Thursday, July 7, 2022

मानव जाति के इतिहास में रूसी क्रांति का स्थान

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रूसी क्रांति के शिल्पी लेनिन के जन्मदिन (22 अप्रैल) पर

रूसी क्रांति अब तक के मानव इतिहास के गर्भ से जन्मी सबसे संभावनाशील शिशु रही है। यह इतिहास की अब तक की सबसे प्रभावशाली परिघटना थी। यह आधुनिक इतिहास में हो रहे उथल-पुथल और क्रांतियों के सिलिसले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थी। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन के युग ने इस बात की घोषणा कर दी थी कि मनुष्य की नियति का नियंता कोई पारलौकिक शक्ति नहीं, बल्कि वह स्वंय है, इस घोषणा ने ईश्वर के दोनों प्रतिनिधियों, राजा और धर्म गुरूओं की सत्ता को चुनौती देने का आधार पैदा कर दिया था।

पोप और राजा की दैवीय सत्ता को चुनौती देकर 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति संपन्न हुई और उसने  ‘स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे’  का नारा दिया। आदर्श के रूप में इस नारे ने दुनिया के सामने महान स्वप्न प्रस्तुत किया, लेकिन वास्तविकता में यह नारा राजा और पोप का स्थान लेने वाले नए संपत्तिशाली (बुर्जुवा) वर्ग तक ही सीमित हो कर रह गया। राजनीतिक जीवन में इसने एक हद तक स्वतंत्रता और समता तो कायम की, लेकिन सामाजिक और विशेषकर आर्थिक जीवन में घोर असामनता बनी रही।

हम सभी जानते हैं कि रूसी क्रान्ति के पहले तक राजनीतिक जीवन में भी समता संपत्तिशाली वर्गों और मर्दों तक ही सीमित थी। सामंती शोषण-उत्पीड़न का स्थान पूंजीवादी शोषण-उत्पीड़न ने ले लिया। नए-नए जन्मे पूंजावादी देशों ने न केवल अपने देश के मेहनतकशों का भयानक शोषण करना शुरू किया, बल्कि दुनिया के देशों और नागरिकों को उपनिवेश और गुलाम बनाना भी शुरू कर दिया। पुनर्जागरण और प्रबोधन के दार्शनिकों और चिन्तकों ने जो स्वप्न देखा था, दुर्भाग्य से उसकी व्यवहारिक परिणति के रूप में मानव इतिहास की सबसे शोषक पूंजीवादी व्यवस्था सामने आई। इसकी क्रूरता और मानव विरोधी स्वरुप को साहित्याकरों, चिन्तकों और दार्शनिकों ने उजागर करना शुरू किया और वे इससे भिन्न एक ऐसी वैकल्पिक दुनिया का स्वप्न देखने लगे, जिसमें वास्तव में हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न का अन्त हो जाए और स्वतंत्रता, समता और भाईचारे का फ्रांसीसी क्रान्ति का नारा सभी इंसानों के लिए एक हकीकत बन जाए। इसे जमीन पर उतारने का आधार उन्नत उत्पादक शक्तियों और संपत्तिहीन मजदूर वर्ग के रूप में पूंजीवाद ने ही पैदा कर दिया था।

        फूरिये और ओवेन ने समाजवाद का सपना देखा। इस सपने को मुकम्मल वैज्ञानिक आधार मार्क्स और एंगेल्स ने दिया और 1848 के कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र में एक विश्वव्यापी साम्यवादी समाज का सपना देखा और इस सपने को हकीकत में उतारने वाले वर्ग के रूप में औद्योगिक मजदूरों को देखा। उन्होंने विश्व इतिहास का सबसे प्रसिद्ध वाक्य कहा कि “अब तक दार्शनिकों के द्वारा विभिन्न रूपों में इतिहास की व्याख्या की गई है, किंतु असल बात तो यह है कि दुनिया को बदला जाए।” इसके साथ ही उन्होंने इस बात की भी स्पष्ट घोषणा कर दी थी कि इस बदलाव का अगुवा कोई संपत्तिशाली वर्ग नहीं, अपितु संपत्तिहीन औद्योगिक सर्वहारा होगा। मार्क्स ने दुनिया को देखने, समझने और बदलने का एक विज्ञान प्रस्तुत किया, जिसे बाद में एंगेल्स ने मार्क्सवाद नाम दिया।

मार्क्सवाद हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न, अभाव, अपमान और वर्चस्व और अधीनता तथा युद्ध एंव हिंसा से मुक्त दुनिया को रचने का विज्ञान बनकर सामने आया और इसने विश्व के सामने वैश्विक साम्यवादी समाज का महास्वप्न रखा। मार्क्स के जीते-जी ही इस दिशा में फ्रांस के मजदूरों ने पहली कोशिश की और 1871 में फ्रांस की सत्ता पर कब्जा कर लिया। मजदूरों का यह शासन मात्र 72 दिनों तक ही कायम रह पाया, जिसे हम पेरिस कम्युन के नाम से जानते हैं। पेरिस कम्युन की असफलता के बाद यह कहा जाने लगा कि मजदूरों के नेतृत्व में साम्यवादी क्रान्ति एक यूटोपिया (दिवास्वप्न) है, जिसे कभी हकीकत में तब्दील नहीं किया जा सकता।

पेरिस कम्यून के लगभग 47 सालों बाद अक्टूबर 1917 में रूस के मजदूरों ने इस यूटोपिया को हकीकत में तब्दील कर दिया, इस क्रान्ति ने दुनिया पर उच्च तीव्रता के एक ऐसे भूकंप की तरह असर डाला की, दुनिया का हर कोना हिल उठा। इसी बात को शब्द देते हुए क्रान्ति के प्रत्यक्षदर्शी अमेरिकी पत्रकार जान रीड ने इस क्रान्ति की कहानी को ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ नाम दिया। यह क्रान्ति कोई चन्द व्यक्तियों का कारनामा नहीं थी, इसे रूस के मजदूरों के नेतृत्व में वहां के मेनतकश मजदूरों और किसानों ने अंजाम दिया था और उन्होंने ही अकूत कुर्बानियां देकर इस क्रान्ति की रक्षा की थी। हां, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि बोल्शेविक पार्टी ने मेहनतकशों को नेतृत्व दिया था। लेकिन याद रहे कि बोल्शेविक पार्टी के बुहलांश सदस्य मजदूर वर्गीय पृष्ठभूमि के या मजदूर थे।

        रूसी क्रान्ति ने सारी दुनिया में यह उम्मीद पैदा कर दी कि हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न और अन्याय का खात्मा संभव है। हर प्रकार के अभाव और अपमान से मुक्ति मिल सकती है। गरीबी, भूख, अशिक्षा से मुक्ति पाई जा सकती है। सबके लिए समुचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। वर्चस्व और अधीनता के सभी संबंधों को तोड़कर इंसानी बराबरी कायम हो सकती है। ऐसी भौतिक और आत्मिक परिस्थितियां कायम की जा सकती है, जिसमें हर व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास हो सके। हर व्यक्ति को पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ जीने का अवसर उपलब्ध कराया जा सकता है।

इस क्रान्ति ने मार्क्स के इस सपने को भी व्यापक बनाया कि पूंजीवाद ने उत्पादन के साधनों का इतना विकास कर दिया है कि समय के साथ हर प्रकार के श्रम-विभाजन का अन्त किया जा सकता है, और शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच के अन्तर को खत्म किया जा सकता है। यह क्रान्ति अपने वायदे और सपने में राष्ट्रीय क्रान्ति नहीं थी। मई 1918 में रूसी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी की बैठक में लेनिन ने घोषणा की थी कि “ हम दावा करते हैं कि समाजवाद और वैश्विक समाजवाद के हित राष्ट्रीय हितों से  ऊपर होंगे” रूसी क्रान्ति के मुख्य अगुवा वास्तुकार लेनिन के दिमाग में यह बात स्पष्ट थी कि रूसी क्रान्ति अन्तराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग की वह चौकी है, जो पूरी दुनिया में सर्वहारा क्रान्तियों और अन्य प्रगतिशील आंदोलनों की मदद करेगी। वे इस कदर अन्तरराष्ट्रीयतावादी थे कि उत्पादन साधनों और मानवीय विकास की दृष्टि से उन्नत जर्मन क्रान्ति के लिए रूसी क्रान्ति को निछावर करने को तैयार थे। इस प्रकार इस क्रान्ति ने विश्व इतिहास में पहली बार देशों और राष्ट्रों की सरहदों की समाप्ति का आधार प्रस्तुत किया।

एक ऐसी विश्व व्यवस्था की कल्पना प्रस्तुत की जिसमें सारे साधनों पर से, न के केवल व्यक्तिगत मालिकाना खत्म हो जायेगा, बल्कि ज्यों-ज्यों सर्वहारा क्रान्तियां विश्वव्यापी बनेंगी,  संसाधनों पर किसी एक देश का मालिकाना  नहीं रहेगा, ये विश्व मानवता की धरोहर होंगी। लेनिन इस बात से मुतमईन थे कि सर्वहारा क्रान्ति विश्वव्यापी होने पर ही टिकी रह सकती है और साम्यवाद की स्थापना क्रान्ति के विश्वव्यापी विस्तार पर निर्भर करती है। मानवीय नैतिकता इस कदर विकसित हो जायेगी कि लोग अपनी क्षमता के हिसाब से काम करेंगे और जरूत के हिसाब से प्राप्त करेंगे। ज्यादा सक्षम व्यक्ति ज्यादा पाए, भले ही उसकी जरूरतें कम हों, वाली मानवीय अनैतिकता समाप्त हो जायेगी। किसी भी ऐसी संपत्ति पर किसी का निजी मालिकाना नहीं होगा, जिससे कोई किसी दूसरे का शोषण कर सके।

         रूसी क्रान्ति ने यह भी संदेश दिया था कि पूंजीवादी उदारवादी लोकतंत्र संपत्तिशाली लोगों के हाथ की कठपुतली बन गया है, और इस क्रान्ति के बाद सच्चे अर्थों में बुहलांश जन के लिए सभी स्तरों पर लोकतंत्र की स्थापना होगी, सच्चा जनतंत्र कायम होगा। हर स्तर पर समाज का जनतांत्रिकरण इस कदर होगा कि वर्चस्व और अधीनता के किसी भी संबंधों का नामों- निशान नहीं बचेगा। हिंसा और सर्वहारा की तानाशाही सिर्फ अल्पकालिक विवशता होगी, ताकि सर्वहारा क्रान्ति के विनाश के लिए संकल्पबद्ध मुट्ठी भर लोगों को नियंत्रित किया जा सके। इस क्रान्ति ने सत्ता के सभी रूपों की समाप्ति का विश्वव्यापी स्वप्न को जगाने का काम किया था, जिसमें यह माना गया कि राज्य रूपी संस्था का भी भविष्य में खात्मा हो जायेगा। विश्वव्यापी साम्यवादी समाज में भौतिक स्थितियां इतनी उन्नत होंगी और सभी मनुष्यों की चेतना एवं संवेदना का इतना विकास हो जायेगा कि राज्य रूपी किसी नियंत्रक सत्ता की जरूरत ही नहीं रहेगी।

        ठोस भौतिक जमीन पर खड़े होकर मार्क्स ने संपत्तिहीन अन्तराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में होने वाली क्रान्तियों के बाद जिस समाज का सपना देखा था, उन सपनों के सभी बीज तत्वों को लेकर रूसी क्रान्ति रूपी शिशु जन्मा था। इस क्रान्ति के साथ जहां रूसी मेहनतकश वर्ग की आकांक्षाएं जुडी हुई थीं, वहीं दुनिया के शोषित-उत्पीड़ित लोगों के लिए भी यह आशा का स्रोत थी। वैश्विक पैमाने पर व्यापक मेहनतकश लोगों, गुलाम देशों और पराधीन राष्ट्रों के मुक्ति के सपनों को उड़ान देने के साथ ही, रूसी क्रान्ति के चलते कुछ एक वर्षों के भीतर ही अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों का जन्म हुआ।  एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की मेहनतकश जनता इनके इर्द-गिर्द लामबंद होने लगी। इस लामबंदी ने कुछ देशों में क्रान्तियों को जन्म दिया, जैसे की चीन, वहीँ तीसरी दुनिया के बुहलांश देशों में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन को तेज करने में इसने भारी मदद पहुंचाई तथा साथ ही आजादी के बाद सत्तारूढ़ शासकों को शोषितों- उत्पीड़ितों के पक्ष में नीतियां बनाने के लिए बाध्य किया।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि रूसी क्रान्ति ने तीसरी दुनिया के पराधीन देशों की मुक्ति आंदोलनों को समर्थन देखकर आजादी के आंदोलन को अग्रगति प्रदान की और आजाद देशों की नई-नई प्राप्त स्वतंत्रता को कायम रखने में भरपूर मदद पहुंचाई। जिन देशों में आजादी की लडाई का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टियों के हाथ में नहीं था, उन देशों में भी आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले संगठन रूस से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मदद प्राप्त करते थे। हमारे देश में भी कांग्रेस के भीतर सोशिलिस्टों का एक बड़ा समूह था, जो बहुत सारे मामलों में रूस का कायल था। अफ्रीकी देशों में मुक्ति आंदोलन के बुहत सारे नेता वामपंथ की ओर झुके हुए थे। भारत में नेहरू और इण्डोनेशिया के सुकर्णों रूस के प्रशंसक थे। उपनिवेशवाद विरोधी मुक्ति आंदोलन को तेज करने और क्रान्तियों के सिलसिले को प्रेरणा देने के साथ ही रूस ने पश्चिमी देशों के मेहनतकशों के संघर्ष को भी तेज किया, पश्चिमी देशों में कल्याणकारी राज्यों की स्थापना में सर्वहारा वर्ग की क्रान्ति का भय एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक बना।

        हम सभी जानते हैं कि रूसी क्रान्ति एक पिछड़े देश में ‘रोटी, शान्ति और जमीन’ के नारे के साथ घटित हुई थी। मार्क्स की परिकल्पना के अनुसार किसी उन्नत पूंजीवादी देश में यह सर्वहारा क्रान्ति नहीं घटित हुई। रूसी क्रान्ति की वस्तुगत और आत्मगत कमजोरी के कारण उसके पिछड़ेपन में निहित थे। इसे एक ओर अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में महान स्वप्नों को अन्ततोगत्वा अंजाम देना था, तो तत्कालिक तौर पर देश के भीतर अपने लोगों के लिए रोटी तक का इंतजाम करना था। रोटी, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसकी उपलब्धियां जग-जाहिर हैं। स्त्री-पुरूष समता के क्षेत्र में इसने ऐतिहासिक मिसाल कायम किया। इसे भीतरी और बाहरी दुश्मनों के चौतरफा हमले से अपनी रक्षा भी करनी थी। फासीवाद को पराजित करने में रूस की सर्वाधिक निर्णायक भूमिका थी, लाखों नहीं करोड़ों सोवियत संघ के लोगों ने अपनी आहुति देकर फासीवाद से अपने देश और दुनिया की रक्षा की।

        सोवियत संघ की विश्वव्यापी और देश के भीतर की उपलब्धियों और इसके महत्व से शायद ही कोई इंकार कर पाए, लेकिन इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्व इतिहास के गर्भ से जन्मे सबसे संभावनाशील शिशु को विरूपित करने और अन्ततोगत्वा उसकी असमय मुत्यु में इस शिशु को जन्म देने में धाय की भूमिका निभाने वाली बोल्शेविक पार्टी और उसके नेतृत्व की भूल-गलतियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी, इसमें कितनी वस्तुगत कारणों से हुईं और कितना आत्मगत कारणों से इस पर बहस हो सकती है। फिर भी रूसी क्रान्ति ने जिस महास्वप्न और विश्वव्यापी उम्मीद को जन्म दिया था, वह आज  भी प्रेरणा का स्रोत है।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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