त ब्रेख़्त की ‘बुरे वक्तों में क्या होगा गान’ वाली प्रसिद्ध और लीजेन्डरी कविता को भी हम यहां पर याद कर सकते हैं।

भाषा अगर दमन और सामाजिक कलंक का ठिकाना है तो वो प्रतिरोध और संघर्ष का ठिकाना भी है। ये प्रतिरोध ऐसी मुखर, बेबाक, ठोस, और गैरकुलीन, गैर अभिजात, गैर पवित्रतावादी, गैर शुचितावादी, गैर शुद्धतावादी, गैर संस्कारवादी भाषा में प्रकट होता है जिसका कोई सानी नहीं। ये हमें फिर संगीत में उपजे प्रतिरोधों और बेचैनियों की ओर ही ले जाता है जो हम आदिवासियों के गीतों से लेकर कालों के जैज़ में कांपता उठता थरथराता देख सुन सकते हैं। वो संगीत के अलावा कला में भी मौजूद है। इस लिहाज़ से देखेंगे तो अमूर्तता कोई बुरी चीज़ नहीं है। अन्यायों के खिलाफ दलित चेतना एक अमूर्त बुलंदी में भी अपना आकार पा सकती है- एक ठोस अमूर्तता, एक अमूर्त अमूर्तता नहीं। ये थोड़ा पेचीदा सी बात है और मोहन की कविताएं समाज और समय और संस्कृति की पेचीदगियों को अपने ढंग से उद्घाटित करती है। 

ये भाषा सजीधजी नहीं है, सजावट और ऋंगारिक उपायों का रुख नहीं करती है। विषय को दबाती छिपाती या न्यूट्रलाइज़ नहीं करती है। ब्राह्मणवादी संस्कृति के अनाचारों को उद्घाटित अनावृत्त कर देने वाली भाषा है। तमिल लेखक बामा ने कहा था, दलित को दलित की तरह लिखना चाहिए। और इस नाते यथास्थिति की सतही स्वच्छता और सुव्यवस्था को, व्याकरण, वाक्य-विन्यास और छंद के नियमों, शुद्ध, दैवीय और संस्कारी भाषा की कथित श्रेष्ठता को छिन्न-भिन्न कर देना चाहिए।

मैं गड़ता रहूँगा

तुम्हारी आँखों में

मैं चुभता रहूँगा

तुम्हारे जबड़ों में

तुम्हारे हर मज़े को

मैं बेमज़ा कर दूँगा

घृणा से जब थूक दोगे तुम मुझे

तो मैं थालियों में संगीत बनकर बज उठूँगा

जिसकी आवृत्ति

ज्वालामुखी के गहरे हृदय को झकझोर देगी

कंकड़ हूँ मैं।।।

(कविताः कंकड़, पृ 264)

***

बाज़दफ़ा ये भी महसूस होता है कि मोहन की ये कविताएं मेरी लिखी कविताओं को आईना दिखाती हैं। वे मेरी कविताओं से सवाल पूछती और उनके आसमान पर मंडराती छायाओं की तरह है। बाज़दफा ये साए मेरे दिल में उतर आते हैं और वहां उत्पात मचाते हैं। एक दलित वेदना या अपमान या संघर्ष क्या मेरी कविता समझ सकती है। क्या वो उसका बखूबी और इन्टेन्स वर्णन कर सकती है, क्या मैं एक दलित आह के भीतर झांक सकता हूं कि वहां कितना गहन और विराट अंधकार है क्या मैं उस अंधकार को पहचानता हूं, क्या मैं उस चेतना को ग्रहण कर सकता हूं जो एक दलित होने से निबद्ध रहती है। मेरे पास ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो मुझे झिंझोड़ते और फटकारते आए हैं और मोहन मुक्त की कविताएं नये अंदाज़ में नयी भाषा में लेकिन एक ऐतिहासिक क्षोभ और पीड़ा के साथ याददिहानी के लिए मेरे पास आई हैं। भाई तुम कहां हो।

तुम्हारी कविता क्या कर रही है, हिंदी की कविता का सवर्ण कुलीन संसार क्या कर रहा है। क्या तुम उसमें जगह रखते हो अगर नहीं रखते हो तो फिर कौन सी जगह के आकांक्षी हो फिर कौन सा नया रास्ता तुमने अख़्तियार किया है या बनाया है। हिंदी के भीतर इतनी सारी हिंदियां किस हाल में हैं। तुम कौन सी हिंदी के प्रतिनिधि हो और मोहन मुक्त कौन सी हिंदी का। क्या तुम दोनों एक ही हिंदी लिखते हो बोलते हो सोचते हो अमल में लाते हो। अगर नहीं तो ऐसा क्यों है और इसके पीछे कौन है। क्या तुम उस शक्ति को पहचानते हो क्या उसे टोक सकते हो क्या मोहन की कविता उस शक्ति को पहचानती है और उसे चेलैंज करती है और उसकी आवाज़ की निर्मितियां इतनी व्यापक हैं कि अनुगूंज की तरह सदियों से तुम्हारे और तुमसे पहले के लोगों, पूर्वजों के कानों से गुज़रती आई हैं। क्या तुम अनसुने के कवि हो। या जो अनसुना रहता आया है उसका कवि मोहन मुक्त है, तुम नहीं या तुम्हारे जैसे लोग नहीं है।

मोहन की कविताएं सहसा एक स्थानीय दंश से उठकर वंचितों की सर्वकालिक और विश्वव्यापी व्यथा, यातना और प्रतिरोध की कविता बन जाती है। फिर हमारे सामने एक बड़ा भूमंडल ज़ाहिर होने लगता है, वही वैश्विक सवर्णों का, कुलीन अधिपतियों का, साम्राज्यवादियों और नवपूंजीपतियों का, एक चाटुकार और ढहे हुए मध्यवर्ग का, लिबर्टी और लड़ाई और धन और ऐश्वर्य को एक साथ साधते एनजीओवादियों का। और इसी भूमंडल के किनारों से धधकती रौशनियों की प्रखरता और ज्वालाओं की तपिश हमें महसूस होने लगती है।

अफ्रीकी महाद्वीप के जनसंघर्ष, ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों का दमन, औपनिवेशक कॉमनवेल्थ की क्रूरताएं और लोकतंत्र की आड़ में चली आ रही धूर्तताएं, अमेरिका के कालों का आंदोलन, लातिन अमेरिकी समुदायों का पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा संघर्ष- मोहन मुक्त की कविताओं में ये सारी छवियां अपना आकार बनाती हुई हमारे समक्ष उपस्थित हो जाती हैं और अपने अपने सवालों से हमें सराबोर और परेशां और बेचैन करती हैं।

इसी सिलसिले में भारतीय उपमहाद्वीप में वंचितों की लड़ाई को भी देखना चाहिए। श्रीलंका और म्यांमार के बौद्धों का आंतक, पाकिस्तान में उपजातीयताओं और दबेकुचलों पर वहां के कुलीनों और अभिजातों के प्रहार, और भारत में हिंदी पट्टी के अलावा, देश भर में दलितों और गैर सवर्णों पर पीढ़ियों के ज़ुल्म। पंजाब की दलित चेतना में चमार पॉप और रैप का उभार एक तरह से मोहन मुक्त की कविता संसार में भी धड़कता है।

संग्रह में एक महत्वपूर्ण कविता ऋंखला है “लोक संस्कृति।” 27-28 पेजों में फैली इस सीरीज की कविताएं, अलग से ही एक ज़ोरदार कलेक्शन की तरह हैं। पहाड़ी मुख्यधारा के समाज में व्याप्त जातीय विभाजनों और विमर्श की चालाकियों पर इन्हें एक लंबे निबंध की तरह भी पढ़ा जा सकता है। लोक संस्कृति को लेकर जो रवैया आदिवासी, पहाड़ी, मूलनिवासी समुदायों के इर्दगिर्द निर्मित हो चुके हेजेमनी के समाजों का बन चुका है, मोहन बहुत बेबाकी और तीक्ष्णता से ही नहीं बल्कि एक शोधपरक निरीक्षण, अध्ययन और सजगता के साथ उसकी तफ़्सील सामने रखते हैं। लोक संस्कृति ऋंखला की शुरुआत से पहले मोहन ने एक छोटा सा नोट भी दिया है। पाठकों की सुविधा के लिए ताकि वे एक अंदाज़ा लगा सकें कि जिस लोकसंस्कृति को लेकर वे वाह-वाह या हाय-हाय करते आए हैं वो असल में कितनी साज़िशी चीज़ है और आखिर किन उद्देश्यों, इरादों, स्वार्थों का पोषण करती हुई पाई जाती है।

जब संस्कृति ही एक पिरामिड हो

तो इसके पहले

लोक लिख देने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता

जैसे तंत्र के पहले लोक होने का मतलब

लोकतंत्र तो नहीं होता।।।

(पृ 201)

मेवों की सस्ती से दिक्कत

डुमड़ों की मस्ती से दिक्कत

मुसलमान हस्ती से दिक्कत

तुम्हें नहीं आराम गुमानी,

          सुनो गुमानी

(सुनो गुमानी, पृ 205)

उपयोगी लोग

जो सब जगह…सभी जगह हैं मार्क्सवादी

प्रतिबद्ध मार्क्सवादी

दलित पेशों को बताते हैं लोककलाएँ

और बन जाते हैं कलावादी

प्रतिबद्ध कलावादी….

(पृ 225)

2020 में हार्पर कोलिंस से मलयाली लेखक एस हरीश के चर्चित और सवर्ण, ब्राह्मणवादी हल्कों में विवादास्पद उपन्यास “माशी” का मलयालम से अंग्रेज़ी अनुवाद “मस्टैश” (मूँछ) के नाम से प्रकाशित हुआ था। जयश्री कलाथिल ने ये अद्भुत अनुवाद संभव किया है। किताब के प्रारंभ में अपने उपन्यास की पृष्ठभूमि, संदर्भ और भूगोल के बारे में सूक्ष्मता से बताते हुए हरीश केरल समाज में सदियों से व्याप्त जाति प्रथा और जाति टकराहटों और दलितों पर घिनौनी कब्जेदारी का चिंताजनक ब्यौरा भी देते हैं। वो बताते हैं कि अपने उपन्यास के लिए जब वो अपने जन्मस्थान कुटनाड जिले के बीहड़ दलदली भूगोल का दौरा कर रहे थे और लोगों से मिल रहे थे तो उन यात्राओं और मुलाकातों ने उनके अपने नज़रिए और समझ में गहरा बदलाव कर दिया था। हरीश के मुताबिक, “उपन्यास लिखने की तैयारी करते हुए मुझे समझ में आया कि दलित इतिहास को, उस इतिहास के बारे में दलितों के खुद के ज्ञान को और नतीज़तन कुटनाड की जातीय राजनीति के इतिहास को किस तरह गहनता से सुनना चाहिए।”    

***

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट के निवासी और रैबासी मोहन मुक्त, इस पर्वतीय भूगोल के दलित इतिहास को लेकर एक सचेत और सुचिंतित और सुपठित अध्ययन करते आ रहे हैं और सोशल मीडिया में अपनी छाप छोड़ चुके हैं। उन्होंने अपने अध्ययन से हासिल तर्कों और दलीलों से पहले तो माननीय, महानुभाव समुदाय को चकित किया फिर उन्हें खिन्न भी किया। एक सजीसजायी भव्य फुलवारी में ये नाक़ाबिलेबर्दाश्त हस्तक्षेप था। भारत में बेशक दलित कविताएं लिखी जाती रही हैं और अपनी प्रखरताओं के लिए जानी भी जाती रही हैं। मेरे प्रिय लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताएं आज भी अपना एक महत्व रखती हैं। उसी आग की ताप में मोहन जैसे कवि भी बने हैं, इस बात से कोई क्यों इंकार करेगा।

क्रमश: जारी

(शिव प्रसाद जोशी की समीक्षा।)

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