Wednesday, December 7, 2022

जन्मदिन पर विशेष:अमरोहा के हसनपुर में खेली-कूदी हैं सायरा

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सायरा बानो उस वक्त कोई बड़ी हस्ती नहीं थीं जब उन्होंने बॉलीवुड के ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को अपने सपनों का राजकुमार माना था। 23 अगस्त 1944 को जन्मी सायरा बानो महज़ 12 साल की थीं जब वह दिलीप कुमार को अपना दिल दे चुकीं थीं। आज सायरा बानो 78 वर्ष की हो चुकी हैं। 1961 और 1988 तक बॉलीवुड इंडस्ट्री में अभिनय से जुड़ी रहीं सायरा बानो सबसे पहले 1961 में रिलीज हुई ‘जंगली’ फ़िल्म में शम्मी कपूर के साथ नज़र आईं थीं। इसके बाद उनकी राजेंद्र कुमार के साथ ‘झुक गया आसमान’ और ‘आई मिलन की बेला’ और बिश्वजीत के साथ ‘अप्रैल फूल’ और अभिनेता जॉय मुखर्जी के साथ  ‘आओ प्यार करें’, ‘साज़ और आवाज’, ‘दूर’ की आवाज’, ‘ये जिंदगी कितनी हसीन है’ और ‘शागिर्द’ आदि फिल्मों में नज़र आईं।

लंदन में हुई थी सायरा की शिक्षा

सायरा की मां नसीम बानो का निकाह अहसान-उल हक के साथ हुआ था। अहसान अमीर परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने ताज महल पिक्चर्स के बैनर की शुरुआत की थी। 23 अगस्त 1941 को मसूरी में जन्मीं सायरा की नानी शमशाद बेगम दिल्ली की मशहूर गायिका थीं। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद नसीम के पति अहसान भारत छोड़ पाकिस्तान में बस गए। इधर नसीम बानो सायरा और पुत्र सुल्तान की शिक्षा के लिए लंदन चली गयीं। लंदन से जब भी सायरा भारत आतीं तो दिलीप कुमार की फिल्म देखने ज़रूर जाती थीं।

दिलीप साहब की प्रशंसक से हमसफ़र 

दिलीप कुमार यूं तो जीवन भर बालीवुड के सरताज बनकर ही रहे लेकिन 60 के दशक में उनकी ख्याति शीर्ष पर थी। यह वो समय था जब दर्शकों को उनकी फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता था। सायरा बानो भी इन्हीं प्रशंसकों में से थीं। मां नसीम बानो के साथ सायरा भी दिलीप कुमार की फिल्में देखने जाया करती थीं। इस दौरान दिलीप कुमार के लिए प्रशंसक सायरा बानो का दिल मचलने लगा और साल 1966 में बानो की दिलीप कुमार से शादी हो गई।

हसनपुर के मुहल्ला नवाबान में खेली-कूदी हैं सायरा बानो

हसनपुर तहसील बार के पूर्व अध्यक्ष मुजाहिद चौधरी बताते हैं कि सायरा बानो का अमरोहा जिले में स्थित हसनपुर तहसील से गहरा नाता रहा। यहां पर वहीद मंज़िल में सायरा बानो की ननिहाल है। इस नाते सायरा हसनपुर के मुहल्ला नवाबान की गलियों में खेली-कूदी हैं।

हसनपुर की वहीद मंज़िल, जहां पर नसीम, शायरा और दिलीप कुमार आते थे

मुजाहिद बताते हैं कि यूसुफ अब्दुल वहीद खां का गफलत बेगम से दूसरा निकाह हुआ था। जिन्हें फूफी नसीम बेगम नसीब हुईं। नसीम बानो का निकाह दिल्ली में हुआ। नसीम बेगम जब भी अपने मायके हसनपुर आती-जातीं तो सायरा बानो भी उनके साथ होती थीं। इसी नाते दिलीप कुमार भी तीन बार हसनपुर आए।

मां नसीम बानो से मिला अभिनय का ताज 

 यूसुफ अली खान के पोते और सायरा के भतीजे फारूख अली खान बताते हैं कि जब सायरा बानो ने फिल्म इंडस्ट्री में अपना कदम रखा, तो उनकी माँ नसीम बानो का ताज उनके सिर पर रखा गया। ट्रेजेडी किंग की पत्नी सायरा बानो की मां का जन्म दिल्ली में सन् 1916 को हुआ था। नसीम बानो तीस के दशक की बेहतरीन अदाकाराओं में शुमार थीं इसीलिए उन्हें ‘ब्यूटी-क्वीन’ के नाम से जाना जाता था। फारुख अली खान बताते हैं कि रईस खानदान में जन्मी नसीम ने जब अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा तो परिवार वालों का विरोध झेलना पड़ा। तब भी जब सोहराब मोदी ने बानो को ‘हेमलेट’ फिल्म में ओफिलिया के रोल का ऑफर दिया लेकिन नसीम बानो के मन में अभिनय की एक ज्वाला हमेशा जलती रही। सोहराब मोदी ने अगली बार ‘खून का खून’ फिल्म के लिए नसीम को बतौर मुख्य अभिनेत्री के लिए चुना तो इस बार नसीम बानो से रहा ना गया। वह अपनी ज़िद पर अड़ गईं और भूख हड़ताल पर बैठ गई।

लताजी के ‘कान्हा कान्हा आन पड़ी’ भजन से जुड़ी है सायरा बानो की याद

लता मंगेशकर के निधन पर एक इंटरव्यू के दौरान सायरा बानो ने दिलीप कुमार और लता मंगेशकर के अटूट रिश्ते को साझा करते हुए कहा था कि दिलीप कुमार के साथ उनकी प्रेम कहानी का लताजी के साथ भी गहरा जुड़ाव है। सायरा ने कहा कि जब वह लताजी के गाए गाने ‘कान्हा कान्हा आन पड़ी’ की शूटिंग कर रही थीं, उस दौरान दिलीप कुमार ने उन्हें प्रपोज किया था। शायरा कहती हैं, “वास्तव में, लताजी दिलीप साहब के साथ मेरी प्रेम कहानी में एक विशेष स्थान रखती हैं। मैं अपनी फिल्म शागिर्द के लिए ‘कान्हा कान्हा आन पड़ी’ गाने की शूटिंग कर रही था। मुझे आज भी जन्माष्टमी की रात फिल्मिस्तान स्टूडियो में इस शूटिंग की याद है। अगले दिन ही दिलीप साहब ने मद्रास से उड़ान भरी और मेरी माँ और मेरे परिवार के सामने हमारी शादी का प्रस्ताव रखा। तो लता मंगेशकर जी का गाया यह गीत मेरा पसंदीदा बन गया।”

2011 में सायरा बानो की ननिहाल वहीद मंज़िल में लगी थी आग 

फारुख अली खान बताते हैं कि “अब्दुल वहीद खां साहब ने हसनपुर में एक कोठी बनायी थी जिसे ‘वहीद मंज़िल’ के नाम से जाना जाता है। यहीं पर नसीम, सायरा बानो और दिलीप कुमार आते थे। इस कोठी के बारे में ज्यादा जानकारी देते हुए मुजाहिद चौधरी बताते हैं कि नवाब साहब की ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों के साथ यहां पर मुलाकातें हुआ करती थीं लेकिन साल 2011 में ‘सार्ट सर्किट’ की वज़ह से कोठी में आग लग गई और ब्रिटिश अधिकारियों से मुलाकात की तस्वीरें, दस्तावेज और अन्य महत्वपूर्ण फ़ाइलें जलकर ख़ाक हो गईं।

(अमरोहा से स्वतंत्र पत्रकार प्रत्यक्ष मिश्रा की रिपोर्ट।)

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